सर्वपितृ अमावस्या 2025 : पितृ तर्पण और श्राद्ध से खुलता है समृद्धि का मार्ग
गरुड़ पुराण, महाभारत और पद्म पुराण में वर्णित है पितरों की तृप्ति का महात्म्य, अमावस्या पर श्राद्ध से मिलता है करोड़ों गुना फल .जानें पिंडदान और तर्पण का शुभ समय, कब करें पितरों का स्मरण
वाराणसी। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद या आश्विन मास की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या या महालय अमावस्या कहा जाता है। इसे पितृपक्ष का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि पितृपक्ष के पंद्रह दिनों तक पितर अपने वंशजों से तर्पण और श्राद्ध की प्रतीक्षा करते हैं और अमावस्या के दिन वापस अपने लोक लौट जाते हैं। इसीलिए इस दिन जो भी संतान विधिपूर्वक श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करती है, उसे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसका जीवन समृद्धि और शांति से भर उठता है। कहा जाता है कि जिन लोगों को अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, वे भी सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करके अपने सभी पूर्वजों को तृप्त कर सकते हैं। यही कारण है कि इस दिन लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना, नर्मदा, सरस्वती और अन्य पवित्र नदियों के तटों पर स्नान, पिंडदान और तर्पण करने जुटते हैं।
ग्रंथों में श्राद्ध और अमावस्या का महत्व
गरुड़ पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि – “पितरों की कृपा से देवता प्रसन्न होते हैं और देवताओं की कृपा से मनुष्य के सभी कार्य सिद्ध होते हैं।” यानी पितरों की तृप्ति देवताओं की प्रसन्नता का कारण बनती है और इससे जीवन में सफलता और समृद्धि आती है।
महाभारत (अनुशासन पर्व) में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध का महत्व समझाते हुए कहा – “जो व्यक्ति श्रद्धा और विधिपूर्वक एक बार भी श्राद्ध करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं।” इस श्लोक से स्पष्ट है कि श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और पापों से मुक्ति का साधन है।
मनुस्मृति (३/२०३) के अनुसार – “श्राद्ध और तर्पण से पितर तृप्त होते हैं और पितरों की तृप्ति से देवता प्रसन्न होते हैं।” यही कारण है कि इसे पितरों और देवताओं को जोड़ने वाली कड़ी माना गया है।
पद्म पुराण में तो यह तक कहा गया है कि – “अमावस्या के दिन किया गया श्राद्ध करोड़ों गुना फल देने वाला होता है।” इसका आशय है कि पूरे पितृपक्ष में यदि किसी दिन को श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ कहा जाए तो वह सर्वपितृ अमावस्या ही है।
धार्मिक मान्यता और लोक परंपरा : धर्माचार्यों के अनुसार, जो संतान पितरों का स्मरण नहीं करती या उनका श्राद्ध नहीं करती, उन्हें जीवन में अनेक बाधाओं, संतान सुख में कमी और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसे **पितृदोष** कहा गया है। सर्वपितृ अमावस्या पर विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण करने से पितृदोष शांत होता है और वंशजों के जीवन में प्रगति और शांति आती है। उत्तर भारत में इस दिन को महालय अमावस्या भी कहा जाता है और नवरात्रि की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि जब पितर तृप्त होकर लौटते हैं तो उसी क्षण से माँ दुर्गा की उपासना का श्रेष्ठ काल आरंभ होता है। काशी, गया, प्रयागराज, हरिद्वार और उज्जैन जैसे प्रमुख तीर्थों पर इस दिन लाखों लोग श्राद्ध और पिंडदान के लिए पहुँचते हैं। गया में तो ‘पिंडदान महायज्ञ’ विशेष रूप से प्रसिद्ध है। वहीं वाराणसी के दशाश्वमेध और पंचगंगा घाटों पर श्रद्धालु तिल, कुश, जल और अन्न से अपने पितरों का तर्पण करते हैं।
तर्पण के लिए आवश्यक सामग्री : कुश (दर्भा घास) – पवित्रता और पितरों को आमंत्रित करने के लिए। तिल (काले तिल विशेष रूप से) – पितरों को तृप्त करने और पाप शांति के लिए। अक्षत (अखंडित चावल)– पवित्रता का प्रतीक। जल (गंगाजल या शुद्ध जल)– आहुति और तर्पण का मुख्य आधार। पात्र (ताम्रपात्र या पीतल का लोटा)– जल व तिल मिश्रण रखने हेतु। पुष्प (विशेषकर गंधरहित सफेद फूल)– आह्वान और सम्मान हेतु। पवित्रीकरण हेतु गंध, चंदन, धूप, दीप– शुद्धिकरण के लिए। पिंडदान हेतु चावल और जौ का आटा, तिल और शहद/घी– पिंड बनाने के लिए। ब्राह्मण भोजन हेतु शाकाहारी भोजन, फल, मिठाई– दान/भोजन कराना। दक्षिणा (वस्त्र, अन्न, धन)– ब्राह्मणों व जरूरतमंदों को दान।
