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आदिकेशव मंदिर : गंगा-वरुणा संगम पर भगवान विष्णु का हरिहरात्मक तीर्थ

वाराणसी के गंगा-वरुणा संगम तट पर स्थित आदि केशव मंदिर भगवान विष्णु का प्राचीन हरिहरात्मक तीर्थ है। यह वही स्थल है जहाँ विष्णु ने प्रथम स्नान किया और संगमेश्वर महालिंग की स्थापना कर हरि-हर एकता का संदेश दिया। राजा देवोदास की कथा, स्कंदपुराण में वर्णित महिमा, पिंडदान की परंपरा और महंत विद्या शंकर त्रिपाठी की धार्मिक सेवाएँ इस मंदिर को काशी की आत्मा बनाती हैं। यहाँ दर्शन मात्र से पितृमोक्ष और मोक्षदायिनी गंगा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।(Adi Keshav Mandir Varanasi : The Divine Harihara Pilgrimage at the Confluence of Ganga and Varuna)

वाराणसी ; अनादि और अविनाशी नगरी, जिसे स्वयं भगवान शिव ने “अविमुक्त क्षेत्र” कहा है – ऐसा क्षेत्र जहाँ से कभी मोक्ष की प्राप्ति में बाधा नहीं आती। इसी काशी की उत्तर दिशा में, गंगा और वरुणा नदी के संगम तट पर स्थित “आदिकेशव मंदिर” वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु स्वयं साकार रूप में विराजमान हैं। यही तीर्थ “आदिकेशव पीठ” या “आदिकेशव घाट” के नाम से भी प्रसिद्ध है।

आदि केशव मंदिर का भौगोलिक और आध्यात्मिक स्थान

वाराणसी का उत्तरार्क क्षेत्र (उत्तर दिशा) वैष्णव तीर्थों में सर्वोच्च स्थान रखता है। गंगा का प्रवाह यहाँ उत्तर की ओर मुड़ता है – इसे “उत्तरवाहिनी गंगा” कहा गया है, और इसी भाग में वरुणा नदी आकर गंगा में मिलती है। यह संगम स्थान “गंगा-वरुणा संगम” कहलाता है। वेदों और पुराणों के अनुसार यह संगम “विष्णुपादोदक” नाम से प्रसिद्ध है – क्योंकि यही वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु के चरण पड़े थे। यह स्थल सिर्फ भूगोल नहीं – मोक्षभूमि है। कहा जाता है कि यहाँ स्नान, दान और जप करने से जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी पवित्र स्थल पर विराजमान हैं – श्री आदि केशव, जो हरि और हर दोनों के अद्वैत स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मंदिर की स्थापना और प्राचीन संदर्भ

“आदि केशव” नाम का अर्थ है – प्रथम केशव, अर्थात् भगवान विष्णु का आदि (मूल) स्वरूप। शास्त्रों के अनुसार जब सृष्टि की रचना के लिए भगवान ने जलराशि पर शयन किया, तब उन्होंने ब्रह्मा को उत्पन्न किया। उसी क्षण जब भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर अवतरण किया, उन्होंने सबसे पहले जिस स्थान पर चरण रखा, वही काशी का यह पवित्र क्षेत्र था।

स्कंदपुराण (काशी खंड) में इसका अत्यंत विस्तृत उल्लेख है। श्लोक है –

“अविमुक्तेऽमृते क्षेत्रे येऽर्चयन्त्यादिकेशवम्।
तेऽमृतत्वं भजन्त्येव सर्वदुःखविवर्जिताः॥”

अर्थात् – जो भक्त काशी के अविमुक्त क्षेत्र में आदि केशव का पूजन करते हैं, वे समस्त दुःखों से रहित होकर अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं। इसी ग्रंथ के अनुसार, भगवान विष्णु ने यहाँ आकर संगमेश्वर महालिंग की भी स्थापना की – जिससे यह क्षेत्र हरिहरात्मक बन गया।

