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लखनऊ की फ़ाइल से नवी मुंबई के मैदान तक -भारतीय महिला क्रिकेट की स्वर्ण यात्रा

1973 में लखनऊ से शुरू हुई महिला क्रिकेट की यात्रा 2025 में नवी मुंबई के मैदान पर सुनहरी जीत के साथ पूरी हुई। महेन्द्र कुमार शर्मा और प्रमीलाबाई चव्हाण के प्रयासों से बनी WCAI की नींव ने भारतीय बेटियों को वह पहचान दी, जिसकी परिणति विश्व कप जीत में हुई। शेफाली वर्मा, दीप्ति शर्मा और हरमनप्रीत कौर की चमक ने आधी सदी की मेहनत को अमर कर दिया। यह कहानी सिर्फ़ क्रिकेट की नहीं, भारत की बदलती सोच की है - जहाँ बेटियाँ अब प्रेरणा नहीं, प्रतीक बन चुकी हैं।

  • 2025 की यह जीत सिर्फ़ एक ट्रॉफी नहीं, आधी सदी के संघर्ष, समर्पण और सपनों की गूंज है – जहाँ बेटियों ने इतिहास नहीं, एक युग लिखा।

2 नवम्बर 2025 की रात, नवी मुंबई के डी.वाई. पाटिल स्टेडियम में जब शेफाली वर्मा ने दक्षिण अफ्रीका की अंतिम बल्लेबाज़ को क्लीन बोल्ड किया, तब पूरा स्टेडियम “भारत माता की जय” के नारों से गूंज उठा। उस क्षण न सिर्फ एक गेंदबाज़ का सपना साकार हुआ, बल्कि पाँच दशक पुराने संघर्षों, उपेक्षाओं और उम्मीदों की ज्वाला ने विजय का रूप धारण कर लिया। भारत की बेटियों ने पहली बार महिला क्रिकेट विश्व कप अपने नाम कर लिया था।

लाखों आँखें नम थीं – लेकिन उन आँसुओं में गर्व था, कृतज्ञता थी, और इतिहास का आशीर्वाद था। उस रात भारत की सड़कों पर बेटियाँ झूम उठीं, माँएँ मुस्कुराईं, और पिता का माथा गर्व से ऊँचा हो गया। लेकिन इस कहानी का आरंभ उस मैदान से बहुत दूर – एक छोटे से कमरे में, लखनऊ में, 1973 में हुआ था।

वह कागज़ जो भारत की बेटियों की किस्मत लिख गया – WCAI की नींव

साल था 1973। देश में महिला खेलों की स्थिति बेहद कमजोर थी। न तो मैदान थे, न साधन। खेलों में महिलाओं की भागीदारी समाज में एक “जिज्ञासा” समझी जाती थी, प्रोत्साहन नहीं। इसी दौर में लखनऊ के रहने वाले महेन्द्र कुमार शर्मा, एक क्रिकेट प्रशासक और खेलप्रेमी, ने कुछ महिलाओं के साथ मिलकर विमेन्स क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (WCAI) नामक संस्था का पंजीकरण कराया। कहते हैं उस समय जब रजिस्ट्रेशन फॉर्म पर “Women’s Cricket” लिखा गया, तो सरकारी दफ्तर में लोग हँस पड़े – “क्या सचमुच महिलाएँ क्रिकेट खेलेंगी?”

महेन्द्र कुमार शर्मा ने मुस्कराकर जवाब दिया -“आज आपको हँसी आ रही है, पर एक दिन यही महिलाएँ भारत का नाम रोशन करेंगी।”उनकी यह बात भविष्यवाणी सिद्ध हुई। WCAI की पहली अध्यक्षा बनीं बेगम हुमैदा हबीबुल्लाह, और बाद में महाराष्ट्र की सांसद प्रमीलाबाई चव्हाण ने पद संभाला। उनके नेतृत्व में संघ ने पहला बड़ा आयोजन तय किया – एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता।

पुणे की धूल भरी पिच पर लिखा गया पहला अध्याय

अप्रैल 1973, पुणे। यह वही शहर था जहाँ पहली बार भारतीय महिलाओं ने संगठित रूप में राष्ट्रीय क्रिकेट टूर्नामेंट खेला। मैदान पर न कोई विज्ञापन था, न मीडिया कवरेज। खिलाड़ी खुद ही बॉल और किट लेकर आई थीं। कईयों ने रेलवे के जनरल डिब्बे में सफ़र किया, किसी ने अपने घर के आँगन में ही बैट चलाने की प्रैक्टिस की थी। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बंगाल, पंजाब और दिल्ली की टीमें इस टूर्नामेंट में शामिल हुईं। मैदान पर न सिर्फ़ गेंदें गिरीं, बल्कि इतिहास के बीज भी पड़े। इस टूर्नामेंट के बाद जब खिलाड़ी घर लौटीं, तो अख़बारों के कोने में एक छोटी-सी खबर छपी -“महिलाओं ने भी क्रिकेट खेला।” किसी ने तब नहीं सोचा था कि आधी सदी बाद यही खिलाड़ी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेंगी।