तर्पण की विधि :. स्नान और संकल्प, सूर्योदय से पहले स्नान करें, पवित्र वस्त्र धारण करें। कुश की अंगूठी (कुशा-वलय) बनाकर अनामिका अंगुली में धारण करें। पितरों के लिए संकल्प लें — “मम पितृप्रीत्यर्थं श्राद्धतर्पणं करिष्ये।”
आसन और दिशा :दक्षिणमुख होकर आसन पर बैठें। दक्षिण दिशा पितरों की मानी जाती है।
तर्पण प्रक्रिया :ताम्रपात्र में जल भरें, उसमें तिल और कुश डालें। दोनों हाथों से जल लेकर अंगूठे के पास से धीरे-धीरे भूमि पर अर्पण करें। प्रत्येक आहुति देते समय पितरों का स्मरण करें।
“ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः”
“ॐ मातामहभ्यः स्वधा नमः”
“ॐ कुलदेवताभ्यः स्वधा नमः”
पिंडदान के लिए आवश्यक सामग्री
कुश (दर्भा घास)– पवित्र आधार और पिंड रखने हेतु। तिल (काले तिल विशेष रूप से) – पितृ तृप्ति और पाप शांति के लिए। चावल (अक्षत/सिद्ध चावल) – पिंड का मुख्य आधार। जौ का आटा या गेहूं का आटा – पिंड को आकार देने हेतु। घी, दूध या शहद – पिंड को बंधन और तृप्ति के लिए। पुष्प (सफेद या पीले फूल) – पितरों का आह्वान करने हेतु। पात्र (ताम्र या पीतल) – पवित्रता के लिए। गंगाजल या शुद्ध जल – आहुति और शुद्धिकरण के लिए। सुगंधित द्रव्य (चंदन, अगर, कपूर) – पवित्रीकरण हेतु। ब्राह्मण भोजन सामग्री व दक्षिणा – कर्म के पूर्ण फल हेतु।
पिंडदान की विधि :स्नान और संकल्प,प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। दक्षिणमुख होकर कुशा आसन पर बैठें।संकल्प लें – “मम पितृप्रीत्यर्थं पिंडदानं करिष्ये।”
पिंड निर्माण : चावल, जौ का आटा, तिल और घी मिलाकर गोलाकार पिंड बनाएं। सामान्यतः तीन पिंड (पिता, पितामह, प्रपितामह) और तीन मातृपक्ष के लिए बनाए जाते हैं। यदि संभव हो तो सभी पितरों के लिए बारह पिंड भी बनाए जा सकते हैं।
स्थापन और अर्पण : कुश पर पिंड रखकर दक्षिण दिशा की ओर रखें। मंत्र उच्चारण के साथ पितरों का आह्वान करें : “ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः” प्रत्येक पिंड पर तिल, पुष्प और जल अर्पित करें।
पिंड विसर्जन :विधि पूरी होने के बाद पिंड को पवित्र नदी या सरोवर में प्रवाहित करें। प्रवाह के समय प्रार्थना करें : “यथासुखं पितरः स्वधाकार्यं प्रतिगृह्य तृप्ताः सन्तु।”
ब्राह्मण भोजन और दान :पिंडदान के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना और वस्त्र, अन्न, दक्षिणा दान करना अनिवार्य है। साथ ही कौए, कुत्ते, गौ और चींटियों तक को अन्न देना चाहिए।
विशेष मान्यताएँ
गया में पिंडदान – माना जाता है कि गया क्षेत्र में पिंडदान करने से पितरों को सीधे मोक्ष मिलता है। अमावस्या का दिन – विशेष रूप से सर्वपितृ अमावस्या पर किया गया पिंडदान करोड़ों गुना फलदायी है। संतानधर्म – पिंडदान को हर संतान का धर्म माना गया है। पितृदोष शांति – पिंडदान से पितृदोष समाप्त होकर जीवन में उन्नति होती है। पिंडदान केवल एक कर्मकांड नहीं है, यह पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, स्मरण और आत्मिक बंधन को जीवित रखने की परंपरा है। इससे न केवल पितरों की आत्मा को शांति मिलती है बल्कि वंशजों को भी उनके आशीर्वाद से सुख, समृद्धि और प्रगति प्राप्त होती है।
विशेष ध्यान रखने योग्य
तर्पण श्रद्धा और पवित्रता से किया जाए, तभी फल मिलता है।
अमावस्या और पितृपक्ष की तिथियाँ सबसे श्रेष्ठ मानी जाती हैं।
पवित्र नदी/घाट पर किया गया तर्पण अधिक फलदायी होता है।
यदि संभव न हो तो घर पर भी विधिपूर्वक किया जा सकता है।
जानें पिंडदान और तर्पण का शुभ समय, कब करें पितरों का स्मरण
पितृपक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या को होता है और इसी दिन लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना, सरयू, नर्मदा और अन्य पवित्र नदियों के तटों पर अपने पितरों के श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पितरों को स्मरण कर विधिपूर्वक तर्पण करने से उनका आशीर्वाद संतान को सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह रहता है कि पिंडदान और तर्पण का सही समय (शुभ मुहूर्त)क्या है?
