“पितृ विसर्जन और सूर्य ग्रहण का अद्भुत संगम: वैज्ञानिक तथ्यों से ज्योतिषी संकेतों तक”
इस वर्ष भारत में एक दुर्लभ संयोग बन रहा है। पितृपक्ष के प्रथम दिन चन्द्र ग्रहण पड़ा और अब पितृ विसर्जन, यानी सर्वपितृ अमावस्या के दिन सूर्य ग्रहण लग रहा है। धार्मिक मान्यताओं में पितृ विसर्जन का दिन पूर्वजों को स्मरण और तर्पण-श्राद्ध का सबसे पवित्र अवसर माना जाता है। ऐसे में जब इसी दिन सूर्य ग्रहण जैसी बड़ी खगोलीय घटना घट रही हो, तो स्वाभाविक है कि इसका महत्व और चर्चा दोनों बढ़ जाते हैं। पितृ विसर्जन और सूर्य ग्रहण का यह संयोग एक साथ आना बेहद दुर्लभ है। खगोल विज्ञान इसे एक प्राकृतिक घटना मानता है, जबकि ज्योतिष और परम्पराएँ इसे पूर्वजों की आत्माओं और मानव जीवन पर असर डालने वाला समय मानती हैं। चाहे इसे विज्ञान की नजर से देखें या धर्म-ज्योतिष की दृष्टि से, इतना तय है कि यह घटना मनुष्य को आत्मावलोकन, पूर्वज स्मरण और जीवन की गहराई से जुड़ने का एक अवसर अवश्य देती है।
ग्रहण का यह समय भारत में दिखाई नहीं देगा, परंतु इसकी खगोलीय और ज्योतिषीय व्याख्या देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक आंशिक सूर्य ग्रहण है, जो अमावस्या की रात घटेगा। ग्रहण की शुरुआत भारतीय समयानुसार रात 10:59 बजे होगी, चरम मध्यरात्रि 1:59 बजे और समाप्ति तड़के 3:23 बजे तक रहेगी। सूर्य ग्रहण तब होता है जब चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आकर सूर्य की रोशनी को आंशिक या पूर्ण रूप से ढक लेता है। इस बार चन्द्रमा सूर्य का केवल एक भाग ढकेगा, इसलिए यह आंशिक ग्रहण होगा। भारत में इसका प्रत्यक्ष दर्शन संभव नहीं है, इसलिए यहाँ पर “सूतक काल” का प्रभाव लागू नहीं होगा।
ग्रहण के दौरान सूर्य की किरणों में कमी से वातावरण ठंडा-सा हो सकता है। यह घटना वैज्ञानिकों के लिए सूर्य के बाहरी वातावरण यानी “कोरोना” को अध्ययन करने का अवसर देती है। आम जन के लिए यह सिर्फ एक अद्भुत खगोलीय दृश्य है, जिसका स्वास्थ्य पर सीधा असर नहीं पड़ता, बशर्ते कोई व्यक्ति बिना सुरक्षा उपकरणों के सूर्य की ओर सीधी दृष्टि न डाले।
ज्योतिषीय प्रभाव : पितृपक्ष का समय पूर्वजों की आत्मा की शांति और आशीर्वाद के लिए समर्पित होता है। ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि जब अमावस्या, पितृ विसर्जन और सूर्य ग्रहण जैसे तीन संयोग एक साथ हों, तो इसका विशेष प्रभाव दिखाई देता है। पूर्वजों का आशीर्वाद: श्राद्ध और तर्पण का फल अधिक प्रबल माना जाता है। जीवन पर असर: ग्रहों की स्थिति में अस्थिरता के कारण नए कार्यों की शुरुआत से बचने की सलाह दी जाती है। भावनात्मक प्रभाव: यह समय आत्मावलोकन, मानसिक उतार-चढ़ाव और संबंधों की गहराई से जुड़े निर्णयों का हो सकता है। दान-पुण्य का महत्व: ग्रहण काल में ध्यान, जप और दान को शुभ माना जाता है।
उपाय और परम्पराएँ : पूर्वजों के लिए तर्पण और पिंडदान श्रद्धा से करें। ग्रहण के समय संयम, उपवास और सात्विक आहार का पालन करें। सीधे सूर्य की ओर न देखें; देखने की स्थिति में उचित सुरक्षा चश्मे का प्रयोग करें। मानसिक शांति और आत्मशुद्धि के लिए मंत्र-जप, ध्यान और प्रार्थना करें।
सूर्य ग्रहण अवधि : क्या करें और क्या न करें
इस बार का सूर्य ग्रहण (21 सितम्बर 2025, रविवार) भारत में प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देगा, लेकिन खगोलीय दृष्टि से इसका समय इस प्रकार रहेगा:
ग्रहण प्रारम्भ : रात 10:59 बजे (21 सितम्बर)
मध्य / चरम अवस्था : रात 1:59 बजे (22 सितम्बर)
ग्रहण समाप्ति : तड़के 3:23 बजे (22 सितम्बर)
यानी कुल अवधि लगभग 4 घंटे 24 मिनट रहेगी।
भारत में प्रभाव : चूँकि ग्रहण भारत में प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहाँ सूतक काल (ग्रहण का धार्मिक प्रभाव) मान्य नहीं होगा। वैज्ञानिक दृष्टि से भी भारत में इसके किसी प्रकार के भौतिक असर (प्रकाश/तापमान परिवर्तन) अनुभव नहीं होंगे।
क्या करना चाहिए : मंत्र-जप और ध्यान – ग्रहण के समय प्रार्थना, मंत्र-जप और ध्यान को विशेष फलदायी माना गया है। दान-पुण्य – ग्रहण के बाद स्नान कर भोजन, अनाज, वस्त्र या दान देना शुभ फल देता है। स्नान और शुद्धि – ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान कर घर और पूजा स्थान की शुद्धि करना चाहिए। पूर्वज तर्पण – पितृ विसर्जन के अवसर पर तर्पण और श्राद्ध कर्म श्रद्धा से करना उत्तम माना जाता है। सात्विक आचरण – संयम, शांत स्वभाव और सत्कार्य पर ध्यान देना चाहिए।
क्या नहीं करना चाहिए : भोजन न करें – ग्रहण काल में भोजन, जल ग्रहण और पकाने से बचना चाहिए। नकारात्मक कार्य – किसी का अपमान, क्रोध, विवाद या अशुद्ध आचरण से परहेज करें। बिना सुरक्षा सूर्य-दर्शन – वैज्ञानिक दृष्टि से बिना Eclipse Glasses के सूर्य को देखना आँखों के लिए हानिकारक हो सकता है। नए कार्य की शुरुआत – इस अवधि में कोई नया काम, बड़ा निवेश या यात्रा प्रारम्भ करने से बचने की सलाह दी जाती है।
ध्यान दें: इस बार का सूर्य ग्रहण भारत में प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहाँ सूतक काल मान्य नहीं होगा। फिर भी जो लोग धार्मिक मान्यताओं का पालन करना चाहते हैं, वे ऊपर बताए गए सामान्य नियमों का ध्यान रख सकते हैं।
सूर्य ग्रहण: रहस्यमयी नहीं, खगोलीय विज्ञान की अद्भुत घटना
सूर्य ग्रहण को लेकर आमजन में प्राचीन काल से ही तरह-तरह की धारणाएँ जुड़ी रही हैं, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह कोई रहस्य नहीं बल्कि एक स्वाभाविक खगोलीय घटना है। जब चन्द्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है और पृथ्वी तक पहुँचने वाली सूर्य की रोशनी को कुछ समय के लिए ढक देता है, तभी सूर्य ग्रहण घटित होता है। ग्रहण केवल अमावस्या के दिन ही संभव है, क्योंकि उसी समय चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी की सीध में आता है। चन्द्रमा की छाया जब पृथ्वी पर पड़ती है तो कुछ हिस्सों में सूर्य पूर्ण रूप से ढक जाता है (पूर्ण ग्रहण), कहीं केवल आंशिक (आंशिक ग्रहण) और कभी-कभी अंगूठी जैसा दृश्य बनाता है जिसे वलयाकार ग्रहण कहते हैं। सूर्य ग्रहण कोई अशुभ या अलौकिक घटना नहीं, बल्कि एक अद्भुत खगोलीय दृश्य है जो हमें पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य के बीच गहरे संबंध को समझने का अवसर देता है। विज्ञान के लिए यह अध्ययन का स्वर्णिम समय है और आमजन के लिए प्रकृति का अनुपम नज़ारा।
वैज्ञानिक आधार
छाया का खेल – चन्द्रमा की छाया दो भागों में बंटती है: अम्ब्रा (Umbra): जहाँ सूर्य पूरी तरह ढक जाता है, वहाँ पूर्ण ग्रहण दिखाई देता है। पेनम्ब्रा (Penumbra): जहाँ सूर्य का केवल हिस्सा ढकता है, वहाँ आंशिक ग्रहण देखा जाता है।
