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दो सभ्यताओं के महाविनाशकारी महायुद्ध की दहलीज पर खड़े हैं हम!

अभिरंजन कुमार

दुनिया में दो तरह की सभ्यताएं साथ-साथ विकसित हो रही हैं और उनके बीच का टकराव भी परिलक्षित होने लगा है।

पहली सभ्यता विश्व और मनुष्य के समग्र विकास के बारे में सोचती है। सोचती है कि लोगों का जीवन बेहतर हो। धरती को ही वह जन्नत बनाना चाहती है। विज्ञान, तकनीक, खोज, अनुसंधान इत्यादि में उसे मनुष्य की बेहतरी दिखाई देती है। धर्म को वह निजी मामले की तरह देखती है और हर मनुष्य के लिए अभिव्यक्ति और विचारों की आज़ादी सुनिश्चित करते हुए सबको सम्मानजनक जीवन जीने की स्वतंत्रता प्रदान करना चाहती है। सदियों के मंथन के बाद धीरे धीरे उसने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को कमोबेश अपना लिया है।

जबकि दूसरी सभ्यता लोगों के विकास के बारे में कम, उसकी संख्या बढ़ाने के बारे में अधिक सोचती है, ताकि विशाल जनसंख्या के दम पर धीरे-धीरे वह पहली सभ्यता का विनाश करती जाए और उसके द्वारा तैयार किये गये संसाधनों पर कब्जा करते हुए धीरे धीरे समूची धरती पर कब्जा कर ले, इसके बावजूद कि जन्नत की उसकी कल्पना में यह धरती नहीं, बल्कि इससे बाहर कोई और काल्पनिक दुनिया है, जो जीते हुए नहीं, बल्कि मरने के बाद प्राप्त होती है। इसलिए मरने के बाद उस काल्पनिक दुनिया को प्राप्त करने के लिए इस वास्तविक दुनिया में वह न स्वयं चैन से जीती है, न दूसरों को चैन से जीने देना चाहती है। धर्म उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। जो उसके धर्म को नहीं मानते, उन लोगों के लिए उसके मन में क्रूरता भरी है। यहाँ तक कि अगर उसके अपने बीच भी कोई अलग राय या विचार है, तो उसका व्यवहार उसके प्रति भी समान रूप से हिंसक है। न केवल धर्मनिरपेक्षता के, बल्कि लोकतंत्र के मूल्यों को भी अब तक उसने नहीं अपनाया है। परिणामतः अभिव्यक्ति और विचारों की आज़ादी के लिए वहां निषेधाज्ञा लागू है।

इसलिए पहली सभ्यता, जिसमें दुनिया के तमाम मानवतावादी लोग भी शामिल हैं, के सामने चुनौती है कि वह या तो दूसरी सभ्यता की सोच बदले और उसके दिमागों का गैर-विषाक्तिकरण करे या फिर उसपर अंकुश लगाए और उसे बढ़ने से रोके, अन्यथा दूसरी सभ्यता धीरे धीरे उसका संहार करती जाएगी। जो लोग पहले, दूसरे विश्व युद्ध की कहानियों से ही सिहर जाते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि इस विनाश-लीला में छिटपुट तरीके से इन तमाम विश्व-युद्धों से कई गुणा अधिक मनुष्य मारे जाने वाले हैं और यह केवल कुछ वर्षों या दशकों तक नहीं, बल्कि कई सदियों में व्याप्त रहने वाली है।

इस विनाश-लीला की प्रकृति महज एक युद्ध जैसी नहीं, बल्कि अनेक छोटे बड़े युद्धों की एक शृंखला जैसी हो सकती है। इसलिए जब तक यह लोगों, समाजों और देशों के द्वार तक नहीं पहुंच जाएगी, तब तक वे सोचते रह सकते हैं कि यह काल्पनिक है और उनके दरवाज़े तक नहीं पहुंच सकती, इसलिए इसके खिलाफ विश्व युद्धों जैसी लामबंदी शायद तभी देखने को मिले, जब बहुत सारे देशों और समाजों का बहुत कुछ बर्बाद हो चुका होगा। अगर इसे दो सभ्यताओं के महायुद्ध की संज्ञा दी जाए, तो यह पहले से ही चला आ रहा है, लेकिन या तो ज़्यादातर लोगों को अभी इसका अहसास नहीं है या अहसास है भी तो बहुत कम। पर जैसे-जैसे इस महायुद्ध का स्केल बढ़ता जाएगा, लोगों को बड़े पैमाने पर इसका अहसास होना शुरू हो जाएगा।

यह विश्व निरंतर एक युद्ध में है। छोटे-छोटे युद्ध घर-परिवार से ही शुरू हो जाते हैं। बड़े-बड़े युद्ध कुछ देशों और उनके समूहों के बीच होते हैं। दुनिया से युद्ध को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता। यह हमेशा से चलता रहा है और हमेशा चलता रहेगा। साथ ही दुनिया के शान्तिकामी लोग हमेशा इसके बारे में आगाह करते रहेंगे और इससे बचने का मॉडल पेश करते रहेंगे। दुनिया अपनी शांति में ही खूबसूरत है। युद्ध मानवता की हत्या के लिए भी संभव है और मानवता की रक्षा के लिए भी सम्भव है, लेकिन युद्ध चाहे जिस भी मकसद से हो, उसमें मनुष्य अनिवार्य रूप से मारे जाएंगे और किसी न किसी मात्रा में मानवता को क्षति पहुंचेगी ही।

इसलिए युद्ध से बचने के लिए सबसे पहले उसके खतरे को समझना ज़रूरी होता है। जो लोग, देश और समाज युद्ध के खतरे को समय रहते नहीं भांप सकते, वे युद्ध से कभी नहीं बच सकते। इसलिए युद्ध के खतरे की बात करना या उसके बारे में समझाना लोगों को डराना नहीं, बल्कि समय रहते आगाह करना भी हो सकता है। इसलिए लोगों को खुलकर ऐसे ख़तरों पर बात करनी चाहिए। चर्चा न करने से खतरे ख़त्म नहीं होते, बल्कि चर्चा करने से ही खत्म होते हैं। इसलिए खतरा जितना बड़ा हो, उसकी चर्चा उतने ही बड़े पैमाने पर होनी चाहिए।

जिस महायुद्ध की मैं बात कर रहा हूँ, वह आशंका नहीं, हकीकत है, जिसे देखने के लिए हम इस दुनिया में रहें न रहें, लेकिन आने वाली पीढियों को इसका सामना अवश्य करना पड़ेगा। युद्ध और विनाश की कहानियों और भविष्यवाणियों से उसका सही अनुमान नहीं होता। लेकिन जिन्होंने किसी भी मात्रा में युद्ध और विनाश अपनी आँखों से देखा होगा या अपने शरीर पर या जीवन में झेला होगा, वे मनुष्यता पर आसन्न इस खतरे को लेकर अवश्य चिंतित होंगे। वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक वाल से

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