Gold Price : मध्यमवर्गीय परिवार सावधान रहें, इस दीपावली सोना खरीदने से पहले सोचें
इस दीपावली सोना खरीदने से पहले मध्यमवर्गीय परिवारों को सोच-समझकर कदम उठाना चाहिए। रिकॉर्ड कीमतों और बाजार की अनिश्चितता के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि सोना अब सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि जोखिम बनता जा रहा है। इस बार कीमतें लाख के पार हैं, जिससे आम खरीदारों में असमंजस है। वित्तीय सलाहकारों का सुझाव है कि जल्दबाज़ी में बड़ी खरीद से बचें और छोटे-छोटे निवेश करें। दीपावली की परंपरा निभाएँ, लेकिन विवेक और संयम के साथ- क्योंकि समझदारी से खरीदा गया सोना ही असली सुरक्षा और शुभता का प्रतीक है।
- दीपावली पर सोना खरीदने की परंपरा इस बार चिंता के साथ जुड़ी है। ऊँची कीमतों और बाजार की अनिश्चितता के बीच विशेषज्ञों ने मध्यमवर्गीय परिवारों को सावधानी बरतने और सोच-समझकर निवेश करने की सलाह दी है।
भारत में दीपावली का मतलब सिर्फ दीपों का उत्सव नहीं, बल्कि आशाओं, परंपराओं और समृद्धि का प्रतीक है। जब अंधकार को मिटाने के लिए घरों में दीये जलते हैं, तब बाजारों में भी उजाला लौट आता है। हर घर में तैयारी होती है – नए कपड़े, मिठाइयाँ, सजावट और सोने की खरीदारी। भारतीय संस्कृति में सोना न केवल आभूषण है, बल्कि आस्था, सुरक्षा और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना गया है। लेकिन इस साल इस पारंपरिक विश्वास के बीच एक नई दुविधा खड़ी है- क्या इस दीपावली सोना खरीदना समझदारी होगी या जोखिम?
देश के पारंपरिक बाजारों में इस समय हलचल तो है, लेकिन खरीदारों के कदमों में झिझक भी साफ दिखती है। वाराणसी के चौक , दिल्ली के करोल बाग, जयपुर के जौहरी बाजार और मुंबई के झावेरी बाजार में रौनक तो है, पर वह पहले जैसी बेफिक्री नहीं। दुकानदार बताते हैं कि ग्राहक आ रहे हैं, देख रहे हैं, पर खरीदने से पहले कई बार सोच रहे हैं। एक जौहरी कहते हैं- “भाव इतना ऊँचा है कि लोग विश्वास से ज्यादा डर लेकर आते हैं।” इस बार सोना अपने अब तक के सर्वोच्च स्तर पर है। बाजार में 24 कैरेट सोना 1,20,000 प्रति 10 ग्राम तक जा चुका है। ये सिर्फ भाव नहीं, बल्कि एक ऐसा स्तर है जहाँ उत्सव और विवेक के बीच सीधी टक्कर है।
1990 में जब सोना मात्र 3,200 प्रति 10 ग्राम था, तब से लेकर आज तक कीमतों ने लगभग तीस गुना छलांग लगाई है। इस सफ़र में कई उतार-चढ़ाव आए- 2008 की मंदी, 2011 का उछाल, 2020 की महामारी और अब वैश्विक अस्थिरता। पर इस बार की तेजी कुछ अलग है, क्योंकि यह उत्सव या निवेश नहीं, बल्कि असुरक्षा का परिणाम है। विश्व स्वर्ण परिषद की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि सोने की मांग में निवेश का हिस्सा बढ़ रहा है, जबकि आभूषणों की बिक्री में गिरावट देखी जा रही है। इसका अर्थ है कि लोग इसे सजने-संवरने के लिए नहीं, बल्कि डर से खरीद रहे हैं।
मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यही डर सबसे बड़ी उलझन है। यह वही वर्ग है जो अपनी हर कमाई की योजना बनाता है- बच्चों की पढ़ाई, मकान की ईएमआई, बुज़ुर्गों की दवा, और त्यौहार की तैयारी। दीपावली उनके लिए सिर्फ उत्सव नहीं, सालभर की मेहनत का भावनात्मक पुरस्कार है। लेकिन जब सोने के दाम लाख के पार हों, तब खरीदने से पहले रुकना स्वाभाविक है। कई परिवार कहते हैं- “दिल चाहता है खरीद लें, पर जेब कहती है रुक जाओ।”
आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सावधानी सही है। क्योंकि जब सोना अपने ऐतिहासिक उच्चतम स्तर पर हो, तब इसमें निवेश करना जोखिम भरा होता है। सोना अपनी प्रकृति से सुरक्षित संपत्ति है, लेकिन जब यह महँगा होता है तो खरीदने वाला लंबे समय तक फंसा रह सकता है। 2011 में भी यही हुआ था- जब चांदी 56,900 प्रति किलो तक पहुँची, तो कई लोगों ने खरीदारी की, लेकिन अगले कुछ वर्षों में जब कीमतें 37,000 तक आ गईं, तो उन्हें भारी नुकसान झेलना पड़ा। यही भय अब सोने के बाजार में भी झलक रहा है।
बाजार में एक अजीब स्थिति है- लोग सोना चाहते हैं, पर खरीदने से डरते हैं। दुकानदार कहते हैं कि पहले जहाँ ग्राहक एक बार में 20 ग्राम तक का सोना लेते थे, अब वही लोग 5 ग्राम में संतोष कर रहे हैं। यह सिर्फ आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि विवेक का संकेत है। लोगों ने सीखा है कि सोना भावनाओं से नहीं, समझ से खरीदना चाहिए।
