
सुप्रीम कोर्ट ने आर जी कर कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल की याचिका की खारिज
डॉक्टर से दुष्कर्म व हत्या मामले में ममता अविलंब इस्तीफा दें : पात्रा
नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने कोलकता के आर जी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष की जनहित याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी।मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि संभावित आरोपी जैव-चिकित्सा अपशिष्ट के निपटान में भ्रष्टाचार की जांच के लिए जनहित याचिका के जरिए अधिकार का दावा नहीं कर सकता।पीठ ने कहा कि दुष्कर्म-हत्या और भ्रष्टाचार दोनों मामलों की जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) कर रही है। पीठ ने जांच की स्थिति से अवगत कराने का निर्देश देते हुए कहा, “सीबीआई हमें स्थिति विवरण दे।
“याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अगस्त में एक पीजी डॉक्टर के साथ कथित दुष्कर्म और हत्या के बाद विवाद का केंद्र बने मेडिकल कालेज में कथित वित्तीय अनियमितताओं की सीबीआई से जांच का आदेश देने से पहले उनकी बात नहीं सुनी।पीठ के समक्ष आरोपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि दोनों मामलों की अलग-अलग जांच होनी चाहिए।याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उच्च न्यायालय ने अस्पताल में दुष्कर्म की घटना को भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए अनावश्यक रूप से और बिना किसी आधार और तथ्य के टिप्पणी की।इस पर सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने दलील दी कि एक आरोपी जांच की दिशा तय नहीं कर सकता।
शीर्ष अदालत ने उनकी दलीलों से सहमति जताई और कहा कि वह (अदालत भी) जांच की दिशा तय नहीं कर सकती।मेडिकल कॉलेज के विवादित पूर्व प्रिंसिपल पर वित्तीय और प्रशासनिक कदाचार तथा नौ अगस्त को मेडिकल छात्रा के साथ दुष्कर्म और हत्या मामले में गलत तरीके से पेश आने के गंभीर आरोप हैं।उच्च न्यायालय ने 23 अगस्त को अपने एक आदेश में प्रो.घोष के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की सीबीआई जांच का निर्देश दिया था।अदालत ने सीबीआई जांच का निर्देश देते हुए कहा था कि प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि घोष द्वारा गंभीर उल्लंघन और अनियमितताएं की गई हैं।शीर्ष अदालत ने इससे पहले 31 वर्षीय प्रशिक्षु पीजी डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या की क्रूर और भयावह घटना का स्वत: संज्ञान लिया था।
अदालत ने राज्य सरकार द्वारा आर जी कर कॉलेज एवं अस्पताल से प्रो. घोष को हटाकर दूसरे कॉलेज में नियुक्त करने पर भी सवाल उठाया था, जबकि इस (कथित दुष्कर्म और हत्या) घटना के बाद देशभर में भारी आक्रोश फैल गया था।शीर्ष अदालत ने इस मामले में मुकदमा दर्ज करने में देरी और पीड़िता की अप्राकृतिक मौत के लिए प्रविष्टियों के समय में विसंगतियों की भी आलोचना की थी। सीबीआई ने इस अदालत में दाखिल अपनी स्थिति विवरण में कहा कि आर जी कर मेडिकल एवं कॉलेज अस्पताल में अपराध स्थल को बदल दिया गया था।शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि राज्य पुलिस ने मृतका के माता-पिता से कहा था कि यह आत्महत्या है, लेकिन बाद में कहा कि यह हत्या है।शीर्ष अदालत की इस पीठ ने तब यह भी सवाल उठाया था कि 14 अगस्त को अस्पताल परिसर पर हमला करने वाली करीब सात हजार लोगों की भीड़ के बारे में पुलिस को कैसे पता नहीं था।