“आदिकेशवपीठेऽहमादिकेशवरूपधृक्।
श्वेतदीपं नये भक्तान् वैष्णवानतिवल्लभान्॥”

यह श्लोक बताता है कि स्वयं भगवान शंकर यहाँ “आदिकेशव रूप” में विराजमान हैं – और भक्तों को मोक्षलोक अर्थात् “श्वेतद्वीप” की प्राप्ति कराते हैं।

काशी के आदिकेशव घाट पर पिंडदान: पूर्वजों की मुक्ति और विष्णु का आशीर्वाद
काशी के आदिकेशव घाट पर पिंडदान: पूर्वजों की मुक्ति और विष्णु का आशीर्वाद

राजा देवोदास की कथा – काशी के दिव्य अध्याय का केंद्र

काशी के इतिहास में राजा देवोदास (या दिवोदास) का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। पुराणों के अनुसार वह काशी के ऐसे राजा थे जिन्होंने सत्य, धर्म और नीति के आधार पर शासन किया। काशी उस समय “देवविहीन नगरी” बन गई थी – अर्थात् भगवान शिव ने काशी छोड़ दी थी और इसे राजा देवोदास के शासन में सौंप दिया था। कथा के अनुसार, देवताओं ने काशी में अपने वास के लिए देवोदास से अनुमति मांगी, परंतु उन्होंने कहा कि यह मानवों का नगर है – देवों को यहाँ निवास की अनुमति नहीं है। तब भगवान विष्णु ने स्वयं यहाँ अवतार लिया और देवोदास को समझाने आए।

भगवान विष्णु गंगा और वरुणा संगम पर प्रकट हुए, और वहीं उन्होंने अपना प्रथम स्नान किया। यह स्थान “विष्णुपादोदक तीर्थ” कहलाया, और विष्णु ने यहाँ अपने चरणचिह्न स्थापित किए – जो आज भी “आदि केशव” के रूप में पूजे जाते हैं। यह कथा इस सत्य की ओर इंगित करती है कि जब तक मनुष्य में अहंकार है, तब तक देवत्व का वास नहीं होता। राजा देवोदास का अंततः अहंकार नष्ट हुआ, और उन्होंने इस तीर्थ पर भगवान विष्णु की शरण ग्रहण की।

आदिकाल से मोक्षदायिनी भूमि

गंगा-वरुणा संगम की यह भूमि अनादिकाल से पवित्र मानी जाती है। कहा जाता है कि यहाँ पिंडदान करने से गया के समान फल मिलता है। भविष्यपुराण में उल्लेख है कि –

“काश्यां विष्णोः पदं दृष्ट्वा पिण्डं दत्त्वा यथाविधि।
पितरः प्रीयन्ते नित्यं न पुनः पातकं भवेत्॥”

अर्थात् – काशी में भगवान विष्णु के पदचिह्नों का दर्शन कर विधिपूर्वक पिंडदान करने से पितर सदा प्रसन्न रहते हैं और पापों का पुनर्जन्म नहीं होता।

इसलिए आज भी हजारों तीर्थयात्री गया से पहले या बाद में वाराणसी आकर यहाँ पिंडदान करते हैं। यहाँ पित्र तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के लिए विशेष वेदपाठी ब्राह्मण सदैव उपस्थित रहते हैं।

मंदिर का स्थापत्य और पुनर्निर्माण का इतिहास

आदि केशव मंदिर का प्राचीन स्वरूप पत्थर की प्राचीरों से निर्मित था, जिसमें गर्भगृह अत्यंत गूढ़ और छोटा था। मध्यकालीन आक्रमणों में (विशेषतः 12वीं शताब्दी में) मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ। मुगल काल में भी यहाँ का मूल शिखर गिरा दिया गया था। परंतु 18वीं शताब्दी में मराठा सेनानी भालोजी सिंधिया ने इसका पुनर्निर्माण कराया। बाद में 1906 ई. में ग्वालियर के राजा नरसिंह राव शितोले द्वारा मंदिर और घाट का सौंदर्यीकरण कराया गया।

