
- गिरीश पांडेय
हमारे लिए तो बाबा भगवान श्रीराम सरीखे हैं। जिस तरह राम ने अहिल्या का उद्धार किया था ठीक उसी तरह बाबा ने हमारा किया। उनके आने के पहले हमारे बारे में कोई नहीं जानता ही नहीं था,पूछने और हमारी दुश्वारियों के बारे में जानना तो दूर की बात थी। आज इस वीरान जंगल में आप जो बहार देख रहे हैं वह बाबा का ही कृपा है। हमारी बस्ती में दिवाली के दिन जलने वाला हर दीपक बाबा के ही नाम होता है। क्योंकि शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य सुविधाओं का उजाला तो यहां बाबा का ही किया हुआ है।

यह कहना है रामगणेश का। वह जंगल तिकोनिया नम्बर तीन के पूर्व मुखिया रह चुके हैं। ऐसा कहने वाले अकेले रामगणेश नहीं हैं। शब्द अलग हो सकते हैं पर बस्ती के हर व्यक्ति का मनोभाव यही है। बच्चों में तो पहले भी और आज भी योगी आदित्यनाथ टॉफी बाबा के नाम से जाने जाते हैं।

दरअसल उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से का एक प्रमुख शहर है, “गोरखपुर” प्राचीन काल से ऐतिहासिक एवं धार्मिक अहमियत वाला यह शहर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह जनपद भी है। मुख्यमंत्री जिस नाथ पंथ से संबधित हैं उसका मुख्यालय माना जाने वाला गोरखनाथ मन्दिर एवं मठ भी यहीं स्थित है। योगी इस मठ के पीठाधीश्वर भी हैं। सस्ते में धार्मिक साहित्य उपलब्ध कराने वाला गीताप्रेस भी यहीं है।
करीब डेढ़ दशक से हर दिवाली के दिन योगी इस बस्ती में आते हैं
गोरखपुर से ही लगे कुसम्ही जंगल है। इसीमें स्थित है वनटांगिया बस्ती “जंगल तिकोनिया नम्बर तीन” पिछले कई वर्षों से योगी के दीपावली की शुरुआत इसी बस्ती से होती है। इस दिन सुबह की रूटीन दिनचर्या के बाद योगी इस अपने समर्थकों के साथ जंगल में बसी इस बस्ती में जाते रहे हैं। यहां प्राइमरी स्कूल** के अस्थाई ढांचे में वह बच्चों एवं स्थानीय लोगों से मिलते हैं।

