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बाबा गणिनाथ पूजा-विधान: पिण्ड-पूजन की परंपरा, विधि और पूजन सामग्री

बाबा गणिनाथ की पूजा-विधि पिण्ड-पूजन की प्राचीन परंपरा से जुड़ी है। इसमें बाबा गणिनाथ, माता खेमासती, श्री गोविन्द जी और चौदह देवान के पूजन का विशेष विधान बताया गया है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष में जन्माष्टमी के बाद शनिवार को आयोजित होने वाली इस पूजा में कलश, दीपक, सिंदुरी, प्रसाद, कचोरा, कानू पूजन और अन्य पारंपरिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है

बाबा गणिनाथ जन्मोत्सव पर विशेष / पूजा-विधान

पिण्ड-पूजा

बाबा ने बहुदेवोपासना के आडम्बर से लोगों को बचने की प्रेरणा दी। वैसे तो नाथ पंथी हठयोग-साधना और यौगिक प्रक्रिया को महत्त्व देते थे लेकिन बाबा ने सामान्य जनों की दुर्बलता का गहन अध्ययन किया था और बौद्ध साधकों की अवनति तथा बौद्ध धर्म में तंत्र-मंत्र का प्रवेश भी वे देख चुके थे। अत: उन्होंने लोगों को विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्ति-पूजा से हटाकर ‘पिण्ड’ पूजन की ओर प्रेरित किया। कुल-देवता के रूप मे मध्यदेशीय वैश्य या कान्दू या कानू वैश्य घरों में बाबा गणिनाथ और श्री गोविन्द जी की पूजा ‘पिण्ड’ रूप में होती है। वहाँ कोई मूर्ति नहीं होती। ‘पिण्ड’ पूजन के महत्त्व को जानने के लिए सिद्धों एवं नाथों की साधना-पद्धति को जानना आवश्यक है।

श्री गोरखनाथ के गुरू मत्स्येन्द्र नाथ ने कौल ज्ञान में शिव और शक्ति का महत्त्व स्थापित किया था। पिण्ड और ब्रह्माण्ड की चर्चा करते हुए पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- ‘परम शिव को जब सृष्टि करने की इच्छा होती है तो इच्छा युक्त होने के कारण उन्हें सगुण शिव कहा जाता है। शिव की सिसृक्षा अर्थात सृष्टि करने की इच्छा का नाम ही शक्ति है परन्तु शिव और शक्ति में कोई भेद नहीं। चन्द्रमा और चन्द्रिका का जो संबंध है वही शिव और शक्ति का संबंध है-

‘शिवस्याभ्यन्तरे शक्ति: शक्तेरभ्यन्तरे शिव:।
अन्तरं नैव जानीयाच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव।।’

मत्स्येन्द्र नाथ के शिष्य और नाथ-सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्री गोरखनाथ और उनके सम्प्रदाय के नाथ इन बातों से बहुत प्रभावित थे। नाथों के अनुसार ‘‘जो कुछ ब्रह्माण्ड में है वह सब पिण्ड मानो ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त संस्करण है।” तत्कालीन समाज में शैव, शाक्त और वैष्णवों के बीच संघर्ष तो चल रहा था। सबसे अधिक समस्या बौद्ध धर्म से च्युत तंत्र-मंत्र जादू टोना में आपाद मस्तक डूबे संन्यासियों की थी। सामान्य जनता इन्हीं में से अधिक थी। निरीह किन्तु दीन-हीन जनता उनके आल-जाल में फंस जाया करती थी क्योंकि हाथ की सफाई, चमत्कार और सहज-प्राप्ति की आशा से उनकी आँखें चकाचौंध हो जाती थीं।

इसके अतिरिक्त ब्राह्मणों का वर्ग तो था ही जो जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत नाना प्रकार के विधन रच कर लोक-परलोक सुधारने और बिगाड़ने का लोभ और भय दिखाकर जनता का भाग्य-नियन्ता बना बैठा था। दूर द्रष्टा बाबा गणिनाथ ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए लोगों को, पिण्डपूजन” की ओर आकृष्ट किया। भार्वी ने कहा था – ‘‘ब्रह्म एक है और संपूर्ण दृष्टि में व्याप्त है। अत: यह पिण्ड ब्रह्माण्ड का प्रतीक है- लघु रूप है जहाँ परम ब्रह्म का वास है।” बाबा पर इन विचारों का भरपूर प्रभाव था। पिण्ड-पूजन मे किसी ब्राह्मण व पुरोहित की आवश्यकता नहीं थी- पूर्व वैदिक युग की धार्मिक व्यवस्था अत्यन्त सरल-थी।

मुख्य रूप से देवता के रूप में प्रकृति-पूजन की परम्परा थी-सूर्य, चन्द्रमा, मेघ, वायु आदि की उपासना की जाती थी। वैदिक काल में जिस प्रकार अग्नि प्रज्वलित कर लोगों का समूह घेरा बना कर बैठकर आस्थापूर्वक अग्नि की पूजा करता था उसी प्रकार पिण्डपूजन का विधान बाबा ने रचा। तब से आज तक घरों में कुल-देवता के रूप में पिण्ड की पूजा होती है। पलवैया राज में श्रद्धालुओं ने बाबा गणिनाथ और उनके परिवार के सदस्यों की मूर्तियां नहीं बनायी, बल्कि अपनी आस्था, अपनी भक्ति और श्रद्धा को पिण्ड रूप में अक्षुण्ण रखा।

