योगी कैबिनेट के बड़े फैसले: कर्मचारियों की संपत्ति घोषणा से लेकर नए शहर, आवास और उद्योग परियोजनाओं को मंजूरी
लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में कई अहम फैसले लिए गए। सरकारी कर्मचारियों के लिए हर वर्ष संपत्ति की घोषणा अनिवार्य की गई है, वहीं संपत्ति की रजिस्ट्री से पहले खतौनी और स्वामित्व दस्तावेजों की जांच भी जरूरी होगी। बुंदेलखंड में डेयरी परियोजनाएं, अयोध्या में स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, मेरठ में औद्योगिक क्लस्टर और कानपुर में नए सेतु निर्माण को मंजूरी दी गई। साथ ही पीएम आवास योजना 2.0, नए शहरों के विकास और ओटीएस योजना को भी स्वीकृति मिली।
- सरकारी कर्मचारियों के आचरण नियमों में बदलाव, निवेश और संपत्ति की जानकारी देना होगा अनिवार्य
लखनऊ : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की आचरण नियमावली, 1956 के नियम-21 एवं नियम 24 में संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। इस बदलाव का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों के निवेश और संपत्ति से जुड़े मामलों में अधिक पारदर्शिता लाना है। इन संशोधनों से सरकारी कर्मचारियों की वित्तीय गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ेगी और जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी। संशोधन के तहत नियम-21 में यह व्यवस्था की जा रही है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी एक कैलेंडर वर्ष में अपने मूल वेतन के छह महीने से अधिक की राशि स्टॉक, शेयर या अन्य निवेश में लगाता है, तो उसे इसकी सूचना अपने समुचित प्राधिकारी को देनी होगी।
इसी तरह नियम-24 में भी बदलाव किया गया है। अब यदि कोई कर्मचारी दो महीने के मूल वेतन से अधिक मूल्य की कोई चल संपत्ति खरीदता है, तो उसे इसकी जानकारी संबंधित प्राधिकारी को देनी होगी। पहले यह सीमा एक महीने के मूल वेतन के बराबर थी। इसके अलावा अचल संपत्ति की घोषणा से संबंधित नियम में भी संशोधन किया गया है। पहले सरकारी कर्मचारियों को हर पांच वर्ष में अपनी अचल संपत्ति की जानकारी देनी होती थी, लेकिन अब यह जानकारी हर वर्ष देना अनिवार्य किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा नियमावली में संशोधन को कैबिनेट की मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा नियमावली, 1975 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। माननीय उच्च न्यायालय की संस्तुति के आधार पर उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा (अठारहवां संशोधन) नियमावली, 2026 लागू की जाएगी। इसके तहत भर्ती, कोटा और चयन प्रक्रिया से जुड़े कुछ नियमों में बदलाव किया गया है। संशोधन के अनुसार भर्ती के स्रोत से जुड़े नियम-5, कोटा से संबंधित नियम-6, चयन प्रक्रिया से जुड़े नियम-18, पदोन्नति से संबंधित नियम-20, नियुक्ति से जुड़े नियम-22 और परिशिष्ट-1 में बदलाव किया जाएगा।
नई व्यवस्था के तहत सिविल जज (सीनियर डिवीजन) से पदोन्नति का कोटा 65 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है। यह पदोन्नति श्रेष्ठता और वरिष्ठता के आधार पर तथा उपयुक्तता परीक्षा पास करने वाले अधिकारियों को दी जाएगी। वहीं सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा के जरिए पदोन्नति का कोटा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है। इसमें वही सिविल जज शामिल हो सकेंगे, जिन्होंने उस पद पर कम से कम तीन साल की सेवा और उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में कम से कम सात साल की सेवा पूरी की हो। इसके अलावा अधिवक्ताओं (बार) से सीधी भर्ती का कोटा पहले की तरह 25 प्रतिशत ही रहेगा।