वाराणसी में जन्मी पहचान – दूसरी नेशनल्स की कहानी

दिसंबर 1973 में वाराणसी ( बनारस) में दूसरी महिला नेशनल्स आयोजित हुईं। इस बार भी संसाधन सीमित थे, पर उत्साह असीम। गंगा किनारे बसे इस आध्यात्मिक नगर में बेटियाँ जब मैदान पर उतरीं, तो जैसे शहर ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया। काशी के घाटों से उठती आरतियाँ, और मैदान पर बल्लेबाजों की पुकारें – यह समन्वय भारत की आत्मा का प्रतीक था। इन्हीं प्रतियोगिताओं से भारत को पहली पीढ़ी की महिला क्रिकेटर मिलीं – शांति सुद, डॉ. सुनीता लाड, डायना एडुल्जी, शांता रंगास्वामी जैसी खिलाड़ी, जिन्होंने आगे चलकर देश के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर खेला।

‘द अलबीज़’ क्लब – मुंबई की वो चिंगारी जिसने लौ जलाई

अगर महिला क्रिकेट का प्रशासन लखनऊ से शुरू हुआ, तो उसका “दिल” मुंबई में धड़कता था। साल 1969 में पारसी समाज की महिला आलू बामजी ने भारत का पहला महिला क्रिकेट क्लब “The Albees” बनाया। उन्होंने कहा था -“क्यों न हमारी लड़कियाँ भी वही गेंद बल्ले से मारें, जो अब तक सिर्फ़ लड़के मारते आए हैं?” यहीं से कई खिलाड़ी निकलीं जिन्होंने आगे जाकर WCAI के टूर्नामेंट में हिस्सा लिया। मुंबई की गलियों में सुबह के वक़्त जब बॉल की ठक-ठक की आवाज़ आने लगी, तो पड़ोसी मुस्कुराने लगे – “लगता है अब सचमुच बेटियाँ क्रिकेट खेलेंगी।”

अंतरराष्ट्रीय पहचान की शुरुआत

1976 में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार वेस्टइंडीज़ के खिलाफ टेस्ट मैच खेला। भारत ने वही किया जो कई पुरुष टीमें वर्षों में नहीं कर पाई थीं – डेब्यू सीरीज़ में जीत। शांता रंगास्वामी ने कप्तानी की, और भारत ने दो में से एक टेस्ट जीता, दूसरा ड्रॉ रहा। यह इतिहास का स्वर्ण पृष्ठ था। दुनिया को पता चला कि भारतीय बेटियाँ अब सिर्फ़ साड़ी में परंपरा नहीं, बल्कि क्रिकेट किट में भी पराक्रम दिखा सकती हैं।

कठिन समय – भूले-बिसरे मैदान और अधूरी उम्मीदें

1980 और 1990 के दशक में महिला क्रिकेट के लिए हालात फिर कठिन हो गए। न सरकारी मदद, न स्पॉन्सरशिप। खिलाड़ियों को अपनी जर्सी खुद खरीदनी पड़ती थी। कई बार टीमें टूर्नामेंट में पहुँचने के लिए टिकट के पैसे नहीं जुटा पाती थीं। एक पूर्व खिलाड़ी ने कहा था – “हमने मैदान से ज्यादा जंग सफ़र के किराये और खाने की टेबल पर लड़ी।” अख़बारों में खबरें कम, समाज में सम्मान और भी कम। फिर भी शांता रंगास्वामी, डायना एडुल्जी, संध्या अगरवाल, और अंजुम चोपड़ा जैसी खिलाड़ियों ने हार नहीं मानी। वे हर मैच को एक “संदेश” बनाती गईं – कि बेटियों का खेल किसी से कम नहीं।

2005–06: जब WCAI का सपना बीसीसीआई की छतरी में आया

साल 2005 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंटरनेशनल विमेन्स क्रिकेट काउंसिल (IWCC) का विलय आईसीसी में हुआ। भारत में भी WCAI का बीसीसीआई में मर्ज होना तय हुआ – और 2006 में यह औपचारिक रूप से हुआ। इससे महिला क्रिकेट को संसाधन, कोचिंग, प्रायोजन और मीडिया सब कुछ मिला। पहली बार महिला खिलाड़ियों को अनुबंध, ट्रेनिंग कैंप और पेशेवर पहचान मिली। डायना एडुल्जी ने उस वक्त कहा था -“यह सिर्फ़ विलय नहीं, पुनर्जन्म है। अब महिला क्रिकेट को वह सम्मान मिलेगा जिसकी वह हक़दार है।”

