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किसानों को मोदी-योगी की सौगात, प्रचुर पानी-भरपूर खाद

  • गिरीश पांडेय

खेती के लिए किसान की मूलभूत आवश्यकत क्या है? समय से बीज, खाद व पानी। अगर कोई सरकार सिर्फ नारों में नहीं हकीकत में किसानों का भला चाहती है तो उसे इन तीन कृषि निवेशों को प्राथमिकता के मुताबिक समय पर किसानों को उपलब्ध कराना होगा। यह स्वीकार करने में किसी को गुरेज नहीं होनी चाहिए कि डबल इंजन की सरकार में उत्तर प्रदेश में खेती की इन तीनों मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित हुई है। साधन सहकारी समितियों और अन्य शासकीय एजेंसियों के जरिये फसल की बुआई से काफी पहले भारी अनुदान पर शानदार उपज देने वाले प्रामाणिक बीज उपलब्ध करा दिए जाते हैं। जबकि यूरिया को लेकर प्रदेश आत्मनिर्भरता की राह बढ चला है।

गोरखपुर में प्रधानमंत्री के हाथों लोकार्पित खाद कारखाना न केवल यूपी बल्कि बिहार, झारखंड, ओडिशा, पंजाब व हरियाणा के किसानों को ससमय उच्च गुणवत्ता का यूरिया उपलब्ध कराने जा रहा है। सिंचाई को लेकर तमाम योजनाओं के बीच एक बड़ी सौगात सरयू नहर राष्ट्रीय परियोजना के रूप में मिल गई है। इस परियोजना की मदद से पूर्वी उत्तर प्रदेश देश के खाद्यान्न उत्पादन में 24 लाख टन का अतिरिक्त योगदान देने जा रहा है। खाद-पानी को लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान दशकों से बेहाल रहे हैं। प्रदेश और केंद्र सरकार के समन्वित प्रयास से इस अंचल की खाद कारखाने को लेकर तीन दशक और सरयू परियोजना को लेकर चार दशक से लंबित मांग पूरी हुई है।

गोरखपुर का पुराना खाद कारखाना जून 1990 में बंद हुआ तो न केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश में यूरिया का संकट खडा हुआ बल्कि हजारों की संख्या में रोजगार पर ग्रहण लग गया। दोबारा यहां यूरिया का उत्पादन हो सकेगा, यह सपना ही लगने लगा। अलबत्ता, गोरखपुर के बंद खाद कारखाना को दोबारा चलाने या नया प्लांट लगाने को लेकर योगी आदित्यनाथ सांसद के रूप में 1998 से ही प्रयत्नशील रहे। संसद के हर सत्र मे उनकी तरफ से सदन में बंद खाद कारखाना का मुद्दा गूंजता था। पूर्वी उनकी तरफ से की जा रही उत्तर प्रदेश की जनता की मांग 2014 में तब पूरी हुई जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी।

प्रधानमंत्री बनने से पहले किए गए अपने वादे को पूरा करते हुए नरेंद्र मोदी ने 22 जुलाई 2016 को गोरखपुर आकर पुराने स्थान पर ही नए खाद कारखाना का शिलान्यास किया। मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो कारखाना निर्माण के काम में और तेजी आई और कोरोनाकाल की दो साल की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद यह कारखाना बनकर तैयार हुआ। बीते सात दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों 8603 करोड़ रुपये के इस खाद कारखाना का राष्ट्रार्पण होने के साथ ही देश में 12.7 लाख मीट्रिक टन नीम कोटेड यूरिया की वार्षिक उपलब्धता भी तय हो गई। खेती के सबसे अनिवार्य खाद है यूरिया और इतनी बड़े पैमाने पर उत्पादन से किसानों को अब यूरिया की पर्याप्त मात्रा में सहज उपलब्धता होगी। पूरब का किसान यूरिया के संकट से निजात पा चुका है।