डॉक्टर से दुष्कर्म व हत्या मामले में ममता अविलंब इस्तीफा दें : पात्रा
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं लोकसभा सांसद डॉ संबित पात्रा ने शुक्रवार को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में प्रशिक्षु महिला डॉक्टर से दुष्कर्म और हत्या के मुद्दे पर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कोलकात के पुलिस आयुक्त पर तीखा हमला बोला और सुश्री बनर्जी से इस्तीफे की मांग की।डॉ. पात्रा ने पार्टी कार्यालय में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा,“पीड़िता के पिता ने अपनी पुत्री की बर्बरतापूर्ण हत्या और दुष्कर्म मामले में घटनाक्रम बताते हुए कुछ सवाल उठाए हैं, जिसका जवाब नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा सहित पूरे देश की जनता सुश्री बनर्जी से उन सवालों को पूछ रही है और उनसे जवाब की उम्मीद कर रही है।
”उन्होंने कहा,“पीड़िता के पिता कहते हैं कि जब मेरी पुत्री का शव हमारे घर में रखी हुई थी, तब उस समय पुलिस उपायुक्त उत्तर ने मुझे एक कोने में बुलाकर कुछ पैसे देने की कोशिश की। मैंने पैसे लेने से इनकार कर दिया और कहा कि मुझे पैसे नहीं चाहिए। जरा उस वक्त पीड़ित की मानसिक हालत के बारे में सोचिए कि उन पर क्या गुजर रही होगी, जब ऐसे बर्बरतपूर्ण हत्या के शिकार हुई, उनकी पुत्री का शव घर में था। उस वक्त वे अपने आपका मानसिक रूप से समझा भी नहीं पा रहे होंगे कि उनकी पुत्री के साथ क्या हुआ है। ऐसी परिस्थिति में एक प्रशासक उन्हें पैसा देने की कोशिश करता है। जरा सोचिए कि कोई आदमी भ्रष्ट कब बनता है जब किसी का मुहं बंद करने की कोशिश की जाती है या किसी चीज को छुपाने की कोशिश की जाती है। या यह होता है कि हम आपको पैसा दे रहे हैं, इसके बदले में कुछ बोलो मत। ऐसा क्या था कि सुश्री ममता की सरकार ने पीड़िता के पिता को पैसा देने के लिए डीसीपी को भेजा था? ऐसा क्या था कि सुश्री ममता की सरकार ने डीसीपी को भेजा कि पीड़िता के माता-पिता को खरीदने की कोशिश कीजिए, जब पीड़िता का शव घर में रखा हो?
”उन्होंने कहा,“पीड़िता के पिता कहते हैं कि कोलकता पुलिस को नौ अगस्त की सुबह 10:10 बजे मालूम पड़ गया था कि उनकी पुत्री की हत्या हो चुकी है और उनकी पुत्री इस दुनिया में नहीं है। उनकी पुत्री की मृत्यु इससे काफी पहले ही हो चुका थी। पिता को सुबह 11 बजे बताया गया कि उनकी पुत्री ने आत्महत्या कर ली है। जब हम अस्पताल पहुंचते हैं, तो जहां उनकी पुत्री की बर्बरतापूर्ण हत्या हुई थी और वहां उसका शव था, उस कमरे के बाहर हमें 3:30 घंटे इंतजार करया गया, लेकिन पुलिस ने पिता को उनकी पुत्री को देखने नहीं दिया, जबकि कई लोग उस कमरे में जा रहे थे और आ रहे थे। जरा सोच कर देखिए कि पीड़िता के माता-पिता के साथ उस समय क्या गुजर रही होगी, जब उनको पता है कि उनके पुत्री का शव कमरे के अंदर है, किंतु वे अंदर जाकर उसे देख नहीं सकते हैं। पीड़िता के पिता यह भी कहते हैं कि उन्हें बार-बार कहा जा रहा था कि कमरे के बाहर खड़े नहीं हो, प्राचार्य के कमरे में जाकर बैठे। वह प्राचार्य संदीप घोष जो आज गिरफ्तार है। पिता ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि हम प्राचार्य के कमरे में नहीं जाएंगे, बल्कि इसी कमरे के बाहर इंतजार करेंगे।