क्यों हर अमावस्या पर ग्रहण नहीं होता? : पृथ्वी की कक्षा और चन्द्रमा की कक्षा एक-दूसरे से थोड़ी झुकी हुई हैं। इसलिए हर अमावस्या को चन्द्रमा और सूर्य बिल्कुल एक सीध में नहीं आते। केवल तब ही ग्रहण लगता है जब दोनों कक्षाएँ “नोड” नामक बिंदुओं पर मिलती हैं।
वैज्ञानिक महत्व : ग्रहण वैज्ञानिकों को सूर्य के बाहरी वातावरण यानी कोरोना को अध्ययन करने का अनोखा अवसर देता है। खगोल वैज्ञानिक ग्रहण का उपयोग सूर्य की किरणों, विकिरण और पृथ्वी पर उनके प्रभाव को समझने के लिए करते हैं। आधुनिक उपकरणों के साथ ग्रहण के समय सौर पवन (Solar Wind) और चुंबकीय तरंगों की भी जानकारी जुटाई जाती है।
सुरक्षा और जनजागरूकता : ग्रहण के समय बिना उचित सुरक्षा चश्मे के सीधे सूर्य को देखना आँखों के लिए खतरनाक हो सकता है। साधारण धूप का चश्मा पर्याप्त नहीं होता। वैज्ञानिक संस्थान केवल ISO प्रमाणित सोलर ग्लासेस या पिनहोल प्रोजेक्शन जैसी सुरक्षित तकनीकों से ही अवलोकन की सलाह देते हैं।
सूर्य ग्रहण और गर्भवती महिलाएँ: परम्परा बनाम विज्ञान
भारत समेत कई संस्कृतियों में यह मान्यता रही है कि सूर्य या चन्द्र ग्रहण का गर्भवती महिलाओं पर विशेष प्रभाव पड़ता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण काल में सावधानी न बरतने से गर्भस्थ शिशु पर नकारात्मक असर हो सकता है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से इसका सीधा कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन सावधानी और मानसिक शांति बनाए रखना हर हाल में लाभकारी माना गया है। ग्रहण को लेकर गर्भवती महिलाओं के लिए परम्परागत सावधानियाँ आज भी लोग मानते हैं। विज्ञान इसकी पुष्टि नहीं करता, लेकिन मानसिक शांति, संयम और सावधानी हर स्थिति में लाभकारी हैं।
परम्परागत सुझाव : धातु पास रखें: मान्यता है कि गर्भवती महिला अगर पेट पर धातु (जैसे चाकू या कैंची) रखे तो ग्रहण का दुष्प्रभाव कम होता है। प्रार्थना और ध्यान: ग्रहण के दौरान मंत्र-जप या ध्यान करने से मानसिक शांति मिलती है। आराम और संयम: घर के अंदर आराम से रहना, अनावश्यक गतिविधियों से बचना उचित माना जाता है। ग्रहण के बाद स्नान: परम्परा है कि ग्रहण खत्म होने के बाद स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें।
क्या न करें : ग्रहण का दर्शन न करें: परम्परा में माना गया है कि गर्भवती महिला को ग्रहण को देखना नहीं चाहिए। तेज वस्तुओं का प्रयोग न करें: ग्रहण काल में कैंची, चाकू जैसी चीजों का प्रयोग टालने की सलाह दी जाती है। खाना-पीना न करें: ग्रहण के समय भोजन करना परम्पराओं में वर्जित बताया गया है।नकारात्मक भावनाएँ न पालें: क्रोध, चिंता और तनाव से बचना गर्भस्थ शिशु के लिए भी शुभ माना जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण : अब तक कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि ग्रहण गर्भवती महिलाओं या शिशु पर प्रतिकूल असर डालता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि गर्भावस्था के दौरान किसी भी तरह का तनाव, डर या चिंता माँ और बच्चे दोनों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए ग्रहण को लेकर डरने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन आराम, सुरक्षा और मानसिक शांति बनाए रखना हमेशा फायदेमंद है।
सूर्य ग्रहण रात्रि में: भारत में न दिखने पर क्या सो सकते हैं?