आज का मंदिर तीन भागों में विभाजित है – गर्भगृह (जहाँ भगवान आदि केशव विराजमान हैं) मंडप (जहाँ भक्त दर्शन करते हैं) घाट परिसर (जहाँ गंगा स्नान और पिंडदान होता है)।

पौराणिक उल्लेख – हरि और हर का अद्वैत स्वरूप

आदिकेशव पीठ को “हरिहरात्मक तीर्थ” कहा गया है — क्योंकि यहाँ भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों का स्वरूप एक साथ पूजित है। स्कंदपुराण में यह स्पष्ट उल्लेख है कि आदि केशव ने संगमेश्वर महालिंग की स्थापना की और कहा कि –

“मम दर्शनमात्रेण भोगमोक्षप्रदं भवेत्।”

यानी – जो मेरे (विष्णु के) दर्शन करता है, उसे भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।इसी के कारण यहाँ विष्णु-भक्त और शिव-भक्त दोनों एक साथ दर्शन करते हैं। काशी में यह एकमात्र ऐसा तीर्थ है जहाँ हरि और हर का अद्वैत रूप प्रत्यक्ष अनुभव होता है।

मथुरा क्षेत्र – उत्तरार्क क्षेत्र की पवित्र परिधि

स्कंदपुराण के अनुसार बकरीया कुंड से लेकर आदि केशव पीठ तक का पूरा क्षेत्र “मथुरा क्षेत्र” कहलाता है। इसका अर्थ यह है कि यह क्षेत्र वैष्णव साधना का प्रमुख केंद्र है। यहाँ अनेक छोटे-बड़े विष्णु तीर्थ हैं – चक्रतीर्थ, संगमेश्वर, मण्डकिणी तीर्थ आदि। इसी मथुरा क्षेत्र को “उत्तरार्क क्षेत्र” भी कहा जाता है, जो काशी का सर्वाधिक तेजस्वी क्षेत्र माना गया है। यहाँ के सूर्य की किरणें पहले गंगा जल में पड़ती हैं और बाद में काशी की धरती को स्पर्श करती हैं – इसलिए इसे “उत्तरसौर तीर्थ” भी कहा गया है।

आदिकेशव तीर्थ का धर्मशास्त्रीय महत्व

धर्मशास्त्रों में काशी को “मुक्तिदायिनी नगरी” कहा गया है, परंतु विष्णु उपासना के संदर्भ में केवल दो तीर्थ सर्वोपरि हैं –

आदि केशव (विष्णुपादोदक तीर्थ)
भृगुतीर्थ (दशाश्वमेध क्षेत्र)

आदि केशव तीर्थ की विशिष्टता यह है कि यहाँ पिंडदान के साथ-साथ विष्णु अर्चना का भी समान महत्व है। कई पुराणों में यह लिखा गया है कि काशी में जो व्यक्ति पहले गंगा स्नान, फिर विष्णु अर्चना और उसके बाद शिवदर्शन करता है – वह  हरिहर एकत्व को प्राप्त करता है।

काशी में आदि केशव दर्शन का विधान

काशी के पण्डितों के अनुसार, जब कोई तीर्थयात्री पहली बार काशी पहुँचता है, तो उसे सबसे पहले “आदि केशव” का दर्शन करना चाहिए। क्योंकि विष्णु ही वे हैं जिन्होंने इस नगरी की रक्षा की प्रतिज्ञा ली थी। इस विधि को “प्रवेशदर्शन” कहा गया है। यानि जब कोई काशी में प्रवेश करता है, तो वह पहले विष्णु के चरणों में प्रणाम करता है और फिर शिव की नगरी में प्रवेश करता है। अंत में जब वह तीर्थयात्री काशी छोड़ने लगता है, तो “पश्चाद् दर्शन” करता है – यानी फिर से आदि केशव के दर्शन कर इस तीर्थ को पूर्ण करता है।