नई सदी की नई टीम – मिट्टी से जन्मी बेटियाँ

2010 के दशक में महिला क्रिकेट ने नये सितारे देखे – मिताली राज, झूलन गोस्वामी, हरमनप्रीत कौर, स्मृति मंधाना, दीप्ति शर्मा, और शेफाली वर्मा। ये वे बेटियाँ थीं जिन्होंने बचपन में टेनिस बॉल से खेलना शुरू किया, और अब दुनिया की सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ों को मात दे रही थीं। हरमनप्रीत कौर का वह 171 रनों का तूफ़ान (2017 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल) महिला क्रिकेट का चेहरा बदल गया। भारत भले फ़ाइनल हार गया था, पर जीत से ज़्यादा लोगों ने “खेल” को देखा था। स्टेडियम में भीड़ थी, टीवी पर करोड़ों दर्शक – और घर-घर में एक नया सवाल उठा, “हमारी बेटियाँ कब विश्व कप जीतेंगी?”

वो रात जब सपना साकार हुआ – 2 नवम्बर 2025

और फिर वह दिन आ ही गया। भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका, फाइनल मुकाबला, नवी मुंबई। शेफाली वर्मा ने बल्ले से 87 रन ठोके, दीप्ति शर्मा ने 58 रन और 5 विकेट लेकर विपक्ष की रीढ़ तोड़ दी। भारत ने पहली बार महिला विश्व कप जीत लिया। उस पल मैदान पर झंडे नहीं, भावनाएँ लहरा रही थीं। हरमनप्रीत कौर की आँखों में आँसू थे, मिताली राज कमेंट्री बॉक्स में भावुक थीं, और लाखों लोगों ने महसूस किया -“अब क्रिकेट सिर्फ़ पुरुषों का नहीं रहा, यह भारत की आत्मा का खेल है।”

यह जीत सिर्फ़ खिलाड़ियों की नहीं – समाज की भी है

इस जीत ने भारत के हर गाँव की लड़की को नया आत्मविश्वास दिया। वह लड़की जो अब तक “तुम क्रिकेट नहीं खेल सकती” सुनती थी, अब कह सकती है – “क्यों नहीं?” स्कूलों में महिला कोच नियुक्त हो रहे हैं, कॉलेजों में गर्ल्स टीम बन रही हैं। मीडिया ने भी महिला क्रिकेट को अब “साइड न्यूज़” नहीं, बल्कि “हेडलाइन्स” में जगह दी है।

खेल से आगे – सामाजिक क्रांति की शुरुआत

महिला क्रिकेट की यह सफलता केवल ट्रॉफी की नहीं, सोच की भी जीत है। एक ऐसा समाज जो बेटियों को घरेलू सीमाओं तक बाँध देता था, उसने देखा कि वही बेटियाँ विश्व के सबसे बड़े मंच पर भारत का झंडा लहरा रही हैं। आज खेल केवल मनोरंजन नहीं, आत्मनिर्भरता, समानता और सम्मान का माध्यम बन चुका है। शेफाली, दीप्ति, हरमनप्रीत, स्मृति – ये नाम सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, “युग परिवर्तक” हैं।

1973 की वह फ़ाइल अब इतिहास नहीं, प्रेरणा है

लखनऊ की वह पुरानी फाइल, जिस पर “WCAI – Registered Society” लिखा था, अब एक स्मारक जैसी लगती है। वहीं से शुरू हुई यात्रा ने आज विश्व कप की ऊँचाई को छू लिया है। अगर महेन्द्र कुमार शर्मा और प्रमीलाबाई चव्हाण आज जीवित होते, तो शायद यही कहते – “हमारा सपना अब देश का गर्व बन गया है।”

अधूरी उड़ान अब पूरी है

भारत की बेटियों की यह जीत सिर्फ़ एक खेल नहीं, एक क्रांति है। इस जीत के पीछे हज़ारों अनकही कहानियाँ हैं – भूखे पेट खेलना, समाज की ताने सुनना, और फिर भी मुस्कराते रहना। आज जब स्टेडियम में तिरंगा लहराता है, तो हर वो बेटी उसमें अपनी परछाई देखती है। यह सिर्फ़ विश्व कप नहीं – एक युग की समाप्ति और दूसरे युग की शुरुआत है। अब भारत में कोई यह नहीं कहेगा, “लड़कियाँ क्रिकेट नहीं खेलतीं।” क्योंकि अब बेटियाँ कहती हैं – “हम खेलती ही नहीं, जीतती भी हैं।”