पीड़िता के पिता कहते हैं कि 3:30 घंटें इंतजार के बाद कुछ मिनटों के लिए मुझे क्राइम स्थल वाले सेमिनार हाल के अंदर बुलाया गया। पीड़िता के माता-पिता को प्राचार्य के कमरे में भेजकर उस एरिया को खाली करा कर पश्चिम बंगाल के प्रशासन एवं कोलकाता पुलिस ऐसा क्या करना चाहती थी?”उन्होंने कहा,“पीड़िता के पिता कहते हैं कि कोलकाता पुलिस द्वारा एक सादा कागज पर उन्हें हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया और उन्होंने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। घटना स्थल पर पीड़िता का शव पड़ा था और 3:30 घंटे से इंतजार कर रहे थे। उस परिस्थिति में पुलिस द्वारा पीड़िता के पिता से एक सादे कागज पर हस्ताक्षर करना चाहती थी, ऐसा क्यों? 21 वीं सदी में पढ़े-लिखे पीड़िता के पिता से ऐसा करने के लिए कहा जा रहा था। मान लीजिए पढ़े-लिखे लोग नहीं हो, तब भी जागरूक संसार में ऐसा करना उचित है क्या? आखिर पश्चिम बंगाल के प्रशासन और कोलकाता पुलिस उस सादा कागज पर क्या लिखना चाहती थी कि पिता मानते हैं कि उनकी बेटी ने आत्महत्या की है, इस मामले में किसी प्रकार से रेप और मर्डर नहीं हुआ है? सादा कागज पर तभी हस्ताक्षर कराते हैं जब आपके मन में खोट है या आपके मन में चोर है।
”भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि पीड़िता के पिता तीसरा प्रश्न पूछते हैं- पीड़ित पिता कहते हैं कि इस घटना में शव का पोस्टमार्ट करने में देरी क्यों हुई? पीड़िता के पिता ने टाईम लाइन दिया है। उन्होंने कहा कि जिस ढंग से काम चल रहा था, उसके अनुसार कोलकाता पुलिस देर भी करती, तब भी शाम पांच बजे तक पोस्टमार्ट हो जाना चाहिए था। लेकिन पोस्टमार्टम उसके बाद होता है। पीड़िता के पिता जी पूछते हैं कि आखिर ऐसा क्या कारण था कि पोस्टमार्टम करने वाले अस्पताल ने एफआईआर नहीं किया? अंत में थकहार कर हम शाम 6:30 और सात बजे के बीच पुलिस में शिकायत दर्ज कराना पड़ा। पीड़िता के माता-पिता पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हैं कि,“हमारी बेटी अब रही नहीं, उसके साथ बहुत ही गलत होने की अंशका है।” उसके बाद कोलकाता पुलिस रात के 11-45 बजे इस मामले की एफआईआर दर्ज करती है। पुलिस को सुबह 10 बजे पीड़िता का शव मिलता है और रात्रि में 11-45 बजे एफआईआर दर्ज होती है। जबकि वहां उस कॉलेज एंड हॉस्पीटल के सारे मेडिकल छात्र थे और हंगामा मचा हुआ था। मेडिकल छात्र सबकुछ जानते हैं कि रेप और मर्डर क्या होता है, रेप और होमीसाइड क्या होता है। इन सबके बावजूद पश्चिम बंगाल की पुलिस ने एफआईआर में मौत के कारण बताते हुए अप्राकृति मौत लिखा है। पश्चिम बंगाल की पुलिस ने बर्बरतापूर्ण हत्या में होमीसाइड या मर्डर नहीं लिखा है। सिर्फ अप्राकृतिक मौत लिखा है मानो किसी कारण से मौत हो गयी है।
डॉ. पात्रा ने कहा,“पीड़िता के पिता कहते हैं कि पुलिस द्वारा दबाव डालकर जल्दी से जल्दी उनकी पुत्री का शव दाह संस्कार स्थल पर लाया जाता है। पीड़िता के पिता मानसिक अघात की वजह से अपनी प्यारी बेटी का शव कुछ और समय तक घर पर रखना चाहते थे कि उनके रिश्तेदार, मित्र और परिचित आकर उनके पुत्री से अंतिम बार मिल सके, लेकिन कोलकाता पुलिस ने ऐसा करने नहीं दिया और ताला पुलिस स्टेशन के 300 से 400 जवान निरंतर उनके घेरे हुए था। जरा सोचिए कि माता-पिता के कंधे पर अपने जवान पुत्र के शव का बोझ था, किसी भी समाज में उससे भारी बोझ कुछ नहीं होता है। उनकी जवान पुत्र के साथ क्या हुआ है उसका ट्रामा और उसके अलावा निरंतर 400 पुलिस द्वारा उन्हें घेरे रहना। पीड़िता के पिता कहते हैं कि पुलिस द्वारा जल्दी से दाह संस्कार करने का दबाव डाला गया और हमारे पास और कोई विकल्प नहीं था। पश्चिम बंगाल की पुलिस ने ऐसा क्यों किया?