आदि केशव मंदिर की पूजा-पद्धति और दैनिक आराधना

वाराणसी के राजघाट स्थित आदि केशव मंदिर में पूजा-पाठ की परंपरा वैदिक विधि से होती है। प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में मंदिर के द्वार खुलते हैं। सबसे पहले मंगल आरती होती है – जिसमें भगवान विष्णु के पंचामृत स्नान के बाद शंख, चक्र, गदा, पद्म से अलंकरण किया जाता है। इसके बाद सहस्त्रनाम पाठ, विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, नारायण कवच, लक्ष्मी सहस्रनाम आदि का पाठ होता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, प्रत्येक दिवस की पूजा का प्रारंभ “गंगा पूजन” से होता है, क्योंकि गंगा को भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न माना गया है।

दोपहर में मध्याह्न आरती और संध्या समय दीप आरती का विशेष महत्त्व है।संध्या आरती के समय गंगा तट पर सैकड़ों दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं – यह दृश्य वाराणसी के किसी भी घाट से कम नहीं। विशेष दिनों में शंख-ध्वनि, वेदपाठ और मृदंगनाद के बीच भगवान केशव को “हरिहर आरती” अर्पित की जाती है – जिसमें शिव और विष्णु दोनों का स्मरण किया जाता है।

वार्षिक पर्व और विशेष पूजन

आदि केशव मंदिर में वर्षभर अनेक पर्व और व्रत आयोजित किए जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं –

वामन द्वादशी – माना जाता है कि भगवान वामन ने इसी तीर्थ में स्नान कर बलि राजा को वरदान दिया था।
इस दिन हजारों भक्त यहाँ एकत्र होकर वामन भगवान का विशेष पूजन करते हैं।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी – श्रीहरि के अवतार रूप श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी पर मंदिर प्रांगण में रात्रि जागरण, झांकी और भजन-संध्या का आयोजन होता है।

एकादशी व्रत (विशेषतः देवउठनी एकादशी) – यहाँ “तुलसी विवाह” के साथ वैष्णव परंपरा का भव्य अनुष्ठान होता है।

कार्तिक मास दीपदान – कहा जाता है कि कार्तिक मास में यहाँ एक दीप जलाने से सौ यज्ञों के समान फल प्राप्त होता है।

माघ पूर्णिमा स्नान – इस दिन गंगा-वरुणा संगम पर हजारों श्रद्धालु स्नान कर पिंडदान करते हैं।

श्रावण मास हरिहर पूजा – यह माह “हरि-हर एकता” का प्रतीक है। इस अवसर पर शिव-विष्णु की संयुक्त पूजा होती है, जिसमें महालिंग संगमेश्वर और भगवान केशव दोनों का अभिषेक एक साथ किया जाता है।

पिंडदान और श्राद्ध परंपरा

आदि केशव मंदिर में पिंडदान का विधान सबसे प्राचीन है। काशीखण्ड और भविष्यपुराण में वर्णित है कि जो मनुष्य गंगा और वरुणा के संगम पर पिंडदान करता है, उसे गया के समान फल प्राप्त होता है। यहाँ के ब्राह्मण “पादोदक तीर्थ शास्त्र” के अनुसार विधि-पूर्वक पिंडदान कराते हैं।

पिंडदान के लिए कुशासन, तिल, जल और पिण्डक (चावल के गोले) का प्रयोग किया जाता है। तीर्थयात्री पहले गंगा स्नान करते हैं, फिर विष्णु के चरणों का दर्शन कर तर्पण करते हैं। इसके बाद मंत्रोच्चारण से पिंडों को अर्पित किया जाता है। यहाँ का सबसे विशेष विधान है – “हरि-हर समर्पण पिंडदान”। इसमें आधे पिंड विष्णु को और आधे पिंड संगमेश्वर महालिंग को अर्पित किए जाते हैं। यह इस स्थान के हरिहरात्मक स्वरूप की सजीव झलक है।