बाबा गणिनाथ द्वारा पिण्ड-पूजन की व्यवस्था उनका एक क्रांतिकारी कदम था। तत्कालीन समाज में तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, नकली गुरूओं का पाखंड और जाल जिस रूप में फैला हुआ था उसका विरोध करते हुए उस प्रपंच से लोगों को निकालने की चेष्टा ही अपने आप में महत्वपूर्ण थी। अंधविश्वास के इस युग में ब्राह्मणों का बहिष्कार कर हिंसात्मक यज्ञों को नकारकर बाबा गणिनाथ ने विद्रोह का झंडा उठाया। पिण्ड-पूजन के रूप में अपने इष्ट-देवता को पूजना प्रत्येक व्यक्ति का धार्मिक अधिकार था। उसके लिए किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं थी। घर का वृद्ध उस पूजा का पुरोहित होता था। किंतु यह भी सच है कि बाबा गणिनाथ मानव-मात्र की दुर्बलताओं से परिचित थे।

अतः उन्होंने ‘‘पिण्ड-पूजन” को नाथ-योगियों की तरह योग-साधना तक सीमित नहीं रहने दिया। पूजन-विधि की सारी औपचारिकताएं जैसे धूप, दीप, हवन, फल, फूल, चंदन की स्वीकृति दी। शुद्धता का ध्यान रखने के लिए बाबा ने न तो कोई तंत्र बताया और न कोई यौगिक क्रिया बतायी, बल्कि उन्होंने ‘शुद्धता’ को, ”धवलता” को प्रतीक-रूप में साकार किया था । अर्थात पूजा की वेदी पर श्वेत पुष्प ही अर्पित होते हैं। श्वेत चंदन चढ़ाया जाता है। सोमसुरा की जगह ‘दूध’ का चढ़ावा होता-इस प्रकार यह ‘श्वेत’ रंग ही धवलता के साथ शुद्धता एवं पवित्रता का प्रतीक बन गया जो आज भी अनेक वाह्माचारों के साथ यथावत स्थिति बनाये हुए है।

कालान्तर में बाबा का जल-समाधि लेने और उनके पुर-जनों की समाप्ति के बाद इस वर्ग-विशेष ने ‘पिण्ड’ के रूप में बाबा गणिनाथ को प्रतिष्ठित किया। आज पलवैया-धाम के कुल-पुरुष के रूप में बाबा गणिनाथ एवं माता खेमासती का पिण्ड बनाया गया है। इसकी विशेषता है कि ये पिण्ड सर्वदा अलग-अलग नहीं हैं बल्कि एक साथ जुड़े हुए होने पर भी उभार की दृष्टि से दो का आभास देते हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन घरों में कुल-देवता की प्रतिष्ठा की जाती है वहां गोविन्द जी की प्राण-प्रतिष्ठा होती है न कि गणिनाथ बाबा की और एक वेदी या एक ही पिंड मुख्य रूप से बनाया जाता है। यह भी सूचित करना है कि बाबा गणिनाथ हमारे आदिपुरुष (कुल-पुरुष) हैं और गोविन्द जी हमारे कुल-देवता हैं ।

ध्यातव्य है कि जो लोग अपना मूल निवास छोड़ कर कहीं और जा बसते हैं वे या तो पुनः विधिपूर्वक बाबा गणिनाथ गोविन्द जी का पिण्ड बनाकर प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं या फिर विशिष्ट अवसरों पर पूजा-गृह में भण्डार-कोने पर बिना पिण्ड बनाये फूल आदि चढ़ाकर पूजा करते हैं। इस पूजन-विधि में कुल-देवता को उदासी कुल-देवता कहा जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि कुल-देवता की प्रतिष्ठा व्यक्ति के मूल-स्थान पर ही होती है, दूसरी जगह पूजा करने के लिए बार-बार प्रतिष्ठा नहीं की जाती है।

दूसरी जाति के लोग जब श्री गोविन्द जी की पूजा करना चाह कर अपने कुल-देवता के रूप में उन्हें प्रतिष्ठित करते हैं तो उन्हें करवानी पड़ती है। आजकल पूजन-विधि में लोकाचार का महत्त्व अधिक बढ़ गया है। कहीं-कहीं मंदिरों में बाबा एवं उनके परिवार की काल्पनिक मूर्तियां भी बनने लगी हैं। जो बाबा गणिनाथ के उपदेश एवं सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। इस वर्ग के वैश्यों में कुछ लोगों की कुल-देवी ‘बंदी’ हैं। ‘बंदी’ की पूजन-विधि भी श्री गणिनाथ गोविन्द जी की पूजन-विधि से अलग है। यद्यपि पिंड का रूप यहां भी है।

लोकाचार

भाद्रपद कृष्ण पक्ष, जन्माष्टमी के बाद जो शनिवार होता है उसी दिन बाबा गणिनाथ श्री गोविंद जी की पूजा संपन्न होती है। पूजा से एकदिन पूर्व अर्थात शुक्रवार का पूजा में सम्मिलित होने वाले लोगों के यहां आमंत्रण के लिए (न्योता) चावल (रत्तीभर) या लौंग भेजा जाता है। यह आमंत्रण उन्हीं लोगों के यहां भेजा जाता है जिनके घर गोविंद जी की पूजा होती है। पांच सुहागिन औरतें पूजा में बैठती हैं। इसके अतिरिक्त दो कुमार बालक तथा दो अविवाहित कन्या बुलायी जाती हैं।

