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विभाजन की विभीषिका से आज भी दहल उठता है दिल : बलवंत सिंह

झांसी । 15 अगस्त 1947 को जहां भारत एक तरफ़ आज़ादी का जश्न मना रहा था तो वहीं दूसरी ओर विभाजन का दंश भी झेल रहा था। बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे थे। कई लोगों को अपना घर, जमीन, कामकाज छोड़ कर पाकिस्तान से हिंदुस्तान आना पड़ा। मार-काट के बीच 15 लाख से ज्यादा लोगों ने इस विभाजन का दंश झेला था।

विभाजन विभीषिका का दंश झेलने वाले इन्हीं में से एक झांसी निवासी बलवंत सिंह चावला भी हैं। बलवंत सिंह युवाओं से कहते हैं की हम सबको देश को अखंड रखने का प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए। विभाजन की याद करते हुए वह बताते हैं कि वह भयानक मंजर याद करके आज भी उनके सामने वही दहशतजदा करने वाले दृश्य घूमने लगते हैं।

बलवंत सिंह बताते हैं कि जिस क्षेत्र में वह रहते थे, वहां दंगे जैसे माहौल नहीं थे। गांव के मुसलमानों ने उनका पूरा साथ दिया। शुरूआत में उनके साथी उनसे कहते रहे कि पाकिस्तान में ही रुक जाइए, लेकिन,अपने देश के प्रति प्यार के चलते उन्होंने हिंदुस्तान आने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि यह हमारा उस समय सौभाग्य ही रहा था। अधिकतर लोग तो हिन्दुस्तान आ गए थे पर जो वहां रह गए उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बना दिया गया।

बलवंत सिंह चावला के पुत्र डॉ. आर. एस. चावला ने बताया कि उनके पिताजी जब रावलपिंडी रेलवे स्टेशन पहुंचे तो वहां जितनी भी ट्रेन आ रही थीं, उसमें सिर्फ लाशें थीं। बलवंत सिंह और उनके साथियों ने सबसे आखिरी ट्रेन पकड़ी और सभी गेट बंद कर लिए। इसके बाद वह ट्रेन जिन भी स्टेशनों से गुजरी वहां उन्होंने गेट नहीं खोले और ऐसे ही मुश्किलों का सामना करते हुए अमृतसर स्टेशन पर पहुंचे थे। इसके बाद उन्होंने यहां कई अलग अलग काम किए और अंत में झांसी में कपड़े की दुकान शुरू की। इस दुकान को आज उनके बेटे चरणजीत चावला संभालते हैं।

गुरुद्वारा व पुश्तैनी मकान की आती है याद

1947 में बलवंत सिंह पाकिस्तान के गुजरात जिले के सोहावा गांव से हिंदुस्तान आए थे। वह बताते हैं कि उनका परिवार वहां काफी संपन्न था लेकिन विभाजन के बाद वह सब कुछ छोड़कर हिंदुस्तान आए। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने पूर्वजों का घर और गुरुद्वारे की आज भी बहुत याद आती है।(हि.स.)

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