कथाओं में आता है कि स्वयं राजा देवोदास ने अपने पितरों का पिंडदान यहीं किया था। इसलिए यह स्थान “पितृमोक्ष स्थल” कहलाता है।

हरिहरात्मक स्वरूप – दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ

आदिकेशव मंदिर का सबसे अद्भुत और विशिष्ट पक्ष है – हरिहर एकता का दर्शन। यहाँ भगवान विष्णु के साकार रूप के साथ-साथ भगवान शिव की उपस्थिति भी अनुभूत होती है। इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि *सृष्टि के दो मूल तत्त्व – सृजन (विष्णु) और संहार (शिव) – यहाँ एक ही रूप में विद्यमान हैं। हरि-हर एकता का यह सिद्धांत अद्वैत वेदांत की सर्वोच्च व्याख्या माना गया है। यहाँ आने वाले साधक को यह अनुभूति होती है कि भेदभाव केवल मायिक है; शिव और विष्णु में कोई अंतर नहीं। जैसे शिव ने कहा –

“हरिर्हि हरमेवायं हरिरेव हरो स्मृतः।
उभयोरन्तरं नास्ति तस्मादेकं उपास्यते॥”

अर्थात् – हरि ही हर हैं और हर ही हरि हैं; दोनों में कोई भेद नहीं, इसलिए एकत्व का ही उपासक बनो।यह सिद्धांत आदि केशव मंदिर की आत्मा है। काशी के अन्य किसी तीर्थ में यह हरिहरात्मक भाव इतना स्पष्ट नहीं दिखता जितना यहाँ।

तीर्थ क्षेत्र की आध्यात्मिक परिधि

बकरीया कुंड से लेकर आदि केशव पीठ तक का क्षेत्र “मथुरा क्षेत्र” कहलाता है। यह क्षेत्र काशी का वैष्णव मंडल माना गया है। इसमें कुल 12 प्रमुख विष्णु तीर्थ हैं – चक्रतीर्थ, संगमेश्वर, मण्डकिणी तीर्थ, पदोदक तीर्थ, और संगम घाट सहित। गंगा और वरुणा के संगम पर स्थित इस तीर्थ का जल “विष्णुपादोदक” कहलाता है। यह वही जल है जिसमें विष्णु ने स्नान कर इसे पवित्र किया था। आज भी श्रद्धालु गंगा-वरुणा संगम पर स्नान कर इसी जल से भगवान केशव का अभिषेक करते हैं।

महंत विद्या शंकर त्रिपाठी (आदि केशव मंदिर) के अनुसार – “आदि केशव पीठ केवल विष्णु का मंदिर नहीं, बल्कि हरिहर एकत्व का जीवंत संदेश है। यहाँ आने वाला हर भक्त उस अद्वैत भाव को अनुभव करता है जिसमें शिव और विष्णु दोनों का एक ही तत्त्व है।” वे बताते हैं कि पितृपक्ष, कार्तिक मास और वामन द्वादशी के अवसर पर देशभर से हजारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। उनका दृष्टिकोण है कि – “काशी के उत्तरार्क क्षेत्र में आदि केशव पीठ वह केंद्र है जहाँ से काशी का वास्तविक आध्यात्मिक तंतु प्रारंभ होता है। यहाँ से काशी में हरिहर एकता का भाव पूरे नगर में प्रसारित होता है।”

आधुनिक काल में धार्मिक महत्त्व और पर्यटन

आज आदि केशव मंदिर वाराणसी के धार्मिक पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु गंगा आरती के साथ यहाँ दर्शन करने अवश्य आते हैं। विशेषकर दक्षिण भारतीय वैष्णव समुदाय के लिए यह मंदिर सर्वोच्च तीर्थ माना गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे “प्राचीन संरक्षित तीर्थस्थल” घोषित किया है। मंदिर परिसर में आदि केशव चरण पादुका, लक्ष्मी जी का मंदिर, और संगमेश्वर महालिंग स्थापित हैं। गंगा आरती से पहले मंदिर परिसर में होने वाला “हरिहर संकीर्तन” आज भी काशी की आध्यात्मिक पहचान है। यहाँ से गंगा तट का दृश्य – जहाँ सूर्यास्त की किरणें गंगा में प्रतिबिंबित होती हैं – काशी का सबसे शांत और पवित्र क्षण माना जाता है।

