Article

इलाहाबाद की साहित्यिक दुनिया के अनकहे किस्से समेटे है ‘अनुभव बहते रहे अबाध’

‘अनुभव बहते रहे अबाध’ डॉ. जगदीश गुप्त की अप्रकाशित कविताओं का महत्त्वपूर्ण संग्रह है, जिसका संकलन एवं संपादन विभु गुप्त ने किया है। लोक भारती प्रकाशन से प्रकाशित यह पुस्तक इलाहाबाद के साहित्यिक इतिहास, गंगा की स्मृतियों, निराला, महादेवी वर्मा और अन्य साहित्यकारों से जुड़े आत्मीय प्रसंगों को सामने लाती है। रविनंदन सिंह की साहित्यिक समीक्षा में संग्रह की काव्य-दृष्टि, सामाजिक संवेदना, कला-चेतना और सांस्कृतिक महत्त्व का विश्लेषण किया गया है।

समीक्षा | रविनंदन सिंह

प्रख्यात कवि, चित्रकार एवं आलोचक डॉ. जगदीश गुप्त की अप्रकाशित कविताओं का संग्रह ‘अनुभव बहते रहे अबाध’ लोक भारती प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। उनके आत्मज विभु गुप्त द्वारा संकलित एवं संपादित यह पुस्तक केवल अप्रकाशित कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि इलाहाबाद की समृद्ध साहित्यिक परंपरा, सांस्कृतिक जीवन और रचनात्मक संबंधों का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी है। इसमें एक कवि की निजी स्मृतियों के माध्यम से एक शहर, साहित्यिक पीढ़ी और पूरे सांस्कृतिक परिवेश की झलक मिलती है।

संग्रह की भूमिका प्रो. कुमार वीरेन्द्र ने लिखी है। इसमें डॉ. जगदीश गुप्त के रचनात्मक व्यक्तित्व, इलाहाबाद के प्रति उनके लगाव, साहित्यिक संबंधों और कवि एवं चित्रकार के रूप में उनकी विशिष्ट दृष्टि को समझने के लिए आवश्यक संदर्भ मिलते हैं। विभु गुप्त का संपादन कवि के अप्रकाशित रचनात्मक संसार को पाठकों तक पहुँचाने का सार्थक प्रयास है।

गंगा की लहरों में बहती जीवन की स्मृतियाँ

संग्रह का शीर्षक ‘अनुभव बहते रहे अबाध’ इसकी मूल काव्य-दृष्टि को अभिव्यक्त करता है। इसमें अनुभव किसी बंद स्मृति की तरह नहीं, बल्कि नदी की तरह प्रवाहमान जीवन के रूप में सामने आता है। गंगा इस संग्रह में केवल नदी नहीं, बल्कि समय, स्मृति और जीवन के निरंतर प्रवाह का प्रतीक बन जाती है।

कवि लिखते हैं-

पानी गहरा है पर थाह नहीं पाता हूँ।
लहरों में अनचाहे लहर-लहर जाता हूँ।

इन पंक्तियों में नदी का दृश्य जीवन के गहरे अनुभव में बदल जाता है। जीवन की जटिलताओं को पूरी तरह समझ पाने की असमर्थता और समय के साथ बहते रहने की विवशता यहाँ प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुई है।

इलाहाबाद बना साहित्यिक स्मृतियों का जीवंत पात्र

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें इलाहाबाद केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक पात्र के रूप में उपस्थित है। गंगा-यमुना, कछार, म्योर हॉस्टल, विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग, चौक, कॉफी हाउस, अक्षय वट और निराला की प्रतिमा जैसे स्थान कवि की स्मृतियों के माध्यम से साहित्यिक इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं।

‘उद्दीशा’ कविता में म्योर हॉस्टल के दिनों को याद करते हुए कवि लिखते हैं-

चार वर्ष बिताये
उस म्योर हास्टल को
प्रतिमा की छाया
मंच की माया
किस-किस रूप में नहीं देखी…

इन पंक्तियों में छात्र जीवन, मित्रता, रंगमंच और साहित्यिक गतिविधियों का पूरा संसार साकार हो उठता है। गंगा के पार फैली चाँदनी और कछार के दृश्य कवि को पुराने मित्रों की याद दिलाते हैं। इस तरह दृश्य और स्मृति एक-दूसरे में घुलकर बीते समय को वर्तमान में जीवित कर देते हैं।

निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, उपेन्द्रनाथ अश्क, रामविलास शर्मा, गोपीकृष्ण गोपेश, रवीन्द्र कालिया और ममता कालिया जैसे साहित्यकारों के संदर्भ संग्रह को विशेष महत्त्व प्रदान करते हैं। ये नाम केवल साहित्यिक परिचय नहीं हैं, बल्कि कवि के जीवन, मित्रताओं और सांस्कृतिक अनुभवों का हिस्सा हैं।

साहित्यिक इतिहास का अनलिखा पक्ष

‘एक साक्षात्कार’ कविता में गोपीकृष्ण गोपेश के माध्यम से इलाहाबाद के साहित्यिक संसार से परिचय की स्मृति दर्ज है। कवि लिखते हैं-