पूजा की सारी तैयारियां एक ही दिन शनिवार को ही की जाती हैं। पूजन के अवसर पर गह्नर के आगे कलश में जल भर कर, आम्र-पल्लव सहित रखा जाता है जिस पर चावल से भरा मिट्टी का पात्र रखकर चौमुखी दीपक जला दिया जाता है। पांच डलवा तथा दो सुपली में प्रसाद सजा दिया जाता है। गोविन्द जी के लिए खड़ाऊ, छाता, बेंत आदि गह्नर में रखा जाता है। सफेद फूल माला से गह्नर सजा दिया जाता है । सफेद ऐपन (पीसा हुआ चावल) से मंदिर (गह्नर) में जापा दिया जाता है फिर उसमें सिन्दूर लगाया जाता है।

पाँच सुहागिनें मन्दिर के सम्मुख बैठती हैं उन्हें गह्नर से (सुहागिनों तक) सिन्दूर पहुँचाया जाता है। एक सुहागिन इसी विधि को पाँच बार दुहराती है। सिन्दूर पहुँचाने के बाद जल से अर्पण किया जाता है। पाँचों सुहागिनों को भी सफेद फूलों की बालिकाओं को भी माला और प्रसाद दिया जाता है। कुमार (बालक) भी प्रसाद पाता है इसके अतिरिक्त कुमार को आँचल से ढँककर छाका (दूध से भरा प्याला) पिलाया जाता है। लाल खाँ के नाम से एक न्योज (हिस्सा) निकाला जाता है। इसके बाद कपूर की आरती की जाती है। आरती से पहले गोविन्दजी का गह्नर भरने के बाद लाल खाँ के लिए अलग (गह्नर से बाहर) मिट्टी के ढक्कन में प्रसाद चढ़ाया जाता है। यहाँ भी आरती दिखायी जाती है। इस प्रकार पूजा सम्पन्न हो जाती है।

पलवैया (जिला वैशाली) पटना तथा गोविन्दपुरी (मुजफ्फरपुर) में बाबा गणिनाथ गोविन्द जी का मन्दिर है। गोविन्द जी की पूजा करने वाले लोग मुख्यतः बिहार के हैं। इसके अतिरिक्त नेपाल, जलेश्वर, जनकपुर आदि जगहों में भी इनकी पूजा की जाती है। पूजा की यह परम्परा वंशानुगत रूप में चलती है। अत: अपनी परम्परा का निर्वाह बाद के सभी लोगों द्वारा किया जाता है।

बाबा गणिनाथ जी की पूजन विधि

भाद्रपद माह कृष्णपक्ष जन्माष्टमी के ठीक बाद जो शनिवार होता है उसी दिन बाबा गणिनाथ जी की जयन्ती मनाई जाती है। इस अवसर पर बाबा गणिनाथ, माँ खेमासती, बाबा गोविन्द जी समेत चौदह देवान की पूजा होती है। बाबा गणिनाथ के अवतरण स्थल और तप स्थल पलवैया धाम हसनपुर गुर्दा, प्रखंड महनार, जिला वैशाली में मेला लगता है जहाँ देश-विदेश से लोग आते हैं।

पूजा के एक दिन पूर्व अर्थात शुक्रवार को पूजा में सम्मिलित होने वाले लोगों के यहाँ आमंत्रण के लिए (न्योता) चावल (रत्तीभर) या लौंग भेजा जाता है। यह आमंत्रण उन्हीं लोगों के यहाँ भेजा जाता है जिनके घर गोविन्द जी की ही पूजा होती है। उसी दिन पूजा कराने वाले भगत जी बाबा गणिनाथ के भजन एवं लोकगीतों के माध्यम से ढोल, झाल बजाकर गाकर बाबा के परिवार सहित चौदह देवान का आवाहन (न्योतन) करते हैं। इसके दूसरे दिन शनिवार को पूजा ब्रह्म मुहूर्त (भोर) में सूर्योदय से पहले ही शुरू हो जाती है। पूजा घर को धो-पोछ लिया जाता है। कच्चा स्थान हो तो मिट्टी से लीपा जाता है। गहवर के आगे कलश में जल भर कर आम-पल्लव सहित रखा जाता है जिसपर चावल से भरा मिट्टी का पात्र (ढक्कन) रखकर चैमुखी उस पर दीपक रखकर जला दिया जाता है ।

कलश पर नारियल रखना हो तो दीपक अलग रखा जाता है। नारियल छिल्का समेत जल वाला हो उसमें पीला कपड़ा लपेट कर पीला रक्षासूत्र से बाँधा जाता है । गह्नर में पीढ़ा पर बाबा का खड़ाऊ रखा जाता है। छाता और बेंत दीवार से खड़ा कर दिया जाता है। दो सुपली और दो मौनी में प्रसाद सजा दिया जाता है। उजला १४ लड़ का गेरुआ छत या छप्पर से लगाकर टांग कर लटका दिया जाता है जिसका छोर पिंड से स्पर्श करता रहता है। भक्तों के घर एक पिंड होते हैं अतः एक गेरुआ और मंदिर में जैसे पलवैया धाम, बिदुपुर धर्मगाछी गणिनाथ मंदिर, कौनहारा गणिनाथ मंदिर में चौदह पिंड होते हैं वहाँ चौदह गेरुआ लटकाया जाता है ।