बुंदेलखंड में डेयरी क्षमता बढ़ाने की परियोजनाओं को मिली मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में बुंदेलखंड क्षेत्र में दुग्ध प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रस्ताव मंजूर किया गया। इसके तहत बुंदेलखंड पैकेज के अंतर्गत जनपद बांदा में 20 हजार लीटर प्रतिदिन क्षमता के नए डेयरी प्लांट की स्थापना और झांसी में पहले से स्थापित 10 हजार लीटर प्रतिदिन क्षमता के डेयरी प्लांट का विस्तार कर उसे 30 हजार लीटर प्रतिदिन तक बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। इन परियोजनाओं के सिविल और मैकेनिकल कार्य टर्न-की आधार पर कराने के लिए इंडियन डेयरी मशीनरी कंपनी लि. को कार्यदायी संस्था नामित किया गया है। कैबिनेट ने इस कंपनी को नियमानुसार सेंटेज चार्ज देने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है, जिसका व्यय राज्य सरकार अपने स्रोतों से वहन करेगी।
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक राज्य है और प्रदेश में दुग्ध उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में बुंदेलखंड क्षेत्र में डेयरी प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने से दुग्ध उत्पादकों को उनके दूध का बेहतर और बाजार आधारित मूल्य मिल सकेगा। इन परियोजनाओं के पूरा होने से क्षेत्र में दूध के खराब होने की समस्या कम होगी, किसानों की आय बढ़ेगी और बुंदेलखंड में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। साथ ही यह पहल प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य की दिशा में भी सहायक मानी जा रही है।
टीआई मेडिकल्स 215 करोड़ रुपये का निवेश कर स्थापित करेगी चिकित्सा उपकरण निर्माण इकाई
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र में मेडिकल डिवाइस निर्माण इकाई स्थापित करने से जुड़े प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। इसके तहत टीआई मेडिकल्स प्रा लि को भूमि सब्सिडी प्रदान करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई है। कंपनी द्वारा गौतमबुद्ध नगर स्थित यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (यीडा) के मेडिकल डिवाइस पार्क क्षेत्र में 4.48 हेक्टेयर भूमि पर करीब 215.20 करोड़ रुपये के निवेश से चिकित्सा उपकरण निर्माण इकाई स्थापित की जाएगी। यह परियोजना उत्तर प्रदेश की एफडीआई, एफसीआई और फॉर्च्यून इंडिया-500 निवेश प्रोत्साहन नीति-2023 के तहत प्रस्तावित है।
कैबिनेट के निर्णय के अनुसार कंपनी को अनुमन्य सब्सिडी के तहत 14.77 करोड़ रुपये की राशि प्रतिपूर्ति के रूप में प्रदान की जाएगी। यह राशि केंद्र सरकार की मेडिकल डिवाइस पार्क योजना के अंतर्गत पहले से प्राप्त सब्सिडी को समायोजित करने के बाद दी जाएगी। इस निवेश से प्रदेश में मेडिकल डिवाइस निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा, औद्योगिक गतिविधियां बढ़ेंगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे। यह पहल राज्य को निवेश के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक होगी।
इस परियोजना से संबंधित प्रस्ताव पर पहले विभिन्न स्तरों पर विचार किया गया था। उत्तर प्रदेश की एफडीआई, एफसीआई एवं फॉर्च्यून ग्लोबल 500/फॉर्च्यून इंडिया 500 निवेश प्रोत्साहन नीति-2023 के तहत प्राधिकृत समिति की 5 जुलाई 2024 को हुई बैठक में परियोजना को मंजूरी दी गई थी और कंपनी को 22 जुलाई 2024 को पात्रता प्रमाणपत्र भी जारी किया गया। बाद में 15 मई 2025 को हुई इम्पावर्ड कमेटी की बैठक में सब्सिडी से जुड़े बिंदुओं पर विचार किया गया। मेडिकल डिवाइस पार्क योजना के अंतर्गत कंपनी को पहले से केंद्र सरकार की ओर से सब्सिडी प्राप्त हो चुकी है। इसी आधार पर एफडीआई नीति के तहत अनुमन्य कुल सब्सिडी ₹41.52 करोड़ में से पहले प्राप्त सब्सिडी घटाकर शेष ₹14.77 करोड़ की राशि यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) द्वारा कंपनी को प्रतिपूर्ति के रूप में देने का प्रस्ताव तैयार किया गया, जिसे अब मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिल गई है।