पौराणिक ग्रंथों में वर्णित आदिकेशव महिमा

  • स्कंदपुराण (काशीखण्ड) – विष्णु के अवतरण और देवोदास कथा का मुख्य स्रोत।
  • पद्मपुराण – काशी के उत्तरार्क क्षेत्र को विष्णुपद तीर्थ बताया गया है।
  • वायु पुराण – विष्णुपादोदक तीर्थ का वर्णन और गंगा-वरुणा संगम की महिमा।
  • गर्भपुराण एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण – पितृमोक्ष स्थलों में काशी और गया का तुलनात्मक महात्म्य।

इन ग्रंथों के अनुसार, आदि केशव तीर्थ वह स्थान है जहाँ से काशी की पवित्रता प्रारंभ होती है। यहाँ विष्णु ने शिव को कहा –

“यत्र मम चरणस्पर्शोऽभूत्, तत्पदं मुक्तिदं भवेत्।”
(जहाँ मेरे चरणों का स्पर्श हुआ है, वह स्थान सदैव मुक्तिदायी रहेगा।)

धर्मदर्शन – आदि केशव पीठ का गूढ़ अर्थ

आदि केशव तीर्थ केवल मंदिर या पूजा स्थल नहीं है – यह आध्यात्मिक एकता का सन्देश है। यह हमें सिखाता है कि धर्म किसी एक देवता तक सीमित नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक तत्त्व में वही परमात्मा है। काशी का यह हरिहरात्मक तीर्थ यह साक्ष्य प्रस्तुत करता है कि – “जहाँ हरि हैं, वहीं हर हैं; और जहाँ हर हैं, वहीं हरि हैं।” यह एकता सनातन धर्म के उस मूल सिद्धांत को पुष्ट करती है जिसे उपनिषदों ने कहा –

“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।”
(सत्य एक है, ज्ञानी लोग उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।)

हरिहर का संगम और मोक्ष की भूमि

आदि केशव मंदिर वाराणसी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हरिहर एकत्व का जीवंत दर्शन है। यह वह स्थान है जहाँ गंगा और वरुणा का संगम, विष्णु और शिव का संगम, और भक्ति और मोक्ष का संगम एक साथ होता है। यहाँ आने वाला प्रत्येक भक्त यह अनुभव करता है कि – “काशी के उत्तर में जहाँ गंगा शांत है, वहीं भगवान केशव का सान्निध्य है; जहाँ शिव मौन हैं, वहीं विष्णु मुस्कुरा रहे हैं।”

महंत विद्या शंकर त्रिपाठी के शब्दों में – “आदि केशव पीठ काशी की आत्मा है। यहाँ हर सांस में हरि का नाम है, हर जल में शिव का तेज है, और हर कण में मोक्ष का अनुभव।”

काशी का प्रथम मंदिर : वरुणा-गंगा संगम पर स्थित आदि केशव घाट

वाराणसी के सिद्धगिरि बाग और लखनऊ के गोमती नगर स्थित स्वयंभू ज्योतिष कार्यालय के संचालक ज्योतिर्विद रमनजी के अनुसार, आदि केशव घाट काशीपुरी का प्रथम और सर्वाधिक प्राचीन मंदिर माना जाता है। ज्योतिर्विद रमनजी बताते हैं कि काशीपुरी का प्राचीन नाम आनंद कानन था। उस समय भगवान श्रीविष्णु स्वयं वैकुंठ से इस पावन भूमि पर अवतरित हुए और यहीं विराजमान हुए। यही स्थान बाद में आदि केशव पीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। काशी नगरी केवल भगवान शंकर की प्रिय नगरी नहीं रही, बल्कि यह भगवान विष्णु के लिए भी उतनी ही पवित्र और प्रिय मानी गई है। यही कारण है कि यहां शैव, वैष्णव और शाक्त तीनों परंपराएं समान रूप से प्रतिष्ठित हैं।