सिन्दुरी की तैयारी

शनिवार को पूजा घर को धो-पोछ लें। पूजा की सामग्री तैयार करने वाला बर्तन भी साफ-स्वच्छ कर लें। बाल धोकर पूर्ण रूप से स्नान कर लें तथा पूजन-सामग्री तैयार करने में लग जायें। पहले अरवा चावल फटक-चुनकर तथा धोकर पानी मे फूलने दें। फिर आग जलाकर कड़ाही चढ़ा दें। बिना बालू के खाली कड़ाही में धान भूँज कर लावा बना लें। फूलाये गये धान को भूँजे और चिउरा कूटें। अरवा-चावल जो फूलने दिया गया था, उसको सूप में निकाल कर पानी निकलने के लिए छोड़ दे। तिल को भूनकर रख लें। जब चावल का पानी निकल जाये तो उसको कूटे। कूटा हुआ चावल महीन हो जाये तो उसमें दूध, गुड़, गरी छुहारा काटकर, किसमिस, इलाइची, सौंफ आदि पंचमेवा मिला दें। भूना हुआ तिल, गाय का घी और तुलसीदल मिला कर छोटा-छोटा लडडू बना लें। इसी को शंकर लडुआ कहते हैं।

अपने परिवार के अनुसार पूड़ी बनायें या जिनके यहाँ दोस्ती पूड़ी बनता है वे दोस्ती पूड़ी बना लें। अब पान को धोकर उसका चिकना परत ऊपर रखकर उसमें कसैली, नारियल, छुहारा, इलाइची, सौंफ डालकर एक-एक पान का ३५ बीड़ा बना लें। अब दस पान को एकसाथ मिलाकर कसैली, नारियल, इलाइची, सौंफ डालकर बीड़ा बनाये और दूसरा पाँच पान को एक साथ लेकर कटुक डालकर दूसरा बीड़ा बना लें । दस पान के बीड़े दसौना और पाँच पान के बीड़े को पचौना कहते हैं। सुपाड़ी को हल्दी से रंग लें। बेंत और ढबुआ (काठ का बना होता है) को धोकर उसमें तेल और लटवा सिंदूर लगा दें। एक बर्तन में चूड़ा, लावा, तिल, नारियल, छुहारा, इलायची, सौंफ मखाना, तुलसी दल, गुड़ और पूड़ी तोड़ कर मिला लें। इस मिश्रण को चुरमुरा कहते हैं। एक थाली में फल धोकर काट लें।

अन्य प्रसाद को बनाने का काम शुरू करें। एक थाली या पत्ता पर जोड़ा पूड़ी या दो-दो पूड़ी एक साथ करके रखें। फिर उस पर एक-एक शंकर लडुआ रखें। फिर थोड़-थोड़ा चुरमुरा रख दें। अब एक-एक केला और सब कटा हुआ फल दें। अगर केला कम हो तो काटकर भी दे सकते हैं। फिर एक-एक पान का बीड़ा दें। इलायची, तुलसी और एक-एक सुपाड़ी दें। पूजा शुरू करने के पहले पूजा करने वाले पति-पत्नी नहा-धोकर नये वस्त्र पहन कर तैयार हो जायें। कोई सिला हुआ कपड़ा नहीं पहने। स्त्री अपनी साड़ी के खोइंछा में एक जोड़ा पूड़ी, चुरमुरा, शंकर लड़ुआ, पान का बीड़ा, पैसा, हल्दी लें तथा हाथ जोड़कर सिन्दूर और लहठी पहन लें। पुरुष धोती चादर, कमरधनी पहन लें। दोनों पति-पत्नी गेंठ जोड़कर ही पूजन करें। पाँच सुहागिन और दो लड़का दो लड़की को भी नहाकर बिना सिले कपड़े पहनकर तैयार रहने को कहे। औरतें बाल धोकर स्नान कर बिना सिंदूर-तेल लगाये हुए सुंदरी में भाग लेंगी। दो दीपक घी-बत्ती डालकर तैयार रखे ।

पूजन विधि

सबसे पहले गंगाजल से पूजन स्थल तथा गोसांय की पिण्डी को धोकर लीप दें। पूजा घर में पूजा के स्थान पर स्थापित कलश एवं दीपक की पूजा जल उजला फूल अच्छत पीला चन्दन और नैवेद्य-प्रसाद से करें। कलश और दीपक को साक्षी बनाकर पूजन आरम्भ करें। उस स्थान पर किसी पात्र या हवन कुण्ड में धूप, घी, तिल, जौ, चावल, हवन सामग्री आदि का हुमाद की व्यवस्था रखें। दीपक एवं हवन की अग्नि को सूर्य का प्रतीक माना जाता है सूर्य ईश्वर स्वरुप है जिसमें सभी देवी-देवता का वास है। श्रीगणेश-गौरी के साथ बाबा गणिनाथ-गोविन्द सहित चौदह देवान का पूजन किया जाता है।

बाबा गणिनाथ-गोविन्द सहित चौदह देवान का पूजन

सिन्दुरी के सामान में लिखाये गये पीला वायल के कपड़े से आधा फाड़कर रखें। यजमान पुरुष के हाथों से ढाई कोवा या ढाई मुठ्ठी चावल उस कपड़े पर दिलवायें। १० पूड़ी, १० सुपाड़ी, १० पान का बना हुआ दसौना, चुरमुरा, १० शंकर लडुआ, जनेऊ कमर धनी (डांरा), उजला फूल, तुलसी दल, १०-१० लौंग, इलाइची और ११ रुपये देकर पोटली बांध लें। इसी पोटली को अढ़ैया कहते है। अढ़ैया को गोसांय के स्थान पर कांटी में लटका दें। एक कोने में बेंत रख दें। जिनके यहाँ धोती-साड़ी चढ़ाने का रिवाज है वे श्री गणिनाथ पूजन में धोती, गमछा, जनेऊ और सती मैया को साड़ी, लहठी, सिंदुर, बिन्दी आदि श्रृंगार का सामान चढ़ावें। बहुतों के यहाँ यह नियम नहीं है। चढ़ाया हुआ साड़ी-धोती, गमछा इत्यादि सब सामान बाद में प्रसाद स्वरुप घर के सदस्य हीं व्यवहार करें। घर के बाहर दूसरों को न दें।