अयोध्या में बनेगा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, भूमि हस्तांतरण को योगी कैबिनेट की मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में जनपद अयोध्या में स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के निर्माण के लिए भूमि हस्तांतरण के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। यह स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स मुख्यमंत्री वैश्विक नगरोदय योजना के तहत बनाया जाएगा।प्रस्ताव के अनुसार अयोध्या के चक नंबर-4, मोहल्ला वशिष्ठ कुंड, परगना हवेली अवध, तहसील सदर में स्थित नजूल भूमि के सात गाटा नंबर (1026, 1027, 1029, 1030, 1031, 1033 मि. और 1035) कुल लगभग 2500 वर्गमीटर क्षेत्रफल को अयोध्या म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के पक्ष में हस्तांतरित किया जाएगा।
जिलाधिकारी अयोध्या द्वारा नगर आयुक्त के अनुरोध पर यह प्रस्ताव सरकार को भेजा गया था। कैबिनेट के निर्णय के अनुसार यह भूमि कुछ शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन नगर निगम अयोध्या को निःशुल्क आवंटित की जाएगी।सरकार का उद्देश्य इस भूमि पर आधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का निर्माण कर खेल सुविधाओं को बढ़ावा देना और स्थानीय युवाओं को बेहतर खेल अवसंरचना उपलब्ध कराना है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह भूमि हस्तांतरण अपवाद स्वरूप किया जा रहा है और इसे भविष्य में उदाहरण के रूप में नहीं माना जाएगा।
नए शहरों के विकास को रफ्तार, 8 शहरों को पहले चरण के लिए ₹425 करोड़
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री शहरी विस्तारीकरण/नए शहर प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत प्रदेश के आठ शहरों के विकास के लिए ₹425 करोड़ की धनराशि स्वीकृत करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। इस योजना का उद्देश्य तेजी से बढ़ रही शहरी आबादी को ध्यान में रखते हुए नए शहरों का सुनियोजित और सुव्यवस्थित विकास करना तथा लोगों को बेहतर आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराना है।कैबिनेट के निर्णय के अनुसार बरेली, वाराणसी, उरई, चित्रकूट, बांदा, प्रतापगढ़, गाजीपुर और मऊ में नए शहरों के समग्र विकास के लिए सीड कैपिटल के रूप में यह धनराशि जारी की जाएगी। योजना के तहत भूमि अर्जन में आने वाले खर्च का अधिकतम 50 प्रतिशत तक राज्य सरकार सीड कैपिटल के रूप में उपलब्ध कराती है, जिसे अधिकतम 20 वर्ष की अवधि के लिए दिया जाता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में इस योजना के लिए कुल ₹3000 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जिसमें से पहले चरण में ₹425 करोड़ जारी किए जाएंगे।
किफायती आवास और किराये के घरों के निर्माण को मिलेगा बढ़ावा, लाभार्थियों को केंद्र व राज्य से आर्थिक सहायता
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में प्रधानमंत्री आवास योजना 2.0 के तहत किफायती आवास (एएचपी) और किफायती किराया आवास (एआरएच) घटकों के क्रियान्वयन के लिए नई नीति जारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप प्रदेश में वर्ष 2026 के लिए इन दोनों घटकों के संचालन हेतु विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। योजना के तहत मध्यम और दुर्बल आय वर्ग के लोगों के लिए किफायती दरों पर आवास उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है।