खेत की तैयारी से लेकर बोआई के बाद फसल कटने के चंद दिन पहले तक फसल विशेष की मांग के मुताबिक पानी की आवश्यकता होती है। खेतीबाड़ी में पानी की अहमियत के बाबत कहा गया है कि खेती, पानी को छोड़ सब कुछ का इंतजार कर सकती है। मतलब यह कि फसल को जब जरूरत हो तो पानी चाहिए ही चाहिए। तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में कहा है कि का बरखा जब कृषि सुखाने…। खाद के साथ ही केंद्र व यूपी की सरकार ने खेतों की सिंचाई के लिए पानी का संकट भी दूर कर दिया है। ‘पर ड्राप मोर क्राप’ के नारे को हकीकत में बदलने वाले पीएम मोदी के मार्गदर्शन में बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र के लिए अर्जुन सहायक परियोजना और बाणसागर परियोजना के बाद पूरब के किसानों के लिए सरयू नहर राष्ट्रीय परियोजना को अमलीजामा पहना दिया गया है।

सरयू नहर परियोजना की शुरुआत तो चार दशक पहले हुई थी लेकिन इसका अस्सी फीसद काम पूरा हुआ है मार्च 2017 के बाद। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत संचालित देश की 99 परियोजनाओं में सरयू नहर परियोजना सबसे बड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों लोकार्पित इस परियोजना से पूर्वी उत्तर प्रदेश के नौ जिले बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती, गोंडा, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर व महराजगंज के करीब तीस लाख किसान खेतों की सिंचाई की चिंता से मुक्त हो गए हैं।

खास बात यह है कि इन नौ में से चार जिले बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती व सिद्धार्थनगर भारत सरकार के नीति आयोग की तरफ से तैयार आकांक्षात्मक जिलों में शुभार हैं। इन जिलों में खेती के कायाकल्प में 9802 करोड़ रुपये वाली यह परियोजना संजीवनी साबित होगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पारंपरिक यानी कृषि आधारित रही है। ऐसे मे सरयू नहर परियोजना से करीब 15 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई की सुविधा ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था की मजबूती में मील का पत्थर बनने जा रही है। 6600 किमी की लंबाई में 922 नहरों वाली इस परियोजना के पूर्ण होने से 6227 ग्रामों के करीब तीस लाख किसानों की फसलें अब झूमकर लहलाएंगी।

योगी आदित्यनाथ की खेतीबाड़ी में पहले से रुचि रही है। मुख्यमंत्री बनते ही पूर्व की सरकारों के लूट-खसोट के कारण प्रदेश की आर्थिक स्थित के बदहाल होने के बावजूद उन्होंने अपने बूते प्रदेश के लाखों लघु-सीमांत किसानों का करोड़ों का एक लाख रुपए तक का कर्ज माफ कर किसानों के हितों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित कर दी थी। यह सिलसिला न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गन्ना सहित अन्य प्रमुख फसलों की रिकॉर्ड खरीद, तय समय पर भुगतान, नई चीनी मिलों की स्थापना, पुरानी मिलों के आधुनिकीकरण के रूप में जारी है।

इसी क्रम में उन्होंने लंबित सिंचाई परियोनाओं की ओर भी पूरी संवेदनशीलता से ध्यान दिया। खुदउनकी लगातार निगरानी की। समय से जरूरत के अनुसार उनके लिए धन उपलब्ध कराया गया। नतीजतन ऊपर जिन प्रमुख परियोनाओं का जिक्र किया गया है वे पूरी हो चुकी हैं। योगी के अब तक के कार्यकाल में दर्जन भर से अधिक सिंचाई परियोजनाएं पूरी की जा चुकी हैं। इनके जरिये प्रदेश में करीब बीस लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि सिंचाई सुविधा से कृषि योग्य बनाने में मदद मिली है।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरसी चौधरी और डॉ. एसपी सिंह के मुताबिक कुल लागत का करीब 60 फीसद तीनों कृषि निवेशों खाद, बीज, पानी पर ही खर्च होता है। बाकी 40 फीसद श्रम पर खर्च होता है। किसी फसल की उपज इन निवेशों की समय से उपलब्धता पर निर्भर करती है। अगर इन तीनों में से कोई भी निवेश समय पर उपलब्ध न हो तो उपज के साथ आय प्रभावित होती है। ऐसा न हो,इसके लिए डबल इंजन की सरकार ने जो प्रयास किया है वह खाद कारखाना के उद्घाटन और दशकों से लंबित सिंचाई परियोजनाओं की पूर्णता के रूप में सामने है।

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