शास्त्रों का निर्देश
गरुड़ पुराण और धर्मसिंधु में स्पष्ट लिखा है कि श्राद्ध और तर्पण का कार्य दिन में ही किया जाना चाहिए, रात्रि या संध्या के समय किया गया तर्पण निष्फल होता है।
ब्राह्ममुहूर्त से सूर्योदय तक – स्नान, संकल्प और तैयारी का समय।
सूर्योदय के बाद से दोपहर 12 बजे तक – तर्पण और पिंडदान का सर्वश्रेष्ठ समय।
मध्याह्न (12 से 1 बजे तक) – वैकल्पिक समय, यदि पूर्वाह्न में संभव न हो।
अपराह्न के बाद – शास्त्रों में वर्जित, इसे अशुभ माना गया है।
महाभारत (अनुशासन पर्व) में भी कहा गया है कि – “यः सूर्ये समुत्थाने श्राद्धं कुर्यात्समन्वितः। पितरस्तृप्यन्ति तेनैव सात्त्विकेनैव कर्मणा॥” अर्थात: जो व्यक्ति सूर्य के उदय होने के बाद और मध्याह्न से पहले श्राद्ध करता है, पितर उसी से तृप्त होते हैं।
व्यावहारिक परंपरा : गया, काशी और प्रयागराज में हजारों लोग सूर्योदय के साथ ही घाटों पर एकत्र हो जाते हैं। पंडे-पुजारी और धर्माचार्य भी श्रद्धालुओं को सुबह 6 बजे से लेकर 11 बजे तक ही तर्पण कराने का परामर्श देते हैं। इसके बाद दान और ब्राह्मण भोजन की परंपरा निभाई जाती है।
विशेष अमावस्या मुहूर्त : ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि अमावस्या तिथि के मध्यकाल (मध्याह्न) में किया गया तर्पण और पिंडदान सर्वश्रेष्ठ होता है। यदि अमावस्या तिथि सूर्योदय पर विद्यमान हो तो वह दिन पूर्ण फलदायी माना जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या 2025 पर पितरों की तृप्ति के लिए पिंडदान और तर्पण सूर्योदय के बाद से मध्याह्न तक ही करना चाहिए। यही समय शास्त्रसम्मत और फलप्रद है। देर शाम या रात में किया गया तर्पण निरर्थक बताया गया है। धर्माचार्यों का मत है कि – “पितरों का आशीर्वाद तभी मिलता है जब श्रद्धा, पवित्रता और शास्त्रानुसार समय का पालन किया जाए।”
धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों का सार यही बताता है कि पितरों का स्मरण और तर्पण केवल परंपरा भर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और पारिवारिक संतुलन का आधार है। सर्वपितृ अमावस्या इस स्मरण का अंतिम और सर्वोच्च दिन है, जब एक ही अनुष्ठान से सभी पितरों को संतुष्ट किया जा सकता है। यही कारण है कि इसे श्राद्ध पर्व का सबसे पावन दिन कहा गया है।तर्पण को केवल कर्मकांड न मानकर पितरों के प्रति कृतज्ञता और स्मरण की संतानधर्म की संजीवनी मानना चाहिए।
डिस्क्लेमर : यह समाचार/लेख धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों, लोक परंपराओं और सामान्य मान्यताओं पर आधारित है। पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध की विधि एवं समय अलग-अलग परंपराओं, और परिवारों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। इस लेख का उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी उपलब्ध कराना है। पाठकों से निवेदन है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, तिथि या मुहूर्त से संबंधित निर्णय लेने से पहले अपने परिवार के ज्योतिषाचार्य, पुरोहित या धर्मगुरु से परामर्श अवश्य लें।
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