इस योजना के अंतर्गत आवास निर्माण के लिए प्रत्येक लाभार्थी को केंद्र सरकार की ओर से 1.50 लाख रुपये और राज्य सरकार की ओर से 1 लाख रुपये की सहायता दी जाएगी। इसके अलावा व्हाइटलिस्टेड परियोजनाओं में काम करने वाले डेवलपर्स को भू-उपयोग परिवर्तन शुल्क, मानचित्र स्वीकृति शुल्क, बाह्य विकास शुल्क में छूट दी जाएगी, वहीं लाभार्थियों को स्टाम्प शुल्क में भी राहत मिलेगी।किफायती किराया आवास (एआरएच) मॉडल-2 के तहत शहरी गरीबों, कामकाजी महिलाओं, औद्योगिक इकाइयों के कर्मचारियों तथा ईडब्ल्यूएस और एलआईजी वर्ग के परिवारों के लिए निजी और सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा किराये के आवास बनाए जाएंगे, जिनका संचालन और रखरखाव भी वही संस्थाएं करेंगी। सरकार का उद्देश्य इस योजना के माध्यम से शहरों में सस्ती और सुलभ आवासीय सुविधा उपलब्ध कराना है।
अनधिकृत लोगों से कांशीराम आवास खाली करवाकर पात्र दलितों को आवंटित किए जाएंगे
निर्णय की जानकारी देते हुए वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने बताया कि बैठक के दौरान कांशीराम आवासों को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। उन्होंने कहा कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में बने कांशीराम आवास योजना के कई आवासों पर अनधिकृत कब्जे की शिकायतें सामने आई हैं। ऐसे आवासों की पहचान कर उन्हें खाली कराया जाएगा और उनकी रंगाई-पुताई व मरम्मत कराकर पुनः पात्र दलित परिवारों को आवंटित किया जाएगा। इस प्रस्ताव को कैबिनेट ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया। सरकार का उद्देश्य इन आवासों को फिर से जरूरतमंद दलित परिवारों को उपलब्ध कराना है।
फर्जी और विवादित जमीन की रजिस्ट्री पर लगेगी रोक, आम लोगों को मुकदमेबाजी से राहत
लखनऊ, 10 मार्च। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में संपत्ति की रजिस्ट्री प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए महत्वपूर्ण प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। इसके तहत रजिस्ट्री से पहले खतौनी और स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण अनिवार्य किया जाएगा, ताकि फर्जी और विवादित जमीन की रजिस्ट्री को रोका जा सके।
निर्णय की जानकारी देते हुए स्टाम्प एवं पंजीयन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रविन्द्र जायसवाल ने बताया कि वर्तमान समय में कई मामलों में यह देखा गया है कि संपत्ति के वास्तविक स्वामी के अलावा अन्य व्यक्ति द्वारा संपत्ति का विक्रय कर दिया जाता है। इसके अलावा निषेधित या प्रतिबंधित संपत्ति का विक्रय, अपने अधिकार से अधिक संपत्ति का विक्रय, कुर्क संपत्ति का विक्रय तथा केंद्र या राज्य सरकार के स्वामित्व वाली भूमि के विक्रय विलेख का भी पंजीकरण करा लिया जाता है। ऐसे मामलों के कारण बाद में विवाद उत्पन्न होते हैं और लोगों को लंबे समय तक मुकदमेबाजी और अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ता है।वर्तमान में रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 के अंतर्गत किसी भी विलेख के पंजीकरण से इनकार करने के संबंध में उप-निबंधक को धारा 35 के तहत बहुत सीमित अधिकार प्राप्त हैं। इसी कारण कई बार संदिग्ध मामलों में भी रजिस्ट्री हो जाती है। इन समस्याओं को देखते हुए उत्तर प्रदेश में रजिस्ट्रेशन अधिनियम और नियमावली में संशोधन करने का निर्णय लिया गया है।