सती मैया की पूजन विधि

सती मैया के खोंइछा के लिए उसी पीले कपड़े से एक चोकेर कपड़ा फाड़ लें। उसी कपड़े पर घृतढ़ारी वाली स्त्राी से पाँच कोवा या पाँच मुठ्ठी चावल दिलवायें। साथ ही उसमें सिन्दुर, टिकुली, लहठी, दूब, पाँच पान वाला पचौना, पाँच सुपारी, चुरमुरा, पाँच पूड़ी, पाँच शंकर लड़ुआ, फूल, कटा हुआ फल, पंचमेवा इत्यादि सब चीजें और पाँच रुपये का सिक्का देकर बाँध दें । इसे सती मैया का खोंइछा कहते हैं। इसे जिस जगह पर सिन्दूर का लेप लगाकर पान साटे हैं उसी के नीचे रख दें। इसके बाद सुपली मौनी समर्पित करें। अब चौदह देवता के नाम से एक बड़े पत्ते पर या दो पत्ते को सटाकर उस पर चौदह जोड़ा पूड़ी प्रसाद, पान पंचमेवा सहित जो कि सजाकर रखा गया है, उसको पूजे। फिर महादेव, पार्वती, गंगा, स्थान देवता, बजरंग बली, बड़ी-जेढ़ी, मरणजीते, सूर्य देवता, तुलसी और जिन देवी-देवता को मानते हैं उनके नाम से भी पूजन करें।

लाल खाँ का पूजन

ढबुआ में पहले से ही तेल सिन्दुर लगा दिया है। अब उसमें एक जोड़ी पूड़ी सहित सब प्रसाद पान सहित देकर दोनों ढ़बुआ को कपड़े से लपेट कर बाँध दें और एक कोने में खड़ा कर दें। कच्चे ढँकने में चुरमुरा पान का बीड़ा सुपाड़ी और सब फल सहित देकर एक बड़ी पूड़ी से ढकने को ढँक कर वहीं पूजा स्थान के पास रख दें।

कचोरा (छांकी) पिलाना- सब पूजन हो जाने के बाद पति के धोती का छोर एवं पत्नी के साड़ी का छोर का गांठ खोल, पति-पत्नी अब बच्चों और कानू को तैयार करावें। बच्चों को नहलाकर नया गमछा या धोती और कमरधनी पहना दें। पुरुष के हाथों से जिन्होंने गणिनाथ का पूजन किया उन्हीं के द्वारा दोनों बच्चों को कांसे या पीतल के कटोरे से गाय का कच्चा दूध छानकर और गुड़ मिलाकर तुलसीदल डालकर उन बच्चों को पिलायें। पिलाते समय, दोनों बच्चे और पिलाने वाले को छोड़कर और कोई नहीं हो। अगर जगह की कमी हो तो कपड़े से घेरा बनाकर दूध पिलावे ताकि कोई और देखे नहीं। यही छाँकी पिलाना कहलाता है। इसके बाद बालकों को कुछ फल खिला दें। फिर बच्चों को प्रणाम कर दक्षिणा दे दें। ये फेंकू और पाँचू दोनों भाइयों का पूजन हुआ। इन बच्चों और उन पुरुष का काम खत्म हो गया। अब बच्चों को भोजन करावे और सुहागिन स्त्रिायों का पूजन का काम शुरू करें।

कानू पूजन

सती मैया का पूजन करने वाली महिला के द्वारा ही यह पूजा होती है। पाँचो सुहागन औरतें जो पहने उसमें काला रंग न हो, साड़ी में सिलाई न हो और जला न हो। विशेष परिस्थिति में धोती पहन सकती हैं। एक लोटे मे जल रखें एक कटोरे या प्याले में सरसो का तेल और एक ढक्कन में जरुरत के हिसाब से सिन्दुर लें। पाँचो को पश्चिम मुँह कर के खड़ा होने को कहें। बाल खुला रखें। पहले सबके पैर पर जल गिरायें। एक तरफ से ही पैर पर जल गिराते (पखारते) चले जायें, दोहरायें नहीं। फिर माथे मे तेल लगाये। तेल भी एक बार लगायें।

इसी तरह सिन्दूर भी कस कर चुटकी में लें और नाक पर से ऊपर करते हुए माँग को भर दें। उसके बाद जोड़ा पूड़ी वाला सब प्रसाद सहित उठाते हुए एक ही बार में आँचल में उठाकर दे दें। उसके बाद पाँचों सुहागिन महिलाओं को पैर छू कर प्रणाम करें। पूजा स्थान से जल गिराते हुए कानू के पैर तक गिरावें। फिर प्रणाम करें। उसके बाद सबसे पहले कलश में जो जल (गंगाजल) भर के पूजा स्थान पर रखा गया था, उस कलश को उठाकर बायें हाथ में लें। दाहिने हाथ से कलश में रखा आम का पल्लव लेकर कलश जल में डुबाकर पूजा स्थान तथा सब घर में शांतिजल के रूप में छिड़कें (अभिसिंचित करें) बचा हुआ जल सूर्यार्घ देवें। इस जल को सूर्य का दर्शन करते हुए तुलसी के पौधें में डाल दें।