वह गोपेश ही थे जिन्होंने मुझे
इलाहाबाद के साहित्यकारों से
परिचित कराया।

यह स्वीकारोक्ति बताती है कि किसी लेखक का निर्माण केवल पुस्तकों के अध्ययन से नहीं होता। मित्रों, गुरुओं, समकालीन रचनाकारों, बहसों और शहर के सांस्कृतिक वातावरण की भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

साहित्यिक इतिहास सामान्यतः पुस्तकों, पत्रिकाओं, संस्थाओं और आंदोलनों के आधार पर लिखा जाता है। लेकिन किसी साहित्यिक संस्कृति की वास्तविक जीवंतता कॉफी हाउस की चर्चाओं, हॉस्टल के कमरों, मित्रों की मुलाकातों और अनौपचारिक संवादों में भी मौजूद रहती है। डॉ. जगदीश गुप्त की कविताएँ इसी अनलिखे इतिहास को संरक्षित करती हैं। इसीलिए यह संग्रह इलाहाबाद के साहित्यिक इतिहास का वैकल्पिक दस्तावेज कहा जा सकता है।

निराला के संघर्ष और मानवीय पक्ष का चित्रण

‘निराला प्रतिमा के समीप वसंत पंचमी’ कविता में कवि केवल महाप्राण निराला की प्रतिमा को श्रद्धांजलि नहीं देते, बल्कि उनके संघर्षपूर्ण जीवन को भी याद करते हैं-

एक निराला की प्रतिमा
सबके मन में बस गयी
अचानक कितनी थी कोमलता मन में,
पर विडम्बना जीवन-क्रम में
उनको घेरे रही निरन्तर
कैसा था संघर्ष भयानक।

यहाँ प्रतिमा सम्मान का प्रतीक है, जबकि जीवन संघर्ष और विडंबनाओं की कहानी। कवि निराला को केवल स्मारक या महान साहित्यकार के रूप में नहीं, बल्कि संवेदनशील और संघर्षशील मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

‘वसंत पंचमी और निराला’ में निराला और महादेवी वर्मा की स्मृति भी इसी मानवीय दृष्टि के साथ उभरती है। साहित्यिक विभूतियों के निजी स्वभाव, आत्मीयता और करुणा को सामने लाना इस संग्रह की उल्लेखनीय विशेषता है।
परंपरा, आधुनिकता और सामाजिक न्याय

डॉ. जगदीश गुप्त नई कविता के महत्त्वपूर्ण कवि और आधुनिकता के पक्षधर रहे, लेकिन उनकी आधुनिक दृष्टि परंपरा से विमुख नहीं होती। ‘पुनः शम्बूक’ कविता में शम्बूक और एकलव्य के प्रसंगों के माध्यम से सामाजिक न्याय के प्रश्न उठाए गए हैं-

एकलव्य महाभारत में
शम्बूक रामायण में
एक बड़ा प्रश्न चिह्न
बनकर आते हैं
अँधेरे आकाश में।

इन पंक्तियों में पौराणिक पात्र समकालीन सामाजिक प्रश्नों के प्रतीक बन जाते हैं। कवि अतीत को केवल दोहराते नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे प्रश्नों को वर्तमान के संदर्भ में सक्रिय करते हैं।

‘अक्षय वट-परिचर्चा’ में गालिब और चकबस्त के संदर्भों के माध्यम से सांस्कृतिक साझेदारी का संदेश मिलता है। कवि का कथन है-

साहित्य हिन्दू-मुसलमान में
अन्तर नहीं करता।

यह दृष्टि साहित्य को विभाजन के बजाय संवाद और साझा सांस्कृतिक विरासत का माध्यम मानती है।

कविता और चित्रकला का रचनात्मक संबंध

डॉ. जगदीश गुप्त कवि होने के साथ चित्रकार और आलोचक भी थे। ‘कवि चित्रकार मैं’ कविता में उनकी बहुआयामी रचनात्मक चेतना दिखाई देती है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर और महादेवी वर्मा के संदर्भ में वे कविता और चित्रकला के अंतर्संबंध को रेखांकित करते हैं-

रविबाबू की लेखनी
तूलिका बन जाती थी
महादेवी में भी वही
साहचर्य मिलता है
दोनों कलाओं का।

उनके लिए शब्द और रंग, भाषा और रेखा अलग-अलग माध्यम अवश्य हैं, लेकिन उनकी रचनात्मक जड़ अनुभूति में निहित है। परिवार की कला-परंपरा को सहेजने और आगे बढ़ाने की उनकी आकांक्षा भी इन कविताओं में व्यक्त होती है।

चित्रकार की दृष्टि के कारण संग्रह की अनेक रचनाओं में दृश्यात्मकता दिखाई देती है। ‘छविकारों के बीच’ की पंक्तियाँ-

छाया-प्रतिच्छाया
बिम्ब-प्रतिबिम्ब
आकाश से भूमि तक।

स्मृति, दृश्य और यथार्थ के संबंधों को संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली ढंग से सामने रखती हैं।

मानवीय संवेदना और सामाजिक बेचैनी

संग्रह की कविताएँ केवल साहित्यिक स्मृतियों तक सीमित नहीं हैं। इनमें सामाजिक घटनाओं, मानवीय पीड़ा और सामान्य मनुष्य के जीवन के प्रति गहरी संवेदनशीलता भी दिखाई देती है।‘स्यापा हो गया है बुढ़ापा’ कविता में एक छात्र की आत्महत्या कवि को भीतर तक विचलित करती है। वे लिखते हैं-

तमाशबीन नहीं हो सका मैं-
कल से ही बेतरह उद्विग्न है मन!

