महाअष्टमी व्रत और कन्या पूजन 30 सितम्बर को, नवरात्र का महापर्व श्रद्धा–भक्ति का संगम
नवरात्र का महापर्व अपने चरम पर पहुँच चुका है। सोमवार शाम से आरंभ हो रही अष्टमी तिथि के साथ ही भक्तजन मंगलवार (30 सितम्बर) को श्रद्धा और भक्ति के साथ महाअष्टमी व्रत और कन्या पूजन करेंगे। इस दिन घर-घर में माँ दुर्गा की आराधना, दुर्गा सप्तशती पाठ, हवन और कन्या पूजन का आयोजन होगा। मंदिरों में भव्य सजावट और आरती के साथ भक्ति का वातावरण बनेगा। महाअष्टमी का व्रत माँ दुर्गा की आराधना का सबसे शक्तिशाली दिन माना गया है। इसी दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर धर्म की रक्षा की थी। भक्त इस दिन कन्या पूजन कर माँ के नौ स्वरूपों की उपासना करते हैं। कई श्रद्धालु अगले दिन नवमी तिथि (1 अक्टूबर) को भी कन्या पूजन करते हैं।अष्टमी तिथि आरंभ: 29 सितम्बर (सोमवार) शाम 4:31 बजे | अष्टमी तिथि समाप्त: 30 सितम्बर (मंगलवार) शाम 6:06 बजे |व्रत एवं कन्या पूजन का शुभ दिन:30 सितम्बर, मंगलवार |
- महाअष्टमी और कन्या पूजन 30 सितम्बर को : माँ दुर्गा की आराधना और शक्ति साधना का पर्व
- 29 सितम्बर शाम 4:31 बजे से आरंभ होगी अष्टमी तिथि, 30 सितम्बर शाम 6:06 बजे तक रहेगा शुभ काल
- महाअष्टमी व्रत और कन्या पूजन मंगलवार को, नवमी पर भी कई श्रद्धालु करेंगे पूजन
शारदीय नवरात्र अपने चरम पर है। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 29 सितम्बर (सोमवार) शाम 4:31 बजे से प्रारम्भ होकर 30 सितम्बर (मंगलवार) शाम 6:06 बजे तक रहेगी। परम्परा के अनुसार महाअष्टमी का व्रत और कन्या पूजन 30 सितम्बर (मंगलवार) को किया जाएगा, जबकि अनेक श्रद्धालु नवमी तिथि 1 अक्टूबर (बुधवार) को भी कन्या पूजन करते हैं। मंदिरों में विशेष साज-सज्जा, आरती और भजन-कीर्तन की तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं; शहर और कस्बों के पंडालों में भक्तों की रौनक बढ़ने लगी है।
अष्टमी का दिन शक्ति-आराधना का शिखर माना जाता है। धर्मग्रन्थों में वर्णित है कि इसी दिवस देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश दिया। घर-घर में दुर्गा सप्तशती का पाठ, हवन, आरती और कन्या पूजन के आयोजन होंगे। पंडित वर्ग का मानना है कि अष्टमी पर ससम्मान कन्या पूजन से नारी-शक्ति की आराधना पूर्ण मानी जाती है और गृहस्थ जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है।
व्रत कब और कैसे
अष्टमी व्रत 30 सितम्बर को रखा जाएगा। प्रातः काल स्नान के बाद भक्त संकल्प लेकर दिनभर फलाहार करते हैं, पूजा-स्थल पर माँ दुर्गा का चित्र या प्रतिमा स्थापित कर दीप प्रज्वलित किया जाता है। दुर्गा सप्तशती, देवी कवच और अर्गला स्तोत्र का पाठ किया जाता है। संध्या समय हवन और आरती के साथ पूजा का समापन कर कन्या पूजन किया जाता है। जिन परिवारों में नवमी को कंजक-भोज की परम्परा है, वे 1 अक्टूबर को कन्याओं का पूजन-भोजन कराते हैं।
कन्या पूजन