कुल मिलाकर माहौल गाँव के किसी स्कूल के आयोजन जैसा होता था। बच्चों को सुनने, दुलारने एवं उनको पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने के बाद सबको स्कूली बैग, साल भर के लिए पढ़ाई के उपयोग में आने वाली स्टेशनरी, मिठाई और दीपावली के लिए आतिशबाजी के कुछ सामान देते थे। मंदिर वापस आने के पहले अमूमन उनका एक पड़ाव बेतियाहाता स्थित चन्द्रलोक कुष्ठाश्रम होता था। वहां भी वनटांगिया बस्ती जैसा ही कार्यक्रम होता था।
मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वनटांगिया बस्ती में जाने का सिलसिला उसी तरह जारी है। अलबत्ता पद के अनुसार आयोजन की भव्यता बढ़ गई है। साथ ही अब तक के कार्यकाल में मुख्यमंत्री ने इस बस्ती को इतना दिया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।
2009 में वनटांगिया बस्ती में पहली बार योगी ने मनायी दिवाली
वर्ष 2009 से बतौर गोरखपुर के सांसद योगी का दीपावली के दिन यहां की वनटांगिया बस्ती में जाना शुरू हुआ। उसके बाद आम लोगों को इस बस्ती के बारे में पता चला। उस समय तक इनकी बस्तियों को राजस्व गाँव का दर्जा नहीं हासिल था। इनको मतदान का भी अधिकार नहीं था। एक तरीके से यह आजाद भारत के गुलाम नागरिक थे। वोट देने का अधिकार नहीं होने से किसी जनप्रतिनिधि को इनकी फिक्र भी नहीं थी। वन विभाग के नियमानुसार वे वहां किसी तरह का स्थाई निर्माण भी नहीं करा सकते थे। लिहाजा फूस की झोपड़ियों में रहना इनकी विवशता थी।
समय-समय पर विभागीय उत्पीड़न अलग से।ऐसे समय में इनकी बस्तियों को राजस्व गाँव का दर्जा एवं मताधिकार का अधिकार दिलाने के लिए योगी संसद में इनकी आवाज बन गए।इस बीच इनको समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए इनकी शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर भी गोरखनाथ मंदिर से जुड़ी संस्थाओं ने ध्यान देना शुरू किया।
जब योगी पर दर्ज हुई एफआईआर
सबसे पहले यहां लोहे के एंगिल के सहारे एक छोटा सा शेड डालकर प्राइमरी स्कूल की व्यवस्था की गई। जब यह काम हो रहा था तो वन विभाग ने इसे स्थाई ढांचा मानकर योगी समेत कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज करा दिया। व्यवस्था यह की गई कि प्राइमरी की शिक्षा के बाद आगे की शिक्षा के लिए यहां के बच्चे मंदिर के शैक्षणिक प्रकल्प की संस्था महाराणा शिक्षा परिषद की ओर से संचालित एमपी कृषक इंटर कॉलेज और आगे की शिक्षा के लिए एमपी पीजी कालेज जंगल धूसड़ जा सकेंगे। इनसे किसी भी तरह का शुल्क नहीं लिया जाएगा। इस बीच इनके स्वास्थ्य की जांच के लिए मंदिर से ही जुड़े गुरु श्री गोरक्षनाथ अस्पताल की मोबाइल वैन भी नियमित अंतराल पर वहां जाने लगी।
मुख्यमंत्री बनने के बाद पूरी कर दी सौ साल की कसक
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने वनटांगिया समुदाय की सौ साल की कसक मिटा दी है। लोकसभा में वनटांगिया अधिकारों के लिए लड़कर 2010 में अपने स्थान पर बने रहने का अधिकार पत्र दिलाने वाले योगी ने सीएम बनने के बाद अपने कार्यकाल के पहले ही साल वनटांगिया गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा दे दिया। राजस्व ग्राम घोषित होते ही ये वनग्राम हर उस सुविधा के हकदार हो गए जो सामान्य नागरिक को मिलती है।
इसके बाद उन्होंने वनटांगिया गांवों को आवास, सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र और आरओ वाटर मशीन जैसी सुविधाओं से आच्छादित कर दिया है। वनटांगिया गांवो में आज सभी के पास अपना सीएम योजना का पक्का आवास, कृषि योग्य भूमि, आधार कार्ड, राशन कार्ड, रसोई गैस है,बिजली, पक्की सड़कें, इन पर स्ट्रीट लाइट,कंपोजिट स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र,स्वयं सहायता समूह, पात्रता के अनुसार सबको पेंशन आदि की सुविधा है।यही वजह है कि इस बस्ती के हर किसी को दिवाली पर पूरी शिद्दत से सबको अपने बाबा की प्रतीक्षा रहती है।
वनटांगियों के अलावा मुसहर, थारू और अन्य ऐसे लोगों को मिल रहा सरकारी योजनाओं का लाभ
इस तरह की सुविधाएं गोरखपुर, महराजगंज की वनटांगिया बस्ती के अलावा थारू, मुसहर और अन्य घुमक्कड़ जातियों के लिए भी है। सरकार से मिले इस सहयोग के कारण इस समुदाय के कुछ लोगों ने उल्लेखनीय काम किये हैं। ऐसा ही काम करने वाले महराजगंज की वनटांगिया बस्ती के बरगदवा राजा निवासी हैं रामगुलाब।
मन की बात में पीएम भी कर चुके हैं महराजगंज की वनटांगिया बस्ती का जिक्र
करीब दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात के दौरान न सिर्फ रामगुलाब का जिक्र किया था बल्कि उनसे वर्चुअल संवाद भी किया था। उनके काम की तारीफ भी की थी। रामगुलाब पौष्टिक्ता से भरपूर खासकर विटामिन ए के प्रचुर स्रोत सुनहरी शकरकंद की खेती करते हैं। एक कंपनी करार के तहत उनसे तैयार फसल ले लेती है। लिहाजा उनकी और उनसे प्रेरित होकर खेती करने वालों की आय बढ़ गई।
कौन हैं सौ साल तक उपेक्षित रहे वनटांगिया
अंग्रेजी शासनकाल में जब रेल पटरियां बिछाई जा रही थीं तो बड़े पैमाने पर जंगलों से साखू के पेड़ों की कटान हुई। इसकी भरपाई के लिए अंग्रेज सरकार ने साखू के पौधों के रोपण और उनकी देखरेख के लिए गरीब भूमिहीनों, मजदूरों को जंगल मे बसाया। साखू के जंगल बसाने के लिए वर्मा देश की टांगिया विधि का इस्तेमाल किया गया, इसलिए वन में रहकर यह कार्य करने वाले वनटांगिया कहलाए।
कुसम्ही जंगल के पांच इलाकों जंगल तिनकोनिया नम्बर तीन, रजही खाले टोला, रजही नर्सरी, आमबाग नर्सरी व चिलबिलवा में इनकी पांच बस्तियां वर्ष 1918 में बसीं। 1947 में देश भले आजाद हुआ लेकिन वनटांगियों का जीवन गुलामी काल जैसा ही बना रहा। जंगल बसाने वाले इस समुदाय के पास न तो खेती के लिए जमीन थी और न ही झोपड़ी के अलावा कोई निर्माण करने की इजाजत।
पेड़ के पत्तों को तोड़कर बेचने और मजदूरी के अलावा जीवन यापन का कोई अन्य साधन भी नहीं। और तो और इनके पास ऐसा कोई प्रमाण भी नहीं था जिसके आधार पर वह सबसे बड़े लोकतंत्र में अपने नागरिक होने का दावा कर पाते। समय समय पर वन विभाग की तरफ से वनों से बेदखली की कार्रवाई का डर। पर ये सारी चीजें अब अतीत हो चुकी हैं। अब तो इनकी बस्तियां जंगल में मंगल का जीवंत सबूत बन चुकी हैं।