उन्होंने कहा कि पीड़िता के पिता कहते हैं कि पीड़िता के लगभग 15 रिश्तेदार अस्पताल में आ चुके थे, जहां पीड़िता के साथ जघन्य अपराध हुआ था। रिश्तेदारों की मौजूदगी में पीड़िता के माता-पिता को कार में बिठाकर एम्बुलेंस के आगे ले जाया गया। रिश्तेदारों की इच्छा थी कि वे एम्बुलेंस में बैठकर अपने प्यारी बिटिया के साथ जाए। उस समय पुलिस ने तुरंत एम्बुलेंस के दरवाजा बंद कर दिया और कहा कि आप लोग शव के साथ नहीं जा सकते हैं, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय पार्षद ने पीड़िता का स्थानीय अभिभावक घोषित कर दिया है और वो एम्बुलेंस में बैठ गया है। यह समझ से परे की बात है कि जहां 15 रिश्तेदार और माता-पिता हो, वहां कोई अनजान व्यक्ति खुद को अभिभावक कैसे घोषित कर सकता है? तृणमूल का वार्ड पार्षद खुद को कैसे लोकल गार्डियन घोषित कर सकता है? सवाल उठता है कि टीएमसी का काउंसिलर खुद लोकल गार्डियन बनकर एम्बुलेंस में बैठ गया और एम्बुलेंस के अंदर क्या किया? क्या टीएमसी का वह काउंसिलर एम्बुलेंस में बैठकर साक्ष्य एवं सबूतों को मिटाने में लगा हुआ था? सवाल उठता है कि पुलिस ने उस अफरा तफरी में उनके रिश्तेदारों को एम्बुलेंस में बैठकर जाने क्यों नहीं दी? पुलिस ने बिना देर किए एम्बुलेंस का दरवाजा बंद क्यों कर दिया? पुलिस ने जल्दी से जल्दी वहां से एम्बुलेंस को क्यों भगाया?
”उन्होंने कहा कि पीड़िता के पिता एक महत्वपूर्ण सवाल पूछते हैं कि जब दाह संस्कार चल रहा था, तब तृणमूल के विधायक निरंतर वहां मौजूद रहे और उनके साथ दो तृणमूल के पार्षद भी मौजूद रहे। वे लोग पुलिस अधिकारियों से यहां वहां बातचीत करते और निर्देष देते नजर आए। क्यों तृणमूल विधाय और पार्षद दाह संस्कार के दौरान मौजूद रहे और अधिकारियों को निर्देश दे रहे थे? भाजपा ने पीड़िता के अंतिम दाह संस्कार का राजनीतिकरण कर दिया गया, ऐसा क्यों किया गया?भाजपा नेता ने कहा,“पीड़िता के पिता ने भावनापूर्ण एक सवाल पूछा कि दाह संस्कार स्थल पर उनसे शुल्क भी नहीं लिया गया, बल्कि किसी अनजान अधिकारी या राजनेता या कोई अन्य आदमी ने उस शुल्क की राशि जमा करा दी थी। उनकी पुत्री स्वर्ग से क्या सोच रही होगी कि मेरे पिता ने मेरे अंतिम दाह संस्कार की राशि भी जमा नहीं करायी।
पिता पूछते हैं कि इस तरह से बार-बार मुझे पैसा देने की कोशिश क्यों की जा रही थी?”उन्होंने कहा कि पीड़िता के पिता कहते हैं कि कोलकाता डीसीपी सेंटल इंदिरा मुखर्जी समेत अन्य आईपीएस अफसर प्रेस कांफ्रेंस करके झूठे तथ्य मीडिया के सामने रख रहे है वहा सरासर झूठे तथ्य हैं। इसलिए उन झूठे तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया जाए। एक वीडियो पहले दिखाया जा रहा था कि पीड़िता के पिता कह रहे हैं कि किसी ने उन्हें पैसा देने की कोशिश नहीं की। पीड़िता के पिता ने उस वीडियो की सच्चाई का खुलासा किया है कि जब उनकी बिटिया की नृशंस और बर्बरतापूर्ण हत्या होने के पश्चात कुछ अधिकारी हमारे घर आए थे और उन्होंने कहा कि यदि आप चाहते हैं कि जांच कार्य सही तरीके से हो और त्वरित गति से जांच हो, तो इस वीडियो में वही बातें रिकार्ड करें जो हम कह रहे हैं। पीड़िता के पिता से पुलिस अधिकारी ने रिकार्ड करने को कहा कि कोलकाता पुलिस सही तरीके से जांच कर रही है और किसी अधिकारी ने पैसा देने की कोशिश नहीं की। स्वभाविक है कि पीड़िता के पिता के उपर दबाव डालकर ऐसा वीडियो रिकार्ड किया गया था।