लोकआस्था में 2 से 10 वर्ष तक की नौ बालिकाओं और एक बालक (लड्डू गोपाल रूप) को देवी के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर पूजने का विधान है। परम्परा में घर के वयोवृद्ध अथवा गृहिणियाँ कन्याओं का स्वागत कर उनका पाँव धोती हैं, आसन पर बिठाकर तिलक लगाती हैं, आरती उतारकर प्रसाद—पूड़ी, काले चने और सूजी का हलवा—भोजन कराती हैं। भोजन के उपरान्त प्रत्येक कन्या को दक्षिणा, वस्त्र अथवा उपयोगी उपहार देकर आशीर्वाद लिया जाता है। पुरोहितों के अनुसार, “कन्या में देवी का निवास” मानने की यह परम्परा नारी-सम्बोधन, करुणा और सम्मान का सामाजिक संदेश भी देती है।
पूजा-विधि
भक्तजन प्रातःकाल घर और पूजा-स्थल की शुद्धि-सफाई कर उत्तर अथवा पूर्व मुख होकर माँ दुर्गा का पूजन करते हैं। लाल वस्त्र से सजी चौकी पर प्रतिमा रखकर कलश-स्थापना, सिंदूर, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य और जल-अर्पण किया जाता है। दिन में समयानुसार सप्तशती-पाठ चलता है। संध्या होते ही परिवारजन दीपक, धूप और कपूर के साथ आरती करते हैं तथा हवनकुंड में “ॐ दुर्गायै स्वाहा” उच्चार के साथ आहुतियाँ समर्पित करते हैं। हवन की पूर्णाहुति के बाद कन्या पूजन प्रारम्भ होता है और अन्त में देवी से कल्याण की कामना कर व्रत-समापन होता है।
धार्मिक महत्त्व और लोक-जीवन का उत्सव
अष्टमी व्रत को शौर्य, संयम और करुणा—तीनों का संगम माना गया है। धर्माचार्यों का कहना है कि यह दिवस शक्ति-साधना के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों का भी पर्व है। कन्या पूजन से बालिकाओं के सम्मान और सुरक्षा का संदेश घर-घर तक पहुँचता है। वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर और लखनऊ के प्रमुख मंदिरों में भव्य झाँकियाँ सजी हैं; कई स्थानों पर रात्रि-जागरण और शक्ति-वंदना के कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। लम्बी कतारों में दर्शन को आए श्रद्धालु दीप, प्रसाद और चुनरी लिए माता के जयकारे लगाते दिखाई दे रहे हैं।
श्रद्धा की आवाज़ें
लखनऊ के श्रद्धालु राकेश तिवारी कहते हैं, “महाअष्टमी हमारे लिए नया उत्साह लेकर आती है; कन्या पूजन से लगता है जैसे माँ स्वयं घर आयी हों।” वाराणसी की गृहिणी सावित्री देवी का कहना है, “हर वर्ष नौ कन्याओं का पूजन करती हूँ, उनके आशीर्वाद से घर में सदैव शांति बनी रहती है।” स्थानीय पुरोहित रामनारायण शास्त्री का मत है, “अष्टमी पर हवन और दान का विशेष पुण्य माना गया है; नवरात्र का फल इस दिन परिपूर्ण होता है।”
स्वास्थ्य व आहार-परम्परा का परिप्रेक्ष्य
व्रतधारी सामान्यतः फल, दूध, दही, आलू, कुट्टू और सिंहाड़े का सेवन करते हैं। आयुर्वेदाचार्यों का मत है कि सात्त्विक फलाहार शरीर को हल्का, मन को एकाग्र और साधना को समर्थ बनाता है। तैलीय और भारी खाद्य से परहेज़ करने तथा पर्याप्त जल पीने की सलाह दी जाती है।
महाअष्टमी न केवल आध्यात्मिक जागरण का अवसर है, बल्कि नारी-शक्ति के सम्मान का लोक-उत्सव भी है। 30 सितम्बर को अष्टमी-व्रत और कन्या-पूजन के साथ भक्तजन शक्ति की उपासना में लीन रहेंगे; 1 अक्टूबर की नवमी पर भी अनेक परिवार कंजक-भोज कर परम्परा का निर्वाह करेंगे। देवी-जागरण से सजे मंदिरों और घर-आँगनों में दीपों की लौ के साथ यह विश्वास फिर पुष्ट होगा कि जहाँ नारी का मान है, वहीं समृद्धि और शांति का निवास है।