पूजन समाप्त हो जाने के बाद अब घर के और विधि विधान जैसे-लगन, बरी उबटन भूंजना उबटन पीसना और भूखे पेट ही उबटन लगाने का काम किया जाता है। वो सब करें। कानू (पाँचो महिलाओं) और कचोरा (छांकी) पीने वाले बच्चों को खाना खिलावें। खाना में नमक का प्रयोग न करें। पूड़ी या दोस्ती पूड़ी, दही, खीर बुन्दिया जो भी संभव हो, गुड़ ही मीठा खाने का नियम है। पूजा के अलावा जो प्रसाद है उसी से बाहरी व्यक्ति को बाँटे। गोसांय पर चढ़ाया हुआ प्रसाद घर के ही व्यक्ति या गोतिया परिवार ही खायें। शाम को फिर दीपक जलाकर सांझा देकर सुपली मौनी उठा ले और कानू के यहाँ दे आवे। लाल खाँ का ढकना वाला प्रसाद भी उठा लें। घर के लड़के और पुरुष ही उस प्रसाद को खाएं।

पूजन सामग्री

(१) कलश मिट्टी का १, ढक्कन- १, चौमुखी- १
(२) छोटा दीपक- २८
(३) तिल या सरसों का तेल- १ किलोग्राम
(४) शुद्ध घी- २०० ग्राम (गाय का)
(५) तिल १ किलो ग्राम
(६) चावल- ५ किलोग्राम अरवा
(७) धूप- १ किलोग्राम
(८) हवन सामग्री- गुग्गुल, जटामासी इत्यादि।

आर्य समाज या गायत्री मंदिरों की दूकानों या बाजार में भी हवन सामग्री मिलती हैं जिसमें ये जड़ी-बुटियाँ मिली होती हैं अगर, तगर, खस, गोखरु, गोरखमुंडी, शंख पुष्पी, ताल पर्णी, पृष्ठ पर्णी, इन्द्रजौ, ताल-मखाना, कपूर कचरी, आंवला, हर्रे, बहेड़ा, पोहकर मूल, मजीढ़, नेत्रावाला, बड़ी इलाइची, तालिसपत्र, भोजपत्र, तेजपत्र, गुलाब का फूल, गेंदा का फूल, प्रियंगु, गुग्गुल, जटामासी इत्यादि। इन संस्थाआें से लेने पर बाजार की दूकान से सस्ता पड़ता है।

(१) जौ- २५० ग्राम
(२) आम का लकड़ी (समीघा)- ५ कि०,
(३) जनेऊ ५ जोड़ा,
(४) पीला कपड़ा- ढ़ाई मीटर (२.५० मीटर),
(५) फल- केला, सेब, नारंगी, खीरा इत्यादि,
(६) आसनी कुश या कम्बल का
(७) पीला चंदन- १०० ग्राम
(८) उजला चंदन- १०० ग्राम,
(९) रोली चंदन- २ पुड़िया,
(१०) रक्षा सूत्रा (कलावा)- ४ गोला,
(११) कपूर- २०० ग्राम
(१२) रुई की बत्ती लंबा वाला – २ पैकेट,
(१३) रुई की बत्ती गोलवाला- २ पैकेट
(१४) पान- ५०
(१५) पंचामृत के लिए- गाय का दूध्, घी, मधु, तुलसीपत्र,
(१६) केला का पत्ता
(१७) कुश
(१८) गाय का गोबर,
(१९) मिट्टी का प्याला- २,
(२०) दूब,
(२१) तुलसी पत्ता,
(२२) मिट्टी का ढकना-४,
(२३) आरती के लिए छिपली- १,
(२४) थाली, ग्लास, बाल्टी (साफ धोया हुआ पूजा वास्ते अलग), (
२५) उजला- फूल, उजला फूलमाला – १०,
(२६) उजला गेरुआ- १४ लड़ एक मंदिरो में जहाँ चौदह देवान पिण्ड होते हैं, वहाँ १४ गेरुआ,
(२७) गुड़ या शक्कर- ५०० ग्राम
(२८) सूप- २,
(२९) मौनी- २,
(३०) गंगा जल, गंगोटी मिट्टी (अपने घर अथवा जिन मंदिरों में सर्वप्रथम बाबा गणिनाथ का पिण्ड स्थापना करना होता है, वहाँ बाबा गणिनाथ के अवतरण स्थल, तप स्थल पलवैया धाम से माँ गंगा, बाबा गणिनाथ, माँ क्षेमासती, बाबा गोविन्द सहित चौदह देवान का अवाह्न कर गंगा जल और गंगोट मिट्टी लायी जाती है),
(३१) धान- ढाई किलो, चूड़ा और लावा के लिए,
(३२) छोटा कसइली- २५० ग्राम,
(३३) हल्दी-२५० ग्राम
(३४) उबटन का मसाला- १ पुड़िया,
(३५) पंचमेवा- किसमिस, गरी, छुहारा, मखाना, सौंफ,
(३६) लौंग- ५० पीस,
(३७) इलाइची बड़ा- ५० पीस,
(३८) कलाय (उड़द) का दाल- ५०० ग्राम
(३९) धोती-१, कुरता-१, गमछा- १ या चादर
(४०) खड़ाऊ -१ जोड़ा
(४१) पीढ़ा-१,
(४१) झोला- १
(४२) बेत-एक (ढाई हाथ का)
(४३) छाता- १
(४४) सिन्दुरी का सामान,
(४५) साड़ी – १
(४६) ब्लाउज का कपड़ा- १
(४७) पेटी कोट-१ (लहंगा)
(४८) लहठी-चूड़ी
(४९) शृँगार का सामान
(५०) जीरा (खोंइछा)
(५१) भखड़ा सिन्दुर- १०० ग्राम
(५२) बिन्दी
(५३) कुमार दही- पूजा के एक दिन पूर्व (शुक्रवार) को गाय का दूध उबालकर जब जोड़न रखना हो तो दही न रखकर जोड़न के रूप में ताम्बे का पैसा या चम्मच रख दिया जाता है। रातभर में दही जम जाती है यह कुमार दही कहलाता है।
छांकी पिलाना – कच्चा दूध – २५० ग्राम, शक्कर (गुड़) और तुलसी जब मिलाकर बालक- २, बालिका- २ को पिलाया जाता है।
पूजन में भाग लेने वाले निश्चित सदस्य और सदस्या- पुजारी-पुजारन- पति-पत्नी, ५ सुहागिन औरते, २ कुमार बालक, २ कुमारी कन्या