प्रस्तावित संशोधन के तहत अधिनियम में धारा 22 और धारा 35 के बाद नई धारा 22-A, 22-B और 35-A जोड़ी जाएंगी। धारा 22-A के तहत कुछ श्रेणियों के दस्तावेजों के पंजीकरण पर रोक लगाई जा सकेगी। धारा 22-B के तहत पंजीकरण से पहले अचल संपत्ति की पहचान सुनिश्चित करने के प्रावधान किए गए हैं। वहीं धारा 35-A(1) के अनुसार यदि धारा 17(1) के अंतर्गत आने वाली अचल संपत्ति के पंजीकरण के लिए प्रस्तुत लिखतों के साथ स्वामित्व, अधिकार, पहचान, विधिपूर्ण कब्जा या अंतरण से संबंधित आवश्यक दस्तावेज संलग्न नहीं होंगे, जिन्हें राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना के माध्यम से निर्धारित करेगी, तो पंजीकरण अधिकारी उस दस्तावेज को पंजीकृत करने से इनकार कर सकेगा।इस व्यवस्था के लागू होने से फर्जी और विवादित संपत्तियों की रजिस्ट्री पर प्रभावी रोक लगेगी और आम लोगों को अनावश्यक कोर्ट केस तथा अन्य परेशानियों से राहत मिलेगी। उल्लेखनीय है कि अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार के संशोधन कर ऐसे मामलों पर नियंत्रण का प्रयास किया गया है। यह प्रस्ताव भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि-6 के अंतर्गत लाया गया है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब इससे संबंधित विधेयक को विधानमंडल में प्रस्तुत कर उसकी स्वीकृति प्राप्त की जाएगी।
एकमुश्त समाधान योजना (ओटीएस) 2026 को योगी कैबिनेट की मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में विकास प्राधिकरणों, आवास एवं विकास परिषद तथा विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरणों की संपत्तियों के डिफॉल्टरों के लिए एकमुश्त समाधान योजना (ओटीएस) 2026 लागू करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। इस योजना का उद्देश्य लंबे समय से बकाया धनराशि की वसूली करना और डिफॉल्टर आवंटियों को राहत देना है।वित्त मंत्री ने बताया कि विकास प्राधिकरणों और संबंधित संस्थाओं में संपत्तियों से जुड़े कुल 18,982 डिफॉल्टर प्रकरण हैं, जिनमें करीब 11,848.21 करोड़ रुपये की धनराशि बकाया है। इसी तरह मानचित्र स्वीकृति से जुड़े 545 डिफॉल्टर मामलों में लगभग 1,482.10 करोड़ रुपये की राशि लंबित है। इन बकाया रकम की वसूली के लिए ओटीएस योजना लाई जा रही है।
योजना के तहत सभी प्रकार की संपत्तियों (आवासीय, व्यावसायिक तथा अन्य आवंटित संपत्तियों) पर यह योजना लागू होगी। इसमें नीलामी या आवंटन पद्धति से दी गई संपत्तियां भी शामिल होंगी। साथ ही सरकारी संस्थानों, स्कूलों, चैरिटेबल संस्थाओं और अन्य संगठनों को आवंटित संपत्तियों पर भी यह योजना लागू होगी। मानचित्र स्वीकृति से जुड़े डिफॉल्टर मामलों को भी इसमें शामिल किया गया है।ओटीएस योजना के तहत डिफॉल्टर आवंटियों से केवल साधारण ब्याज लिया जाएगा और दंड ब्याज पूरी तरह माफ किया जाएगा। योजना के लिए आवेदन करने की अवधि तीन माह होगी। प्राप्त आवेदनों का निस्तारण भी तीन माह के भीतर किया जाएगा। योजना की जानकारी सभी डिफॉल्टरों को ईमेल, एसएमएस और पत्र के माध्यम से दी जाएगी।
भुगतान की व्यवस्था भी तय की गई है। यदि ओटीएस के बाद देय राशि 50 लाख रुपये तक है, तो उसका एक-तिहाई भाग मांग पत्र जारी होने के 30 दिनों के भीतर जमा करना होगा और बाकी दो-तिहाई राशि तीन मासिक किस्तों में जमा करनी होगी। वहीं यदि देय राशि 50 लाख रुपये से अधिक है, तो एक-तिहाई राशि 30 दिनों के भीतर और शेष दो-तिहाई राशि तीन द्विमासिक किस्तों में छह माह के भीतर जमा करनी होगी। इस योजना से डिफॉल्टरों को बकाया चुकाने का अवसर मिलेगा और विकास प्राधिकरणों तथा आवासीय संस्थाओं की बड़ी राशि वापस प्राप्त हो सकेगी।
मेरठ में बनेगा इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स क्लस्टर, ₹213.81 करोड़ के कार्यों की मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में अटल इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन के तहत जनपद मेरठ में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग एंड लॉजिस्टिक्स क्लस्टर (आईएमएलसी) के लिए अवस्थापना विकास कार्यों को मंजूरी दी गई है। इन कार्यों पर लगभग ₹213.81 करोड़ खर्च किए जाएंगे।प्रदेश में उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (यूपीडा) द्वारा विकसित एक्सप्रेसवे (आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे और निर्माणाधीन गंगा एक्सप्रेसवे) के किनारे 29 स्थानों पर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना के तहत इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग एंड लॉजिस्टिक्स क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं।