महाअष्टमी की रात्रि: साधकों के लिए तंत्र-साधना का विशेष समय
महाअष्टमी की रात्रि तांत्रिक और आध्यात्मिक साधकों के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। ज्योर्तिविद रमन जी के अनुसार, यह रात्रि तंत्र-मंत्र साधना के लिए विशेष फलदायी होती है। उन्होंने बताया कि महाअष्टमी की रात्रि के बाद आने वाली नवमी तिथि *मां सिद्धिदात्री* को समर्पित होती है, जो नवरात्र की पूर्णता का प्रतीक है। रमन जी के अनुसार, “प्रथम नवरात्र का आरंभ कलश स्थापना से होता है। कलश सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है। नवरात्रि का यह काल चराचर जगत में व्याप्त *सत्व, रज और तम* — तीनों गुणों को संतुलित करता है।”
उन्होंने बताया कि इस काल में दिन और रात बराबर होते हैं, वर्षा ऋतु अपने अंतिम चरण में होती है, और पृथ्वी हरियाली से सजी होती है। खेतों में धान की बालियाँ झूमने लगती हैं — जो समृद्धि और *लक्ष्मी स्वरूपा धन* के आगमन का प्रतीक है। दीपावली के आगमन में भी अब केवल बीस दिन शेष रहते हैं।
अंत में उन्होंने देवी की स्तुति के रूप में कहा —
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा रूपेण संस्थिता।
नमो तस्यै नमो तस्यै नमो तस्यै नमो नमः।
या देवी सर्वभूतेषु सिद्धि रूपेण संस्थिता।
नमो तस्यै नमो तस्यै नमो तस्यै नमो नमः।
अष्टमी एवं कन्या पूजन
अष्टमी पूजा का शुभ समय
- अष्टमी तिथि प्रारंभ: सोमवार, 29 सितम्बर शाम 4:31 बजे
- अष्टमी तिथि समाप्त: मंगलवार, 30 सितम्बर शाम 6:06 बजे
- महाअष्टमी व्रत और कन्या पूजन: मंगलवार, 30 सितम्बर
पूजन का सर्वोत्तम समय: प्रातःकाल से दोपहर 12:00 बजे तक — माँ दुर्गा की आराधना, हवन और कन्या पूजन का अत्यंत शुभ मुहूर्त । संध्या समय आरती और देवी-स्तुति के लिए उपयुक्त। सुबह का समय देवी आराधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
अष्टमी व कन्या पूजन की सामग्री सूची
- माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र
- लाल या पीला कपड़ा (आसन व माँ का वस्त्र)
- कलश, नारियल, आम या अशोक पत्तियाँ
- सिंदूर, अक्षत (चावल), हल्दी, रोली, मौली
- फूल, माला, बेलपत्र, दुर्गा सप्तशती ग्रंथ
- दीपक (घी का), धूप, कपूर, घंटी
- फल, दूध, दही, मिठाई और नैवेद्य
- कन्या पूजन हेतु पूड़ी, काले चने, सूजी का हलवा
- दक्षिणा, श्रृंगार सामग्री, वस्त्र या उपहार
भक्तजन पूजा में लाल पुष्प और लाल चुनरी को विशेष शुभ मानते हैं।
मुख्य बीज मंत्र : “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥”
संकल्प मंत्र :“मम सकलपापक्षयपूर्वक सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थं दुर्गाष्टमीव्रतं करिष्ये।”
पूजन मंत्र (माँ दुर्गा को अर्पण करते समय): “ॐ दुं दुर्गायै नमः। ॐ सर्वमङ्गले माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते॥” मंत्र का अर्थ — देवी दुर्गा मंगल की अधिष्ठात्री हैं, जो सभी कार्यों में सिद्धि देने वाली हैं। उन्हें नमस्कार है।
