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हर घर तिरंगा अभियान ने दी रोजगार को उड़ान,मेरठ में कम पड़ा तिरंगा बनाने का कपड़ा

कपड़ा व्यापार में आया भारी उछाल.घर-घर चल रहा तिरंगा बनाने का काम.हैंडलूम व्यापारियों ने किया अपनी खुशी का इज़हार.उत्तर प्रदेश में हैंडलूम का सबसे बड़ा बाजार है मेरठ का खंदक बाज़ार.

मेरठ। सरकार का हर घर तिरंगा अभियान से लोगों को रोजगार उम्मीद बढ़ी है, अभियान विभिन्न लोगों की आमदनी का साधन बन गया है। अगर बात करें मेरठ की तो मेरठ का हैंडलूम बाजार उत्तर प्रदेश के बड़े बाजारों में शुमार है। इन दिनों इस बाजार में झंडा बनाने के लिए कपड़े तक की कमी पड़ने लगी है। हैंडलूम व्यापार मंडल के महामंत्री अंकुर गुप्ता की माने तो हर साल स्वतंत्र दिवस पर इस मार्केट से लगभग 15 हज़ार मीटर कपड़ा ही झंडा बनाने के नाम पर बेचा जाता था। लेकिन सरकार के हर घर तिरंगा मिशन आह्वान के बाद से ही झण्डा बनाने के कपड़ों में भारी उछाल आया है और अब तक लगभग 1 लाख मीटर से ज्यादा कपड़ा बेचा जा चुका है। जबकि 50 हज़ार मीटर कपड़े की डिमांड अभी भी पेंडिंग पड़ी हुई है जिसको 10 तारीख तक देना है।

पूरी नहीं हो पा रही तिरंगे की मांग, हर घर तिरंगे से व्यापार को मिली उड़ान

पावर लूम संचालक राजीव बंसल का कहना है कि हर बार मेरठ में केवल 10 हजार से 12 हजार झंडे की ही रंगाई हो पाती थी लेकिन इस बार तो अब तक लगभग एक लाख झंडों का कपड़ा रंगाई के बाद तैयार होकर जा चुका है। उसके बाद भी लगातार झंडों के आर्डर आ रहे हैं लेकिन समय का अभाव और मजदूरों की कमी के होते हम इतने सारे झंडे नहीं बना पा रहे हैं। राजीव की मानें तो इस बार लगभग 80 से 90% की बढ़ोतरी उनके इस कारोबार में हुई है।

हर घर तिरंगा अभियान ने घर-घर तक पहुंचाया रोजगार

वहीं कपड़ों की रंगाई के बाद फिर झंडे की कटाई और सिलाई का काम शुरू होता है। नूर नगर निवासी ठेकेदार मुस्तकीम का कहना है कि सरकार की इस पहल ने झण्डा बनाने वाले कारीगरों को अच्छा खासा रोजगार दे दिया है। क्योंकि पहले स्वतंत्र दिवस के मौके पर मुस्तकीम 400 से 500 झंडे बनाकर ही बाजार में भेजा करते थे। लेकिन हर घर तिरंगा अभियान के आवाहन के बाद ही इनके इस कारोबार ने 90% की गति पकड़ ली है। मुस्तकीम का कहना है कि वह अपने पूरे परिवार के साथ इस काम को कर रहे हैं।

इसके अलावा 30 और परिवारों को झंडा बनाने के नाम पर रोजगार दे रहे हैं। मुस्तकीम के पास अब तक 8 हजार झंडों का आर्डर आ चुका है, जिसमें से अब तक वह 6 हजार झंडे बनवा चुके हैं, उसके बावजूद भी मुस्तकीम के पास लगातार झंडे बनाने के ऑर्डर आ रहे हैं। लेकिन मुस्तकीम के पास ना तो ज्यादा कारीगर हैं और ना ही अब उनके पास झंडा बनाने का समय बचा है। क्योंकि पहला ही ऑर्डर अभी मुस्तकीम के पास अधूरा पड़ा है।

अशोल चक्र छापने में रखना होता है विशेष ध्यान

वहीं अगर अब हम सिलाई के बाद झंडे पर अशोक चक्र छपाई की बात करें तो उसको छापने के लिए भी विशेष ध्यान रखना पड़ता है। खंदक व्यापारी मुकेश रस्तोगी का कहना है कि एक झंडे पर अशोक चक्र छापने में 2 दिन का वक्त लगता है क्योंकि पहले एक साइड अशोक चक्र छापा जाता है फिर उसके सूखने पर दूसरी साइड अशोक चक्र छापा जाता है। लेकिन इसमें विशेष ध्यान इस बात का रखना पड़ता है कि अशोक चक्र की छपाई में आगे और पीछे बिल्कुल भी अंतर ना हो इसलिए झंडे के नीचे लाइट जला कर उसके पीछे वाली छपाई के अनुसार डाई लगाकर आगे छपाई की जाती है।

इसके अलावा हम बात करते हैं अंतिम रूप यानी झंडे को पैकिंग करने की। जो मजदूर कभी सिर्फ एक-दो घंटे में ही अपना पूरा काम निपटा लिया करते थे लेकिन अब उनको दिन रात काम करने के बाद भी फुर्सत नहीं मिल रही क्योंकि मार्केट में झंडे की मांग ही इतनी ज़्यादा बढ़ गई है। इतना ही नहीं अब तो झंडा बनाने वाले लोग अपने ग्राहकों से ऑर्डर लेने तक से इंकार कर रहे हैं क्योंकि वह पहला काम ही पूरा नहीं कर पा रहे हैं।

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