ज्योतिर्विद रमनजी के अनुसार, यदि गंगा तट के तीर्थ क्रम को देखा जाए तो आदि केशव मंदिर के बाद क्रमशः प्रह्लाद घाट, जहां भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार का मंदिर है, बिंदु माधव मंदिर, जो भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय स्थल है, और राम घाट, जो श्रीराम अवतार से संबंधित है, आते हैं। इसके बाद नारद घाट स्थित है, जहां देवर्षि नारद जी का मंदिर है। यह सम्पूर्ण गंगा तट वैष्णव परंपरा की गूंज से अनुप्राणित है। दक्षिण की ओर बढ़ने पर तुलसी घाट आता है, जहां गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की पूर्णता की थी। यह स्थल वैष्णव परंपरा का जीवंत प्रतीक है और यहां की हर शिला रामनाम से अंकित प्रतीत होती है। रमनजी बताते हैं कि दक्षिण दिशा में श्री ललिता घाट पर आदि शक्ति ललिता त्रिपुरसुंदरी मंदिर, उसके बाद शीतला घाट पर शीतला माता मंदिर और चौसठी घाट पर चौंसठ योगिनी मंदिर स्थित हैं। ये स्थल शाक्त मतावलंबियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस प्रकार काशी नगरी शैव, वैष्णव और शाक्त तीनों मतों का अद्वैत संगम प्रस्तुत करती है। यही वह भूमि है जहां भक्ति, योग और तंत्र एक साथ फलित होते हैं।

दीपावली और कार्तिक मास के दौरान इन सभी दिव्य स्थलों पर दर्शन, पूजन और दीपदान का विशेष फल बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास में गंगा तट पर आकाशदीप प्रज्ज्वलित करने से सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों की गति होती है। जो पूर्वज तीर्यक योनियों में पड़े होते हैं, वे इस पुण्य कर्म से मुक्त होकर स्वर्ग प्राप्त करते हैं। रमनजी कहते हैं कि काशी के दीप केवल अंधकार नहीं मिटाते, वे पितरों के मार्ग को आलोकित करते हैं। इसलिए दीपावली और कार्तिक पूर्णिमा काशी के लिए केवल उत्सव नहीं, बल्कि मोक्षोत्सव का प्रतीक हैं। ज्योतिर्विद रमनजी का कहना है कि काशी नगरी केवल भूतभावन महादेव की नगरी नहीं है, बल्कि यह विष्णु भक्तों और शक्ति उपासकों की भी परम आराध्य भूमि है। यह त्रिमार्गी नगरी है, जहां शिव, विष्णु और शक्ति तीनों का सान्निध्य प्राप्त होता है। इस प्रकार आदि केशव मंदिर न केवल काशी का प्रथम मंदिर है, बल्कि यह सम्पूर्ण वाराणसी की आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ बिंदु है, जहां से हर तीर्थ, हर भावना और हर साधना की शुरुआत होती है।

Disclaimer: यह लेख प्राचीन धर्मग्रंथों, शास्त्रीय संदर्भों और स्थानीय परंपराओं पर आधारित है। इसमें वर्णित ऐतिहासिक, पौराणिक या दार्शनिक प्रसंग जनश्रुतियों और उपलब्ध ग्रंथीय स्रोतों से लिए गए हैं, जिनका उद्देश्य केवल धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक जानकारी प्रदान करना है। लेखक एवं प्रकाशक किसी विशेष मत, सम्प्रदाय या धार्मिक दृष्टिकोण का समर्थन या प्रचार नहीं करते। यदि प्रस्तुत सामग्री में कोई तथ्यात्मक त्रुटि पाई जाती है, तो कृपया प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराएँ – सुधार तत्क्षण कर दिया जाएगा।

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