इसी क्रम में मेरठ नोड में सड़क निर्माण, आरसीसी नालियां, आरसीसी कल्वर्ट, फायर स्टेशन, भूमिगत जलाशय, जलापूर्ति लाइन, फेंसिंग, बिजली व्यवस्था और अन्य जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाएगा। इन सभी कार्यों को ईपीसी (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) मोड पर कराया जाएगा।व्यय-वित्त समिति द्वारा इन कार्यों के लिए लगभग ₹21381.93 लाख की लागत का आकलन किया गया था, जिसे अब कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। इस क्लस्टर के बनने से मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
ट्रांसगंगा सिटी को कानपुर शहर से जोड़ने के लिए दो-दो लेन के दो नए पुल का प्रस्ताव, परियोजना के लिए ₹460 करोड़ स्वीकृत
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में जनपद कानपुर में ट्रांसगंगा सिटी को शहर से जोड़ने के लिए गंगा नदी पर नया सेतु बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। यह कार्य अटल इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन के तहत कराया जाएगा।इस परियोजना के अंतर्गत गंगा नदी पर चार लेन का उच्च स्तरीय सेतु और उससे जुड़े पहुंच मार्ग का निर्माण किया जाना है। प्रस्तावित स्थल पर उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (यूपीसीडा) द्वारा ट्रांसगंगा सिटी विकसित की जा रही है, जहां कानपुर और आसपास की औद्योगिक इकाइयों को स्थानांतरित करने की योजना है। सरकार के अनुसार ट्रांसगंगा सिटी के विकसित होने के बाद गंगा नदी पार करने के लिए भारी और हल्के वाहनों का यातायात काफी बढ़ेगा।
इससे मौजूदा गंगा बैराज मार्ग पर जाम की समस्या और बढ़ सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए गंगा नदी पर नए सेतु के निर्माण का निर्णय लिया गया है।यातायात दबाव को देखते हुए चार लेन के एक पुल के बजाय दो-दो लेन के दो अलग-अलग सेतु बनाने का प्रस्ताव रखा गया है, ताकि एक ही स्थान पर वाहनों का अत्यधिक दबाव न पड़े और आवागमन सुचारु बना रहे।इस परियोजना की कुल स्वीकृत लागत लगभग ₹753.13 करोड़ है। इसमें से ₹460 करोड़ की धनराशि अटल इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन के तहत दी जाएगी, जबकि शेष राशि संबंधित प्राधिकरण अपने संसाधनों से खर्च करेगा। इस परियोजना से कानपुर क्षेत्र में औद्योगिक विकास और यातायात व्यवस्था को बड़ा लाभ मिलेगा।
लखवार और रेणुकाजी बांध परियोजनाओं में यूपी की हिस्सेदारी को कैबिनेट की मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में निर्माणाधीन दो महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं में उत्तर प्रदेश की वित्तीय हिस्सेदारी को मंजूरी दी गई। कैबिनेट ने लखवार मल्टीपरपज प्रोजेक्ट और रेणुकाजी डैम प्रोजेक्ट के लिए राज्य के हिस्से की धनराशि खर्च करने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की।
लखवार बहुउद्देशीय परियोजना
कैबिनेट ने उत्तराखंड के देहरादून और टिहरी गढ़वाल जिले के लोहारी गांव के पास यमुना नदी पर निर्माणाधीन लखवार बहुउद्देशीय परियोजना में उत्तर प्रदेश के हिस्से के रूप में 356.07 करोड़ रुपये खर्च करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इस परियोजना की पुनरीक्षित लागत 5747.17 करोड़ रुपये (प्राइस लेवल 2018) है। परियोजना के तहत 204 मीटर ऊंचा बांध, 300 मेगावाट क्षमता का भूमिगत बिजलीघर और एक बैराज के साथ संतुलन जलाशय (Balancing Reservoir) का निर्माण किया जा रहा है।
