“बिहार चुनाव : जंगलराज की परछाइयाँ फिर लौटीं”
“चारा कांड से नरसंहार तक… बिहार का अतीत फिर बना सियासी बहस का केंद्र” . “तेज़ाब से जली जिंदगियाँ, भ्रष्टाचार की गूंज और जातीय हिंसा – लौट आया पुराना बिहार” . “भूरा बाल से जंगलराज तक – क्या बिहार अतीत की परछाइयों से उभर पाएगा?” . “चंदा बाबू की चीख से सत्येन्द्र दुबे की शहादत तक – इतिहास बना चुनावी मुद्दा” .
- “लालू-राबड़ी राज की यादें, चुनावी मैदान में विपक्ष का हथियार”
- “सत्ता, संगीनें और साजिश – लालू-राबड़ी युग के काले पन्ने”
- “परिवारवाद बनाम विकास – बिहार की राजनीति का असली संघर्ष”
- “जातीय खून-खराबे से चारा घोटाले तक – बिहार का अतीत तेजस्वी की चुनौती”
- “अतीत की गूंज, भविष्य की लड़ाई – बिहार में चुनावी जंग तेज”
वरिष्ठ पत्रकार अजीत मिश्र की विशेष रिपोर्ट
बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। जैसे-जैसे तारीख़ नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे सियासत का पारा चढ़ता जा रहा है। नेताओं की रैलियाँ, यात्राएँ और भाषण एक तरफ़ मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ पुराने ज़ख्म भी कुरेदे जा रहे हैं। प्रधानमंत्री को लेकर अपशब्द कहे जाने की घटना ने इस बहस को और तेज कर दिया है। इस गहमा-गहमी में बार-बार लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल की चर्चा छिड़ रही है। जातीय संघर्ष, नरसंहार, चारा घोटाला, परिवारवाद और बाहुबलियों का आतंक—ये सब मुद्दे आज फिर चुनावी बहस का हिस्सा बन गए हैं। यह स्पेशल रिपोर्ट बताती है कि बिहार का अतीत कैसे आज की राजनीति पर भारी पड़ रहा है।
सत्ता का नया समीकरण और मंडल राजनीति
1990 का दशक बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव का गवाह बना। लालू प्रसाद यादव ने मंडल कमीशन की सिफारिशों के लागू होने के बाद पिछड़ों और अति-पिछड़ों को एकजुट कर सत्ता हासिल की। उन्होंने खुद को सामाजिक न्याय का मसीहा बताकर भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और वैश्य जैसी पारंपरिक उच्च जातियों के वर्चस्व को चुनौती दी। उनका नारा था—“सत्ता का स्वाद अब तक ऊँची जातियों ने चखा है, अब हमारी बारी है।” यही से बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय बनाम सामंती ताक़तों का विमर्श शुरू हुआ। लेकिन इस राजनीति का दूसरा पहलू भी सामने आया। जातीय ध्रुवीकरण गहराने लगा। विपक्ष ने इसे समाज को बाँटने की राजनीति बताया। ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का नारा उच्च जातियों के ख़िलाफ़ खुले संदेश की तरह गूँजा। यहाँ ‘भूरा’ का अर्थ था—भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला (वैश्य)। इस नारे ने लालू की राजनीति को धार दी, लेकिन राज्य को जातीय खाई में धकेल दिया।
जातीय संघर्ष और नरसंहारों का दौर
लालू-राबड़ी शासनकाल में बिहार बार-बार जातीय हिंसा से दहला। भूमि विवाद, संसाधनों पर नियंत्रण और सामंती ढांचे ने दलितों और पिछड़ों को निशाना बनाया। रणवीर सेना जैसे ऊँची जातियों के सशस्त्र संगठन और दलित-महादलित समुदायों के बीच टकराव ने कई गाँवों को खून से लाल कर दिया।
- 1996 – बथानी टोला नरसंहार: भोजपुर ज़िले में महिलाओं और बच्चों समेत 21 लोगों की हत्या।
- 1997 – लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार: जहानाबाद ज़िले में 58 दलित ग्रामीणों का कत्लेआम।
- 1999 – शंकर बिगहा नरसंहार: गया ज़िले में 22 लोगों की हत्या।
इन घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया और बिहार की कानून व्यवस्था को शर्मसार किया।
चारा कांड: सबसे बड़ा घोटाला
बिहार की राजनीति को सबसे गहरा झटका चारा घोटाले ने दिया। पशुपालन विभाग से फर्जी बिल और भुगतान के ज़रिए हज़ारों करोड़ की लूट हुई। इस घोटाले में नेताओं से लेकर अधिकारियों तक की मिलीभगत सामने आई। लालू प्रसाद यादव को इसका मुख्य आरोपी बनाया गया। अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और जेल भेजा। मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और सत्ता की बागडोर राबड़ी देवी के हाथों में सौंप दी गई। लालू की सजा ने पूरे देश में हलचल मचा दी। विपक्ष ने इसे बिहार की जनता के साथ धोखा बताया। हालाँकि लालू ने खुद को निर्दोष बताया और कहा कि वे राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार हुए हैं। लेकिन अदालत के फैसले ने यह साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार ने बिहार को खोखला कर दिया था। बार-बार उपचार के नाम पर मिली जमानत ने भी राजनीतिक विवाद को और हवा दी।