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की अब तक की उपलब्धियाँ

भारत की महिला क्रिकेट टीम ने सीमित साधनों से शुरुआत की, पर अपने समर्पण, साहस और प्रदर्शन से विश्व पटल पर गौरव का इतिहास रचा। नीचे टीम की प्रमुख उपलब्धियाँ और मील के पत्थर दिए गए हैं –

1976 – पहली टेस्ट सीरीज़ में ऐतिहासिक जीत
भारतीय महिला टीम ने वेस्टइंडीज़ के खिलाफ़ अपनी पहली टेस्ट सीरीज़ खेली और उसमें एक मैच जीतकर विश्व क्रिकेट को चौंका दिया। कप्तान थीं *शांता रंगास्वामी*।

1978 – पहला महिला विश्व कप (भारत में आयोजन)
भारत ने पहली बार महिला विश्व कप की मेज़बानी की। भले ही टीम टूर्नामेंट के पहले दौर में बाहर हो गई, लेकिन यह आयोजन भारत में महिला क्रिकेट के विस्तार का आरंभ बना।

1982 – पहला महिला विश्व कप फाइनल चरण (न्यूज़ीलैंड)
भारत ने इस विश्व कप में मजबूत प्रदर्शन किया और क्रिकेट जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

1997 – कोलकाता विश्व कप (ईडन गार्डन्स)
भारत ने घरेलू धरती पर विश्व कप फाइनल तक का सफ़र तय किया। 80,000 से अधिक दर्शकों ने महिला क्रिकेट के लिए अभूतपूर्व समर्थन दिखाया। यह मैच महिला क्रिकेट को भारत में स्थायी पहचान दिलाने वाला साबित हुआ।

2005 – दक्षिण अफ्रीका विश्व कप फाइनल
भारत ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ फाइनल खेला। कप्तान *मिताली राज* थीं। टीम भले उपविजेता रही, लेकिन इस प्रदर्शन ने महिला क्रिकेट के आत्मविश्वास को नई ऊँचाई दी।

2006 – बीसीसीआई में विलय
भारतीय महिला क्रिकेट संघ (WCAI) का बीसीसीआई में विलय हुआ। इससे महिला खिलाड़ियों को वित्तीय सुरक्षा, कोचिंग और पेशेवर माहौल मिला।

2017 – इंग्लैंड विश्व कप फाइनल
हरमनप्रीत कौर की 171* रनों की पारी ने पूरी दुनिया को भारतीय महिला क्रिकेट की ताक़त दिखाई। भारत उपविजेता रहा, लेकिन देशभर में महिला क्रिकेट का जनाधार कई गुना बढ़ा।

2020 – टी-20 विश्व कप फाइनल (मेलबर्न)
भारत पहली बार टी-20 विश्व कप के फाइनल में पहुँचा। स्टेडियम में 86,000 दर्शक – यह महिला क्रिकेट के लिए ऐतिहासिक क्षण था।

2025 – पहली बार विश्व कप विजेता (नवी मुंबई)
भारत ने दक्षिण अफ्रीका को हराकर अपना पहला महिला विश्व कप खिताब जीता। शेफाली वर्मा और दीप्ति शर्मा के हरफनमौला प्रदर्शन ने यह ऐतिहासिक पल रचा। यह जीत भारतीय महिला क्रिकेट के 50 साल पुराने सपने की पूर्णता थी।

सामान्य उपलब्धियाँ:

  • भारत अब तक 6 विश्व कप फाइनल (ODI + T20) खेल चुका है।
  • महिला क्रिकेटर ऑफ द ईयर (ICC Awards): मिताली राज (2017), स्मृति मंधाना (2018, 2022)।
  • अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित खिलाड़ी: शांता रंगास्वामी, डायना एडुल्जी, झूलन गोस्वामी, अंजुम चोपड़ा, मिताली राज आदि।
  • पद्मश्री सम्मानित खिलाड़ी: डायना एडुल्जी, अंजुम चोपड़ा, झूलन गोस्वामी, मिताली राज।
  • बीसीसीआई सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट: 2018 से लागू, जिससे खिलाड़ियों को स्थायी वेतन व बीमा सुरक्षा मिली।

“पचास वर्षों की इस यात्रा ने साबित किया – जहाँ इच्छा है, वहाँ इतिहास है। भारतीय महिला क्रिकेट अब प्रेरणा नहीं, प्रतिष्ठा बन चुकी है।”

भारत की शेरनियाँ : संघर्ष से शिखर तक – जब बेटियों ने लिखा विश्व कप का इतिहास

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