इस बार 21–22 सितम्बर की रात लगने वाला सूर्य ग्रहण भारत में प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देगा। खगोलीय गणना के अनुसार ग्रहण की शुरुआत रात 10:59 बजे होगी और तड़के 3:23 बजे समाप्त होगा। चूँकि यह ग्रहण भारत से दिखाई नहीं दे रहा, इसलिए यहाँ सूतक काल मान्य नहीं होगा।भारत में रहने वाले लोग इस बार ग्रहण की अवधि में सामान्य रूप से सो सकते हैं। धार्मिक दृष्टि से भी इसका कोई प्रतिबंध लागू नहीं है। यह केवल एक खगोलीय घटना है जो भारत में दृश्य नहीं होगी।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण : वैज्ञानिक रूप से सूर्य ग्रहण का मानव जीवन पर कोई प्रत्यक्ष नकारात्मक असर नहीं होता। इसका प्रभाव केवल उन्हीं क्षेत्रों में भौतिक रूप से देखा जा सकता है जहाँ ग्रहण प्रत्यक्ष दिखाई देता है। भारत में यह ग्रहण अदृश्य रहेगा, इसलिए प्रकाश, तापमान या वातावरण में कोई परिवर्तन अनुभव नहीं होगा।
धार्मिक और पारम्परिक दृष्टिकोण : परम्परागत मान्यता है कि ग्रहण काल में सोना वर्जित होता है। लेकिन यह नियम तभी प्रभावी माना जाता है जब ग्रहण उस स्थान से देखा जा सके और सूतक काल लागू हो। इस बार चूँकि भारत में ग्रहण दिखाई नहीं देगा, इसलिए सूतक और उसकी धार्मिक बाध्यता भी नहीं होगी।
सूर्यग्रहण 2025 : राशियों पर प्रभाव और बचाव के उपाय
21-22 सितम्बर की रात होने वाला यह आंशिक सूर्यग्रहण भारत में प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देगा, इसलिए सूतक काल लागू नहीं होगा। इसके बावजूद ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति सभी 12 राशियों पर अलग-अलग प्रभाव डाल सकती है।
राशिवार प्रभाव
मेष (Aries): प्रभाव: मानसिक अस्थिरता, परिवारिक मामलों में उलझन। बचाव: हनुमान चालीसा का पाठ करें, मसूर दाल का दान करें। वृषभ (Taurus) : प्रभाव: आर्थिक निर्णयों में सावधानी आवश्यक, काम में देरी हो सकती है। बचाव: शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ, गरीबों को अन्न दान करें। मिथुन (Gemini) : प्रभाव: कार्यक्षेत्र में दबाव, स्वास्थ्य संबंधी छोटी परेशानी। बचाव: विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें, हरी मूंग का दान करें। कर्क (Cancer) :प्रभाव: रिश्तों में तनाव, मानसिक चिंता बढ़ सकती है। बचाव: चन्द्रमा को दूध अर्पित करें, परिवार के साथ समय बिताएँ। सिंह (Leo) : प्रभाव: आत्मविश्वास कम होगा, बड़े फैसले टालना बेहतर। बचाव: सूर्य मंत्र “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का जाप करें, गेहूँ का दान करें। कन्या (Virgo) :प्रभाव: कामकाज में अस्थिरता, स्वास्थ्य पर ध्यान जरूरी। बचाव: गणेश जी की पूजा करें, हरे वस्त्र पहनें। तुला (Libra) :प्रभाव: दाम्पत्य जीवन और साझेदारी में मतभेद संभव। बचाव: देवी दुर्गा की आराधना करें, कन्याओं को वस्त्र दान करें। वृश्चिक (Scorpio) : प्रभाव: अचानक खर्चे बढ़ सकते हैं, गुप्त शत्रुओं से सावधान रहें। बचाव: हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाएँ, मसालेदार भोजन से बचें। धनु (Sagittarius) :प्रभाव: पढ़ाई और करियर में अस्थिरता, भावनात्मक तनाव। बचाव: विष्णु भगवान की पूजा करें, पीली वस्तुएँ दान करें। मकर (Capricorn) : प्रभाव: घर-परिवार में मतभेद, माता-पिता का स्वास्थ्य प्रभावित। बचाव: भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करें, तिल का दान करें। कुंभ (Aquarius) : प्रभाव: संचार और यात्रा में बाधाएँ, मानसिक दबाव। बचाव: शनि देव की पूजा करें, काले तिल और तेल का दान करें। मीन (Pisces) : प्रभाव: आर्थिक हानि और निवेश में सावधानी जरूरी। बचाव: विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें, गरीबों को मिठाई बाँटें।
सामान्य बचाव उपाय
1. ग्रहण के समय मंत्र-जप और ध्यान करें। 2. ग्रहण खत्म होने के बाद स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें। 3. दान-पुण्य अवश्य करें – अन्न, वस्त्र, तिल या धातु का दान शुभ है। 4. नए कार्य, निवेश या बड़े निर्णय टालें। भले ही यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, पर ज्योतिषीय दृष्टि से यह आत्मावलोकन, संयम और सावधानी बरतने का समय है। पूर्वजों की स्मृति और दान-पुण्य से नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सकता है।
सूर्य ग्रहण 2025 : मंदिरों पर क्या होगा असर, कपाट कब खुलेंगे?
21–22 सितम्बर की रात लगने वाला यह सूर्य ग्रहण भारत में प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देगा। खगोलीय गणना के अनुसार ग्रहण रात 10:59 बजे से 3:23 बजे तक रहेगा।
सूतक काल : परम्परा के अनुसार ग्रहण दिखने वाले स्थानों पर सूतक काल मान्य होता है। चूँकि भारत में यह ग्रहण दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहाँ सूतक काल लागू नहीं होगा। इसका सीधा मतलब है कि धार्मिक दृष्टि से मंदिरों में कोई विशेष बाध्यता नहीं होगी।
मंदिरों का कपाट : ग्रहण का समय रात में है, जब अधिकांश मंदिर पहले से ही नित्य नियम के अनुसार बंद हो जाते हैं। इसलिए ग्रहण के लिए अलग से कपाट बंद करने की आवश्यकता नहीं है। मंदिरों के कपाट सामान्य दिनचर्या के अनुसार अगली सुबह मंगला आरती/स्नान पूजा के समय खुलेंगे। भारत में न तो सूतक काल मान्य होगा और न ही मंदिरों की दिनचर्या में बदलाव होगा। मंदिर रात को सामान्य समय पर बंद होंगे और सुबह नियमित समय पर ही खुलेंगे। भक्तगण बिना किसी संशय के प्रातःकालीन दर्शन कर सकेंगे।
डिस्क्लेमर (Disclaimer) :इस समाचार में दी गई जानकारी विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय परंपराओं और खगोलीय गणनाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों को सामान्य जानकारी प्रदान करना है। यहाँ दिए गए विचार किसी भी प्रकार से अंधविश्वास को बढ़ावा देने या वैज्ञानिक तथ्यों को नकारने के लिए नहीं हैं। ग्रहण एक प्राकृतिक खगोलीय घटना है, जिसका वैज्ञानिक अध्ययन महत्वपूर्ण है। पाठक अपनी व्यक्तिगत आस्था, परंपरा और विवेक के अनुसार इसका पालन करें। स्वास्थ्य या गर्भावस्था से संबंधित किसी भी प्रश्न के लिए चिकित्सक से परामर्श करना आवश्यक है।
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