पूजन- शिक्षण

(१) जल- जल ही जीवन है। हमारा जीवन भी जल के समान सरल तरल और सरस हो। हम कभी भी हार न मानें बल्कि जल के समान अवरूद्धों (रुकावटों) से लड़ते हुए जीवन पथ पर बढ़ते रहें।

दोहा-

जल की शिक्षा जीवन में कभी न मानों हार।
सरल तरल रसयुक्त हो, जीवन जल की धार।।

(२) अच्छत- अच्छत ईश्वर का प्रतीक है। ईश्वर अच्छत के समान अविनाशी है। हमारे विचार अच्छत हो, अविछिन्न हों, कभी डिगे कहकर मुकर न जाये। नहीं अच्छत अर्पण कर हम सब से अविरल प्रेम करना सीखें ।

दोहा-

अच्छत अक्षर ब्रह्म है, अक्षत करें विचार।
अच्छत अर्पण से सीखें, करना अविरल प्यार।।

(३) पुष्प- हमारे हृदय के भाव मध्ुर और कोमल हों। हम संपर्क में आने वालों के हृदय-मन में सुरुचि एवं सौंदर्य के भाव भर दें। यही पुष्प की शिक्षा है।

दोहा-

मधु-मधुर मृदुभाव को उर में कर संचार।
पुष्प सुरुचि सौंदर्य से, भर देता संसार।।

(४) चंदन- चंदन हमारे मस्तिष्क को शीतलता एवं स्थिरता प्रदान करे। हमारे विचार शान्त हो। हमारे पाप-संताप दूर हों, चंदन की सुगंध के समान हमारा यश फैले।

दोहा-

चंदन शीतल मन करे, शीतल करे विचार।
पाप ताप चंदन हरे, करे सुयश विस्तार।।

छंद

ऐसे कार्य करें हम जिससें, गंध सुयश का छाये।
विपदा से संघर्ष करें हम, उद्यम कर धन पायें ।।
चिंतन शांत विचार नम्र हो, धर्म-कार्य अपनायें।
आलस-प्रमोद का त्याग करें, विजय क्रोध पर पायें।।

(५) दीपक- दीपक संसार की भलाई के लिए तिल-तिल जलता है। हम परोपकार के लिए अमूल्य जीवन अर्पण करें। हम भी दीपक के समान बुराइयों रूपी अंधकार से लड़ते रहें। जैसे दीपक से दूसरा दीपक जलता है उसी प्रकार हम भी दूसरों को शिक्षित करें। सहायता करें ईश्वर ज्योति पुरुष है। हम मानव ईश्वर पुत्र-ज्योति पुत्र हैं।

दोहा-

तिल जिल जलना जगत हित, लुटा लुटा कर सांस ।
लड़ते रहना तिमिर से, कहता दीप प्रकाश ।।
दीपक से दीपक जले, दीप्त प्राण से प्राण ।
ईश्वर ज्योति पुरुष है, ज्योति-पुत्र इन्सान ।।

(६) यज्ञोपवित-परम पवित्र यज्ञोपवीत को प्रजापति (ब्रह्मा) ने सबके लिए (सहजता से) सर्वप्रथम निर्मित किया है। यह यज्ञोपवीत आयु, श्रेष्ठता, यश, बल और तेजस्विता देने वाला है ।
यज्ञोपवीत धारण का मंत्र

दोहा-

आयु तेजबल युक्तजो, परम यज्ञ का रूप।
सहज शुभ्र उपवीत यह, सबको मिले अनूप।।
धरण कर उपवीत को, सब जन बनें पवित्र।
सबका शुभ संस्कार हो, उत्तम होय चरित्र।।

पुराना यज्ञोपवीत उतारने का मंत्र

दोहा-

जीर्ण-शीर्ण उपवीत यह, पुनरपि ब्रह्म समान ।
हे सूत्र! विसर्जन करुँ, सुख से करो पयान ।।

(७) रक्षासूत्र- यह रक्षासूत्र व्रतशीलता (संकल्प) का प्रतीक है। आचार्य की ओर से प्रतिनिधियों द्वारा बांधा जाना चाहिए। पुरुषों तथा अविवाहित कन्याओं के दायें हाथ में तथा महिलाओं के बायें हाथ में कलावा बांधा जाना है ।