इसी संवेदना का मार्मिक रूप ‘सहना केवल सहना’ में दिखाई देता है-

व्यथा के पीछे भी,
कोई कथा रही होगी
मृत्यु से पहले
उसने कितनी पीड़ा सही होगी।

ये पंक्तियाँ मृत्यु के पीछे छिपे मानवीय दुख को समझने का प्रयास करती हैं। कवि घटना को तमाशे में बदलने के बजाय उसके पीछे मौजूद पीड़ा और परिस्थितियों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं।

‘नये निषादराज के व्यक्तित्व से!’ में सीताराम निषाद के माध्यम से सामान्य मनुष्य को साहित्यिक स्मृति में स्थान मिलता है। यह दृष्टि बताती है कि साहित्य का लोकतंत्रीकरण केवल विषय बदलने से नहीं, बल्कि मनुष्य को देखने की दृष्टि बदलने से होता है।
बदलते समय और स्मृति का दस्तावेज

रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया और कैलाश कल्पित से जुड़े प्रसंगों में जीवन, मृत्यु और साहित्य के प्रति समर्पण की झलक मिलती है। वहीं ‘रतन दीक्षित की माँ’ कविता में घरेलू जीवन के बदलते दृश्यों के माध्यम से समय की गति को व्यक्त किया गया है-

आदमी पूरा देख भी नहीं पाता
कि दृश्य बदल जाता है
संदर्भ के साथ दृश्यों का नाता है।

ये पंक्तियाँ संग्रह की व्यापक रचना-दृष्टि को भी स्पष्ट करती हैं। लोग चले जाते हैं, शहर बदलते हैं और साहित्यिक पीढ़ियाँ आती-जाती रहती हैं, लेकिन स्मृति उनके बीच संबंध बनाए रखती है। कविता निजी अनुभव को सार्वजनिक सांस्कृतिक स्मृति में बदल देती है।

संग्रह की सीमाएँ और साहित्यिक महत्त्व

इस संग्रह की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए कुछ सीमाओं की ओर भी ध्यान देना आवश्यक है। कई कविताएँ कविता, संस्मरण और साहित्यिक टिप्पणी के बीच स्थित दिखाई देती हैं। कुछ रचनाओं में व्यक्तियों और घटनाओं का विवरण बढ़ जाने से काव्यात्मक एकाग्रता प्रभावित होती है। कहीं-कहीं तुक का आग्रह भी स्वाभाविक काव्य-प्रवाह को सीमित करता है।

हालाँकि इन सीमाओं के बावजूद संग्रह का दस्तावेजी और सांस्कृतिक महत्त्व कम नहीं होता। डॉ. जगदीश गुप्त का उद्देश्य केवल गीतात्मक कविता रचना नहीं, बल्कि उन अनुभवों और संबंधों को भी सुरक्षित करना है जो औपचारिक साहित्यिक इतिहास में प्रायः दर्ज नहीं हो पाते। विभु गुप्त का संकलन-संपादन इस दृष्टि से साहित्यिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

‘अनुभव बहते रहे अबाध’ को केवल अप्रकाशित कविताओं का संकलन मानना इसके वास्तविक महत्त्व को सीमित करना होगा। यह एक ऐसे कवि की स्मृतियों का दस्तावेज है जिसने अपने समय, समाज और शहर को भीतर से जिया। इसमें मित्रताओं की आत्मीयता, मृत्यु की पीड़ा, सामाजिक बेचैनी, कला का आत्मसंघर्ष और इलाहाबाद के बदलते सांस्कृतिक स्वरूप की उदासी एक साथ मौजूद है।
कवि की यह पंक्ति संग्रह की मूल भावना को अभिव्यक्त करती है-

कवि बिना अनुभव किए
लिखता नहीं है।

यह पुस्तक कविता और संस्मरण, व्यक्ति और समाज तथा अतीत और वर्तमान के बीच एक जीवंत सेतु बनाती है। गंगा की लहरों, म्योर हॉस्टल की स्मृतियों, कॉफी हाउस की बहसों और निराला की प्रतिमा के माध्यम से डॉ. जगदीश गुप्त का अनुभव आज भी पाठकों तक पहुँचता है। यही इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

काशी में पटरी व्यवसायियों को बड़ी राहत, 26 वेंडिंग जोन में बसेंगे 905 दुकानदार

Related Articles

Back to top button