डॉ. पात्रा ने कहा,“जब तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कोलकाता के पुलिस आयुक्त विनीत गोयल अपने पद पर बने रहेंगे तब तक इस मामले की निष्पक्ष जांच होना संभव नहीं है।”एक पत्र दिखाकर उन्होंने कहा कि आर जी कर मेडिकल कॉलेज के महिला डॉक्टर के साथ आठ और नौ अगस्त की रात में दुष्कर्म और हत्या की घटना होती है। उसके अगले दिन 10 अगस्त को कॉलेज के प्राचार्य द्वारा लोक निर्माण के इलेक्टीकल इंजीनियर को एक पत्र जारी करता है, जिसका मेमो नंबर है आरके सी-4197। इस पत्र में कहा गया कि सेमिनार हॉल से सटे डॉक्टर्स रूम, डॉक्टर्स टॉयलेट और स्टाफ टॉयलेट को तोड़कर फिर से बनाया जाए। यह वही सेमिनार हॉल है जिसमें प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ जघन्य अपराध का अंजाम देते हुए हत्या की गयी थी। अपराध स्थल सटे जगहों पर तोड़फोड़ को लेकर जब छा़त्रों, मीडिया और जनता ने सवाल उठाया था, तब सुश्री बनर्जी ने कहा था कि अस्पताल में तोड़कर फिर से बनाने का निर्णय तो पहले ही हो चुका था, इसमें इस जघन्य अपराध से कोई लेना-देना नहीं है। मगर सच्चाई यह है कि मेडिकल कॉलेज के आरोपी प्रिसिंपल ने 10 अगस्त को यह पत्र जारी की है। अर्थात दुष्कर्म और हत्या के बाद आनन-फानन में यह पत्र जारी किया गया था।
इस पत्र मे सबसे बड़ी बात है कि इस पत्र में लिखा है कि यह निर्णय 10 अगस्त की बैठक के बाद लिया गया है, जिस बैठक में पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव और पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण निदेशालय के निदेशक उपस्थित थे। उसी दिन बैठक में साइट इंस्पेक्शन के लिए निर्देश दिया जाता है और उसी दिन साइट इंस्पेक्शन भी हो जाता है। डॉ पात्रा ने सवाल उठाते हुए कहा कि पीड़िता के शव के इंस्पेक्शन में 12-12 घंटे देरी से हो रही है किन्तु साइट इंस्पेक्शन तुरंत हो जाती है। इसके बाद तुरंत नोटिस जारी कर क्राइम स्थल के बगल में सबकुछ तोड़ दिया जाता है और काम तुरंत शुरू कर दिया जाता है। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ऐसा क्यों किया जाता है? इसके अलावा इस घटना से जुडे तोड़-फोड़ के फोटो को जिन छा़त्रों और डॉक्टरों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया, तो उनलोगों के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज की गयी और धमकी दी गयी।डॉ पात्रा ने सुश्री बनर्जी से सवाल किया कि स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को कौन आदेश दे सकता है? प्रधान सचिव को प्रदेश के मुख्यमंत्री ही आदेश दे सकता है।(वार्ता)