बाहुबलियों का उदय और शहाबुद्दीन
लालू-राबड़ी शासनकाल बाहुबलियों के उदय का भी दौर था। सीवान के मोहम्मद शहाबुद्दीन इस दौर का सबसे बड़ा प्रतीक बने। हत्या, अपहरण, रंगदारी और आतंक की लंबी फेहरिस्त उनके नाम से जुड़ी। व्यापारियों और वैश्य समाज पर सबसे अधिक अत्याचार हुआ। रंगदारी न देने पर व्यापारियों को मार दिया जाता, दुकानें लूट ली जातीं और परिवारों को उजाड़ दिया जाता।
चंदा बाबू की कहानी: तीन बेटों की दर्दनाक मौत
सीवान के चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ़ चंदा बाबू की कहानी बिहार के इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय है।
- 16 अगस्त 2004 को उनके तीन बेटों को शहाबुद्दीन के गुंडों ने तेज़ाब से नहलाकर मार डाला।
- पहले राजीव और गिरीश को तेज़ाब से जलाया गया, फिर गवाही देने वाले तीसरे बेटे की भी हत्या कर दी गई।
तीनों बेटों की मौत ने पूरे राज्य को झकझोर दिया। चंदा बाबू ने अकेले न्याय की लड़ाई लड़ी और शहाबुद्दीन को जेल तक पहुँचाया। लेकिन यह जीत अधूरी रही, क्योंकि उन्होंने अपने परिवार को खो दिया था। उनकी त्रासदी आज भी इस बात का प्रतीक है कि उस दौर में निर्दोषों के लिए न्याय कितना कठिन था।
लालू-राबड़ी शासनकाल की अन्य बड़ी घटनाएँ
- आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या (1994): गया जिले में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या।
- शिल्पी जैन हत्याकांड: रहस्यमयी परिस्थितियों में युवती और उसके दोस्त की मौत।
- चंपा विश्वास बलात्कार कांड: दलित महिला के साथ बलात्कार ने जंगलराज की पहचान को और मजबूत किया।
- इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे हत्याकांड (2003): भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले युवा इंजीनियर की हत्या।
- मंत्री बृजबिहारी हत्याकांड: पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) में मंत्री की गोली मारकर हत्या।
ये घटनाएँ बताती हैं कि उस दौर में आम नागरिक तो दूर, अधिकारी और मंत्री भी सुरक्षित नहीं थे।
दस बड़ी घटनाएँ (1990–2005)
1. जंगलराज का आरोप
2. शहाबुद्दीन का उदय और प्रभाव
3. चारा घोटाला
4. लक्ष्मणपुर-बाथे नरसंहार
5. बथानी टोला नरसंहार
6. जातीय हिंसा व भूमि विवाद
7. पुलिस व प्रशासन पर बाहुबलियों का दबाव
8. अपहरण और हत्या मामलों में कमजोर न्याय प्रक्रिया
9. बाहुबलियों को राजनीतिक संरक्षण
10. आम जनता की सुरक्षा और विश्वास का संकट
परिवारवाद और राजनीति
लालू यादव की सजा और राबड़ी देवी का मुख्यमंत्री बनना बिहार की राजनीति में परिवारवाद का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। राबड़ी देवी का राजनीति में कोई अनुभव नहीं था, लेकिन सत्ता उनके हाथों में सौंप दी गई। आज जब तेजस्वी यादव आरजेडी का चेहरा बने हैं, विपक्ष बार-बार यही सवाल उठाता है कि क्या यह पार्टी सिर्फ एक परिवार तक सीमित है।
आज का चुनावी संदर्भ
आज जब बिहार फिर चुनाव की दहलीज पर खड़ा है, विपक्ष लालू-राबड़ी राज की याद दिला रहा है। जातीय संघर्ष, नरसंहार, चारा कांड और बाहुबलियों का आतंक जनता को याद दिलाया जा रहा है। तेजस्वी यादव को इस सवाल का जवाब देना पड़ रहा है कि क्या उनकी राजनीति अतीत से अलग होगी।
- विपक्ष का प्रचार हथियार: जंगलराज और नरसंहार का हवाला।
- राजद की छवि पर दबाव: चारा कांड और पुराने अपराधों के सवाल।
- जातीय समीकरण पर असर: व्यापारी और उच्च जातियाँ भाजपा-जदयू की ओर।
- भ्रष्टाचार बनाम विकास: चारा कांड बनाम नई सोच का नैरेटिव।
- युवा मतदाता: विकास और रोजगार की उम्मीद।
- चुनावी एजेंडा का ध्रुवीकरण: अतीत बनाम वर्तमान की जंग।
आगामी विधानसभा चुनाव में लालू-राबड़ी राज की यादें सिर्फ़ इतिहास नहीं रहेंगी, बल्कि यह सक्रिय चुनावी हथियार बनेंगी। विपक्ष इसे बार-बार जनता के सामने लाएगा और राजद को सफाई देनी पड़ेगी। वैश्य समाज, व्यापारी वर्ग और उच्च जातियों के वोट बैंक पर इसका सीधा असर पड़ेगा। बिहार की राजनीति का अतीत इतना गहरा है कि वह आज भी चुनावों पर हावी है। लालू-राबड़ी राज की परछाइयाँ, चारा घोटाले की गूंज, नरसंहारों का दर्द और चंदा बाबू जैसी त्रासदियाँ आज भी जनता की स्मृति में ज़िंदा हैं। यह चुनाव सिर्फ वर्तमान का नहीं, बल्कि अतीत की गूंज का भी सामना है।
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