Opinion

बिहार के नवजवान: परदेस में मेहनत, घर में बेरोजगारी

बिहार के लाखों नवजवान आज भी रोजगार की तलाश में परदेस जाने को मजबूर हैं। मेहनती और प्रतिभाशाली होने के बावजूद उन्हें अपने ही राज्य में अवसर नहीं मिल पा रहा है। यह लेख बिहार की बेरोजगारी, प्रवास, राजनीति और युवाओं के संघर्ष की सच्ची तस्वीर पेश करता है।

– बिहार का युवा देश की ताकत है, पर अपने ही राज्य में वह अवसरों से वंचित है। सवाल यह नहीं कि वह परदेस क्यों जाता है, सवाल यह है कि उसे घर छोड़ने की नौबत ही क्यों आती है।

  • आशुतोष गुप्ता

बक्सर से सूरत तक, सिवान से दिल्ली तक – हर रेलगाड़ी में बिहार का कोई न कोई नौजवान सफर पर निकलता दिखता है। कंधे पर झोला, आंखों में उम्मीद और मन में एक ही ख्वाहिश – “घरवालों को संभालने के लिए कुछ कमाना है।” लेकिन यह यात्रा सिर्फ रोज़गार की नहीं, यह मजबूरी और संघर्ष की यात्रा है। बिहार का युवा परिश्रम और प्रतिभा दोनों में अव्वल है, पर अवसर न होने के कारण उसे परदेस की धूल में अपना भविष्य तलाशना पड़ता है। वह देश का निर्माण करता है — सड़क बनाता है, मेट्रो खड़ी करता है, शहरों को रोशन करता है – पर उसका अपना गाँव अब भी अंधेरे में है।

बिहार भारत का वह राज्य है जो इतिहास, ज्ञान और संस्कृति की धरती रहा है। बुद्ध से लेकर जयप्रकाश नारायण तक – इस मिट्टी ने हमेशा देश को दिशा दी है। पर आज वही धरती सवालों में घिरी है – क्यों इस राज्य के युवाओं को अपने घर में रोजगार नहीं मिलता? हर साल लाखों युवा बिहार से बाहर निकलते हैं। कोई सूरत की मिलों में काम करता है, कोई पंजाब के खेतों में, कोई दिल्ली-मुंबई की निर्माण साइट पर। कई डॉक्टर, इंजीनियर, IAS अधिकारी भी बिहार से निकलते हैं – लेकिन वे लौटकर अपनी धरती पर नहीं रह पाते। यह विरोधाभास बिहार के विकास की सबसे बड़ी विडंबना है।

शिक्षा में प्रगति, पर अवसरों में पिछड़ापन

बिहार ने शिक्षा में असाधारण सुधार देखा है। हर शहर में कोचिंग संस्थान हैं, हर गांव में विद्यार्थी मेहनत कर रहे हैं। लेकिन यह शिक्षा अपने राज्य में रोज़गार नहीं बन पाती। सरकारी नौकरियों की प्रक्रिया धीमी और अनिश्चित है। प्राइवेट सेक्टर का अस्तित्व लगभग न के बराबर है। छोटे उद्योग या स्टार्टअप के लिए पर्याप्त आधारभूत ढांचा नहीं है। नतीजा – लाखों डिग्रियाँ दीवार पर टंगी रह जाती हैं, और युवा अपने सपनों के साथ परदेस चला जाता है। यह केवल आर्थिक नहीं, भावनात्मक पलायन है।

राजनीति और बेरोजगारी का गठजोड़

हर चुनाव में बिहार के नेता रोजगार और विकास का वादा करते हैं। हर बजट में उद्योग लगाने की बात होती है, हर मंच से नए अवसरों की घोषणा होती है। लेकिन ज़मीन पर स्थिति जस की तस है। बिजली, सड़क, शिक्षा में सुधार हुआ है – पर औद्योगिक निवेश अब भी नहीं के बराबर है। बिहार में न तो बड़े उद्योग हैं, न आईटी पार्क, न मैन्युफैक्चरिंग यूनिट। नतीजा — लाखों युवाओं की ऊर्जा या तो कोचिंग गलियों में सिमट जाती है, या दूसरे राज्यों के कारखानों में खर्च हो जाती है।

परदेस में सम्मान, घर में संघर्ष

बिहार का युवा परदेस में मेहनती कहलाता है। वह दिल्ली की मेट्रो बनाता है, मुंबई में टैक्सी चलाता है, सूरत में कपड़ा उद्योग में काम करता है। उसकी मेहनत देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करती है। लेकिन जब वही नौजवान घर लौटता है, तो बेरोजगार कहलाता है। उसकी पहचान ‘मजदूर’ बन गई है, जबकि असल में वह ‘निर्माता’ है। यह सम्मान और अवसर के बीच का सबसे बड़ा अन्याय है।

महिलाओं की चुप्पी में छिपा साहस

जब पुरुष परदेस जाता है, तो घर की जिम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है। बिहार की लाखों महिलाएं अब खेती, परिवार और बच्चों की पढ़ाई – सब संभालती हैं। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से वे आज आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर हो रही हैं। यह बदलाव बताता है कि अगर बिहार को अवसर मिले, तो उसकी बेटियां भी चमत्कार कर सकती हैं।

बदलाव की उम्मीद: डिजिटल और नई सोच का बिहार

आज बिहार का युवा केवल मजदूर नहीं, डिजिटल नागरिक भी है। वह मोबाइल से काम करता है, ऑनलाइन पढ़ाई करता है, डिजिटल मार्केटिंग, डिजाइनिंग, कंटेंट क्रिएशन में कदम बढ़ा चुका है। अब वह केवल नौकरी नहीं, अपना काम चाहता है। सरकार अगर सही दिशा में समर्थन दे – उद्योग लगाये, इंटरनेट और बिजली सुदृढ़ करे, स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा दे – तो बिहार का यही युवा आने वाले दशक में पूरे देश की दिशा बदल सकता है।

आवश्यक है एक ‘रोजगार आंदोलन’

बिहार ने कई ऐतिहासिक आंदोलनों को जन्म दिया है – गांधीजी का चंपारण सत्याग्रह और जेपी का सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन – अब समय है रोजगार के आंदोलन का। बिहार का युवा अब नेता से वादा नहीं, जवाब चाहता है।
वह पूछना चाहता है – “हम परदेस क्यों जाएँ?” “हमारे गांव में उद्योग क्यों नहीं हैं?” “हमारी मेहनत का मूल्य हमारी मिट्टी में क्यों नहीं है?” यह सवाल केवल बिहार के नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य से जुड़े हैं।

बिहार उठेगा, तभी देश आगे बढ़ेगा

बिहार का युवा देश की रीढ़ है। जिसने सैकड़ों वर्षों तक मेहनत की है, वह बदलाव की ताकत भी रखता है। बस उसे एक मौका चाहिए – अपने राज्य में, अपने लोगों के बीच, अपने सपनों के साथ। अब बिहार को मजदूर नहीं, निर्माता राज्य बनना होगा। जब बिहार का बेटा अपने गांव में रोजगार पाएगा, तब सचमुच भारत आत्मनिर्भर बनेगा। “बिहार का भविष्य तब बदलेगा जब बिहार का युवा अपने गांव में काम करेगा – और अपने ही राज्य की मिट्टी से देश की दिशा तय करेगा।”

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। इनसे पोर्टल या संपादकीय टीम की सहमति आवश्यक नहीं है।

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