वित्तीय सलाहकार कहते हैं कि इस समय ‘धीरे और सोच-समझकर’ निवेश करने की रणनीति सबसे सुरक्षित है। एकमुश्त रकम लगाने की बजाय छोटे-छोटे हिस्सों में खरीदी करनी चाहिए, ताकि औसत लागत घटे और जोखिम कम रहे। इसे डॉलर कॉस्ट एवरेजिंग कहा जाता है। यानी यदि कोई हर महीने थोड़ा-थोड़ा सोना खरीदे, तो लंबे समय में उसका निवेश संतुलित रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यमवर्गीय परिवारों को अपनी कुल बचत का 5 से 10 प्रतिशत से अधिक सोने में नहीं लगाना चाहिए।
यह सच है कि सोना दीर्घकालीन सुरक्षा देता है, लेकिन यह भी सच है कि अल्पकाल में इसकी चमक घट सकती है। सोने की कीमतें सिर्फ भारत के बाजार से तय नहीं होतीं, बल्कि डॉलर, अंतरराष्ट्रीय ब्याज दरों और वैश्विक संकटों पर भी निर्भर करती हैं। अभी दुनिया में आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता के कारण निवेशक सोने की ओर झुक रहे हैं। लेकिन जैसे ही हालात स्थिर होते हैं, सोने की मांग घटती है और कीमतें नीचे आती हैं। ऐसे में जो परिवार अभी ऊँचे भाव पर खरीदेंगे, वे आने वाले महीनों में अस्थिरता का सामना कर सकते हैं।
कई लोगों के लिए डिजिटल गोल्ड एक नया विकल्प बनकर उभरा है। इससे छोटी रकम में भी निवेश संभव है, और भंडारण की दिक्कत नहीं। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि डिजिटल गोल्ड पर नियामक निगरानी सीमित है। इसलिए खरीदने से पहले प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता ज़रूर जांचें। इस बीच गोल्ड ईटीएफ यानी इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड फंड में भी इस साल रिकॉर्ड निवेश देखा गया है। इसका मतलब यह है कि निवेशक सुरक्षा की तलाश में हैं, लेकिन बाज़ार में पारंपरिक खरीदार कम हो गए हैं।
भारत में सोने की परंपरा सदियों पुरानी है। यह सिर्फ धन नहीं, बल्कि पीढ़ियों की पहचान है। दादी के कंगन, माँ की चूड़ियाँ और बेटी के लिए रखा गया हार- हर घर में सोना भावनाओं की यादें सहेजता है। लेकिन भावनाओं के इस ताने-बाने में अब आर्थिक विवेक को शामिल करना समय की जरूरत है। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए त्यौहार की चमक तब ही सच्ची होगी जब वह विवेक के प्रकाश से जुड़ी हो।
विशेषज्ञ कहते हैं कि इस समय संयम ही सबसे बड़ा निवेश है। अगर आने वाले महीनों में बाजार में थोड़ा सुधार आता है, तो वही खरीद का सही अवसर होगा। दीपावली की खरीदारी ज़रूर करें, पर उतनी ही जितनी आवश्यकता हो। परंपरा निभाना शुभ है, पर अंधाधुंध खरीदारी से बचना समझदारी है। त्योहार का अर्थ सिर्फ खर्च नहीं, संतुलन भी है।
सरकार और वित्तीय संस्थाएँ भी मानती हैं कि सोने की कीमतों का असर सीधे अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जब सोना महँगा होता है, तो लोग अन्य वस्तुओं की खरीद घटा देते हैं, जिससे उपभोग घटता है। यही वजह है कि सरकार सोने के आयात पर निगरानी रखती है। आने वाले समय में यदि आयात शुल्क घटता है, तो बाजार में कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन निकट भविष्य में कीमतों में बड़ी गिरावट की उम्मीद फिलहाल नहीं है।
इस साल की दीपावली एक परीक्षा जैसी है- परंपरा और विवेक की। परिवारों को तय करना है कि वे भावना से खरीदेंगे या समझ से। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह समय खास है, क्योंकि यही वह वर्ग है जो देश की आर्थिक धारा को दिशा देता है। यदि वही सावधान रहेगा, तो पूरा बाजार संतुलित रहेगा। दीपावली का अर्थ सिर्फ रोशनी नहीं, संतुलन और शुभता है। और शुभता वहीं है, जहाँ विवेक है।
इसलिए इस दीपावली सोना ज़रूर देखें, पर तुरंत न खरीदें। बाजार का मिजाज समझें, भाव में गिरावट या स्थिरता का इंतजार करें। अगर खरीदें तो धीरे-धीरे, आवश्यकता के अनुसार और भरोसेमंद स्रोत से। याद रखें, सोना निवेश है, पर विवेक ही असली सुरक्षा है। दीपों की रोशनी में निर्णय का उजाला भी होना चाहिए। तभी दीपावली की असली चमक बरकरार रहेगी।
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