
नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश आयुष विभाग के विभिन्न पाठ्यक्रमों के नामांकन में कथित अनियमितता और घोटाले की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर सोमवार को रोक लगा दी।न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनोज कुमार मिश्रा की पीठ ने राज्य सरकार का पक्ष रख रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज की दलीलें सुनने के बाद पिछले महीने पारित उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के (सीबीआई जांच करने संबंधी) आदेश पर रोक लगा दी।
उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पूर्व आयुष मंत्री धरम सिंह सैनी, आयुष विभाग के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव प्रशांत त्रिवेदी और अन्य के खिलाफ 2019 में आयुष के विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश में कथित अनियमितता और रिश्वत लेने के आरोपों की जांच करने का निर्देश सीबीआई को दिया गया था।शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान यह पूछा कि क्या इस मुद्दे पर राज्य सरकार की बात सुनी गई है कि उसे बड़े घोटाले में सीबीआई को शामिल करने से क्यों बचना चाहिए। अपना पक्ष रखते हुए राज्य के वकील ने कहा कि ऐसा केवल दुर्लभ मामले में ही किया जा सकता है, अग्रिम जमानत के मामले में नहीं।
श्री नटराज ने पीठ के समक्ष कहा कि उच्च न्यायालय इस तरह की जांच का आदेश देने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्ति का उपयोग नहीं कर सकता था। उन्होंने ने यह भी कहा कि राज्य सरकार फिलहाल उच्च न्यायालय के जमानत देने के आदेश को चुनौती नहीं दे रही है।उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने मई में आरोपी डॉ. रितु गर्ग की जमानत याचिका मंजूर की थी। साथ ही सीबीआई से मामला दर्ज कर जांच करने के बाद एक अगस्त तक इस मामले में स्थिति रिपोर्ट पेश करने को कहा था।
उच्च न्यायालय ने तब आयुर्वेद निदेशालय के प्रभारी अधिकारी डॉ. उमाकांत सिंह के बयान पर गौर किया था। डॉ. सिंह ने पुलिस के समक्ष बयान दिया था कि पूर्व मंत्री, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी त्रिवेदी और आयुष विभाग के अन्य प्रमुख अधिकारियों के बीच रिश्वत कैसे दी गई थी। (वार्ता)