महाअष्टमी की पौराणिक कथा (संक्षेप में)
पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर नामक राक्षस को ब्रह्मा से वरदान मिला था कि कोई देवता या पुरुष उसे मार नहीं सकता। वरदान पाकर महिषासुर ने तीनों लोकों पर अत्याचार शुरू किया। देवता भयभीत होकर त्रिमूर्ति — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — के पास पहुँचे। तब तीनों देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई — वही माँ दुर्गा थीं। माँ दुर्गा ने अपने सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर से नौ दिनों तक भयंकर युद्ध किया। अष्टमी तिथि को देवी ने अपने त्रिशूल और चक्र से उसका वध किया। उस समय देवताओं ने प्रसन्न होकर देवी की स्तुति की और यह दिन “महाअष्टमी” कहलाया। इस कथा का संदेश है — जब अहंकार और अन्याय बढ़ता है, तब शक्ति स्वरूपा नारी अधर्म का विनाश कर धर्म की स्थापना करती है। अष्टमी को देवी के “महिषासुर मर्दिनी” रूप की आराधना इसी स्मृति में की जाती है।
कन्या पूजन का महात्म्य
नवरात्र की अष्टमी और नवमी को नौ कन्याओं और एक लड्डू गोपाल (बालक) का पूजन किया जाता है। इन कन्याओं को देवी के नौ स्वरूपों — शैलपुत्री से सिद्धिदात्री — का प्रतीक माना गया है। कन्याओं को आमंत्रित कर उनके पाँव धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है, फूल अर्पित किए जाते हैं और पूड़ी, काले चने व हलवा खिलाया जाता है। पूजन के बाद दक्षिणा, वस्त्र या श्रृंगार सामग्री देकर आशीर्वाद लिया जाता है। कन्या पूजन का अर्थ है — नारी में देवी का सम्मान करना। यह पूजा शक्ति, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक है।*
दुर्गा आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
जय अम्बे गौरी॥
माँ तुम्हारा रूप निराला, वरदान देनेवाली।
मनचाहा फल देनेवाली, दुखहारी सुखदायिनी॥
जय अम्बे गौरी॥
सिंह सवारी भवानी, त्रिशूल और खप्पर धारी।
जग में संकट हरने वाली, सबकी पालनकारी॥
जय अम्बे गौरी॥
माँ शरण में जो आता, निस्संदेह सुख पाता।
सेवक का पालन करती, सब दुःखों को हर लेती॥
जय अम्बे गौरी॥
जो माँ का नाम पुकारे, संकट उसका टाले।
माँ तेरे चरणों की वन्दना, जीवन सफल बना दे॥
जय अम्बे गौरी॥
आरती के अंत में परिवार सहित “जय माता दी” के जयकारे से वातावरण गुंजायमान हो उठता है।
पूजा का सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश
महाअष्टमी और कन्या पूजन केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि समाज में नारी के सम्मान का सशक्त प्रतीक हैं। देवी दुर्गा की आराधना शक्ति, करुणा और न्याय — तीनों के संतुलन की शिक्षा देती है। घर-आँगन में कन्या का पूजन यह स्मरण कराता है कि नारी ही सृजन और शक्ति का स्रोत है। अष्टमी का यह पर्व हमें यही सिखाता है कि जहाँ नारी का सम्मान है, वहीं ईश्वर का वास है।
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