इस परियोजना में लाभार्थी राज्यों द्वारा वहन की जाने वाली कुल लागत 1146.69 करोड़ रुपये है, जिसमें उत्तर प्रदेश का जल उपभोग शेयर 31.05 प्रतिशत है। इस परियोजना से हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित लाभार्थी राज्यों के लगभग 33,780 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए 78.83 एमसीएम जल तथा 300 मेगावाट (572.54 मिलियन यूनिट) आकस्मिक विद्युत उत्पादन का भी प्रावधान है। इस परियोजना को वर्ष 2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया था और इसे दिसंबर 2031 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
रेणुकाजी बांध परियोजना
कैबिनेट ने हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में गिरी नदी पर निर्माणाधीन रेणुकाजी बांध परियोजना में भी उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी के रूप में 361.04 करोड़ रुपये खर्च करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इस परियोजना की कुल लागत 6946.99 करोड़ रुपये (प्राइस लेवल 2018) है, जबकि जल घटक की लागत 6647.46 करोड़ रुपये है। इस परियोजना के तहत 148 मीटर ऊंचा और 430 मीटर लंबा बांध बनाया जा रहा है, जिसकी कुल जल संचयन क्षमता 498 एमसीएम और लाइव स्टोरेज क्षमता 330 एमसीएम होगी।
इसके अलावा परियोजना से 40 मेगावाट बिजली उत्पादन भी प्रस्तावित है। लाभार्थी राज्यों द्वारा वहन की जाने वाली कुल लागत 1162.66 करोड़ रुपये है, जिसमें उत्तर प्रदेश का जल उपभोग शेयर 31.05 प्रतिशत है। इस परियोजना के माध्यम से संग्रहित जल का उपयोग हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों में सिंचाई के लिए किया जाएगा। इस परियोजना को वर्ष 2009 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया था और इसे दिसंबर 2032 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
उत्तर प्रदेश को मिलेगा अतिरिक्त जल
इन दोनों परियोजनाओं के पूरा होने के बाद उत्तर प्रदेश को कुल 3.721 बीसीएम (31.05 प्रतिशत) जल प्राप्त होगा। इस अतिरिक्त जल का उपयोग पूर्वी यमुना नहर प्रणाली और आगरा नहर प्रणाली के माध्यम से सिंचाई के लिए किया जाएगा। साथ ही इससे यमुना नदी में जल प्रवाह बढ़ेगा और नदी की तनुता में भी सुधार होगा।
कुष्ठ रोग से जुड़े प्रावधान हटेंगे, भेदभाव खत्म कर गरिमामय जीवन का अधिकार सुनिश्चित करने की पहल
लखनऊ, 10 मार्च। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में उत्तर प्रदेश भिक्षावृत्ति प्रतिषेध अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के 7 मई 2025 के आदेश के अनुपालन में लिया गया है। प्रस्तावित संशोधन के तहत अधिनियम की धारा 21 से कुष्ठ रोग से संबंधित प्रावधानों को हटाया जा रहा है।
साथ ही इन प्रावधानों को मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 के अनुरूप बनाया जाएगा, ताकि कानून आधुनिक स्वास्थ्य और मानवाधिकार मानकों के अनुरूप हो सके।इस संशोधन से कुष्ठ रोग से प्रभावित व्यक्तियों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करने में मदद मिलेगी और उन्हें समाज में सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर मिलेगा। कैबिनेट की मंजूरी के बाद प्रस्तावित उत्तर प्रदेश भिक्षावृत्ति प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक, 2026 को आगे की प्रक्रिया के लिए राज्य विधानमंडल में प्रस्तुत किया जाएगा।
यूपी में ओला-उबर पर सख्ती: अब बिना पंजीकरण नहीं चला पाएंगे कैब
‘मुख्यमंत्री ग्राम परिवहन योजना-2026’ को मंजूरी, 59 हजार से अधिक ग्राम सभाओं को मिलेगी सीधी बस सेवा



