Varanasi

दादी-नानी के क्रोशिया हुनर को महिलाओं ने दी नई उड़ान, राखियों से कमा रहीं हजारों रुपये

वाराणसी में विलुप्त होती क्रोशिया हस्तकला को स्वयं सहायता समूह की महिलाएं राखी निर्माण से नई पहचान दे रही हैं। पिंडरा के गरथमा और हरहुआ के मंसापुर की दीदियों ने क्रोशिया वर्क से तिरंगा, कृष्ण, रुद्राक्ष और मोती वाली आकर्षक राखियां तैयार की हैं। पर्यावरण-अनुकूल और हस्तनिर्मित इन राखियों की बाजार में अच्छी मांग है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और योगी सरकार के सहयोग से महिलाएं उत्पादन, पैकिंग और बिक्री का कार्य कर आय अर्जित कर रही हैं। इससे पारंपरिक हुनर के संरक्षण के साथ महिला आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिल रहा है।

वाराणसी : कभी दादी-नानी के हाथों में नजर आने वाला क्रोशिया आज धीरे-धीरे विलुप्त होती पारंपरिक हस्तकला की श्रेणी में पहुंच रहा है। योगी सरकार की दूरदर्शिता और सहयोग से क्रोशिया के जरिए गर्म कपड़े और विभिन्न डिजाइन की आकर्षक वस्तुएं बनाने की परंपरा को महादेव और शिव स्वयं सहायता समूह की महिलाएं आगे बढ़ा रही हैं। उन्होंने इसी पारंपरिक कला को राखी निर्माण से जोड़कर न केवल इसे नया जीवन दिया है, बल्कि इसे अपनी आजीविका का जरिया भी बनाया है। तिरंगा,कृष्णा  ,रुद्राक्ष ,मोती और क्रोशिया वाले रखियो की बहनों की खरीदारी में खूब डिमांड है। वाराणसी विकास प्राधिकरण ,नगर निगम,विकास भवन ,काशी प्रेरणा और आकांक्षा मार्ट  समेत अन्य जगह पर आज( गुरुवार को ) समूह की महिलाओं द्वारा निर्मित राखियों की बिक्री होगी।

वाराणसी के ब्लॉक पिंडरा के गांव गरथमा तथा ब्लाक हरहुआ के ग्राम पंचायत मंसापुर की स्वयं सहायता समूह की दीदियों ने अपनी पारंपरिक कला और हुनर को रोजगार का माध्यम बनाया है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत समूह की महिलाओं ने क्रोशिया वर्क से सुंदर और आकर्षक राखियां तैयार की हैं। हस्तनिर्मित इन राखियों की बाजार में खूब मांग है।समूह की दीदियों अनुराधा भरद्वाज , रंजना सिंह, ऊषा सिंह, मंजू देवी, रागनी और काजल ने  हाथ से बनी और पर्यावरण-अनुकूल राखियां तैयार की हैं। रंग-बिरंगे धागों की बारीक बुनाई और आकर्षक डिजाइनों से सजी ये राखियां देखने में सुंदर होने के साथ-साथ पहनने में भी आरामदायक हैं। हस्तनिर्मित होने के कारण इनमें आत्मीयता और अपनापन भी महसूस होता है।

महादेव समूह की प्रतिभा,पार्वती, ममता, ज्योति,नीतू ,अर्चना बताती है कि समूह की महिलाएं राखी बनाने से लेकर आकर्षक पैकिंग तक का काम करती है। जिससे समूह की दीदियों  द्वारा तैयार राखियों की कीमत अन्य तरीको से बनी राखियों की तुलना में किफायती है। इससे स्थानीय लोगों के बीच इनकी मांग बढ़ रही है  महिलाओं को अपनी मेहनत का बेहतर प्रतिफल मिल रहा है। समूह की महिलाओं का कहना है कि क्रोशिया वर्क से तैयार राखियां स्वदेशी उत्पाद, आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही  हैं। स्थानीय बाजारों और मेलों में इनकी बढ़ती मांग से महिलाओं की आय में वृद्धि हो रही है और वे आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं।

महादेव स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष अनुराधा भारद्वाज बताती हैं कि राखी के पर्व पर करीब तीस से पैतीस हजार तक की आय हो जाती है। इसके अलावा योगी सरकार के सहयोग से समूह की महिलाओं को आजीविका के कई साधन उपलब्ध हो रहे हैं। महिलाएं पर्व-त्योहारों के साथ ही सामान्य दिनों में भी अलग-अलग प्रकार के उत्पाद तैयार कर उनकी बिक्री करती हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि आजीविका मिशन के सहयोग ने समूह की महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा होने और आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है।

उपायुक्त स्वतः रोजगार पवन कुमार सिंह बताते हैं कि समूह की महिलाओं द्वारा तैयार की जा रही पर्यावरण-अनुकूल राखियों की बिक्री में आजीविका मिशन की ओर से हर संभव सहयोग दिया जा रहा है। महिलाओं के उत्पादों की बिक्री मेलों,आकांक्षा मार्ट ,काशी प्रेरणा मार्ट और प्रदर्शनी में लगाए जाने वाले अन्य आयोजनों में स्टॉल उपलब्ध कराने में मदद की जा रही है। इससे समूह की महिलाओं को अपने उत्पादों के लिए बाजार मिल रहा है और उनकी आय में भी बढ़ोतरी हो रही है।

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