रक्षासूत्र (कलावा) बाँधने का मंत्र

दोहा-

यह जीवन व्रतशील हो, डिगे न पथ से अल्प।
व्रत बंधन से सीख लें, करना सत्संकल्प।।

अर्थात- हमारा जीवन व्रतशील बने। हम जिस मार्ग को सही मानकर उस पर बढ़ते हैं उससे डिगे नहीं। हम रक्षासूत्र बांधकर सत्य संकल्प करना सीखें।

(८) नैवेद्य (चढ़ावा)- यह मेरा है, यह मेरा है, कहना अहंकार का प्रतीक है। इसलिए ‘मेरापन’ का त्याग करना चाहिए। जब हम देव प्रतिमा या पिण्ड पर फल, मेवा, वस्त्र, द्रव्य आदि चढ़ाते हैं तो भावना यह रहे कि हे भगवान ! यह आप की दी हुई वस्तु आपको ही समर्पित है।

दोहा-

मेरा-मेरा क्या करे, मेरापन को त्याग।
फल मेव्ाा नैवेद्य की, शिक्षा सह अनुराग।।

(९) सूप- पूजन में बाँस की बनी सूप (सुपली) में पूजन-सामठाी रखकर पूजा हेत अर्पित की जाती है। यह सूप जीवन में सार वस्तु को ठाहण करने और बेकार का, आवांछनीय का त्याग करना सिखाता है।
(१०) मौनी- छोटी मौनी (टोकरी) बाँस की बनी होती है। यह संतोष करना सिखाती है। हम अपनी वर्तमान परिस्थितियों में संतोष धारण करते हुए निष्काम भावना से अपना कर्तव्य करें। हम सफलता-असफलता दोनों अवस्था में दुःखी न हों न कर्म का ही त्याग करें।
(११) उजला फूल- उजला फूल सादगी-निर्मलता का प्रेरक है। उजला फूल बाबा गणिनाथ को अति प्रिय है। वे जीवन में उजला फूल के समान बेदाग रहे और भक्तों को भी बेदाग रहने की शिक्षा दी। गोस्वामी तुलसी दास ने जो ‘राम चरित्र मानस’ में कहा है उसी के समान

बाबा गणिनाथ को छल-कपट से रहित भक्त प्रिय हैं, वे कहते है –

चैपाई –

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

(१२) दूध- दूध उजला होता है। दूध में गाय का दूध ही बाबा को प्रिय है। दूध का चढ़ावा ग्रहण कर भक्तों को गोवंश की रक्षा करने का संकल्प दिलाते हैं। गोरस ही अमृत है। गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर को पंचगव्य कहते है। पूजा में पंचगव्य का पान कर अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं। बाबा गणिनाथ की पूजा में भक्तों को पंचगव्य का पान करना चाहिए।
(१३) पंचामृत- पंचामृत पूजा के अवसर पर अर्पण कर उसे प्रसाद के रूप में ठाहण किया जाता है। उसमें गाय का दूध, दही, घी, मधु और तुलसी पत्र डाला जाता है तथा पूजा के बाद वितरण किया जाता है। दूध-बल, दही-ओज, घी- तेजस्विता, मधु- वाणी और कर्म में मधुरता तथा तुलसी पत्र त्याग की शिक्षा देता है।
(१४) खड़ाऊ- बाबा को हम खड़ाऊ (पदत्राण) अर्पित करते हैं। उसकी शिक्षा यह है कि मान लें राह में काँटे ही काँटे भरें हैं। हम कितना कांटा चुनेंगे। बस बाबा गणिनाथ का आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं प्रदत्राण पहनें और काँटो (कठिनाइयों) से बचें।
(१५) बेंत- बेंत शस्त्र का प्रतीक है। हम अपनी रक्षा करते हुए दूसरों की भी रक्षा करें। यह दुष्टों का दमन करने तथा अपने आप पर संयम

नियंत्रण रखने की शिक्षा देता है। श्री राम चरित मानस में ‘दण्ड’ के लिये लिखा है-

दोहा-

दण्ड यतीन्ह कर भेद जहँ, नर्तक नृत्य समाज ।
जीतहु मनहिं सुनियेअस, रामचन्द्र के राज।।

अर्थात- दण्ड धारण करने वाले साधुजन मन को जीतने की प्रेरणा देते हैं। बाबा गणिनाथ बेंत या दण्ड धारण करते थे। युद्ध के मैदान में वे अन्य अस्त्र-शस्त्र धारण करते थे। हम तन-मन में व्याप्त काम क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर- इन छह शत्रुओं को जीते।

सूर्यार्घ्यदान मंत्र

दोहा-

सूर्यदेव यह जल नहीं, साधक का है प्राण।
इसे ग्रहण कर जगत हित, बरसावें अनुदान।।
सूर्यदेव सहस्त्र-किरण, तेज राशि आदित्य।
कृपा करें मुझ भक्त पर, अर्घ्य ग्रहण कर नित्य।।

परिक्रमा मंत्र

दोहा-

जबहिं त्याग कुपन्थ को, धरे सपुथयर पाँव।
जनम-जनम के पाप का, करें नाश का भाव।।
परिक्रमा की सीख है, अपनावे आदर्श।
उच्च भाव देवत्व को ओर करें उत्कर्ष।।

पुष्पांजलि का मंत्र

दोहा-

देवगणों ने यज्ञ का किया प्रथम आहन।
जिससे तीनों लोक में, मिला उन्हें सम्मान।।
पुष्षांजलि यह मन्त्रमय, भगवान करूँ प्रदान।
हों प्रसन्न हे देवगण, करें सर्व उत्थान।।

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