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रिसर्चः अब क्यूआर कोड और लोगो बताएगा असली हैंडलूम बनारसी साड़ियों की पहचान

- हथकरघा उद्योग में साड़ियों पर क्यूआर कोड और लोगो का उपयोग करके विश्वास-निर्माण के उपायों के लिए आईआईटी (बीएचयू) और अंगिका सहकारी समिति द्वारा एक रिसर्च कार्य

वाराणसी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, काशी हिंदू विश्वविद्यालय (आईआईटी-बीएचयू) के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग (औद्योगिक प्रबंधन) की एक शोध टीम ने हथकरघा साड़ी में एक नई तकनीक बनाई है जिसमें इनबिल्ट है (1) साड़ी का विवरण युक्त बुना हुआ क्यूआर कोड, (2) हथकरघा चिह्न लोगो (3) रेशम चिह्न, और (4) बनारस भौगोलिक संकेत (जीआई) लोगो। आईआईटी(बीएचयू) के शोधकर्ताओं के अनुसार, साड़ी में इनबिल्ट वीविंग लोगो हस्तनिर्मित हथकरघा साड़ी की शुद्धता को प्रमाणित करेगा। यह ग्राहकों को सही हथकरघा साड़ी चुनने और हथकरघा और उसके उत्पादों के दुरुपयोग को रोकने के लिए विश्वास दिलाएगा।

डॉ. प्रभाष भारद्वाज, प्रोफेसर, मैकेनिकल इंजीनियरिंग ने बताया कि वाराणसी हथकरघा उद्योग को आधुनिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। वर्तमान समय में अधिकांश ग्राहकों के पास मोबाइल फोन है। डिजिटल इंडिया अभियान की शुरुआत के साथ, लोगों को तकनीक की अधिक आदत हो रही है। वाराणसी में मेरे शोधार्थी द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, इस उद्योग में आईटी आधारित अनुप्रयोगों को शामिल करने की बहुत संभावनाएं हैं। वर्तमान में, हमारी शोध टीम ने क्यूआर कोड तकनीक और साड़ी पर लोगो बुनाई की तकनीक तैयार की है। साड़ी निर्माता अपनी फर्म और निर्माण के विवरण के साथ साड़ी पर क्यूआर कोड बुन सकता है। जब भी ग्राहक किसी उत्पाद के बारे में जानना चाहता है तो उसे अपने मोबाइल में स्कैनर का उपयोग करना होता है। वह क्यूआर कोड में सभी विवरण दर्ज करवाएगा, जैसे निर्माता का स्थान, निर्माण की तारीख आदि। इन उपायों से ग्राहकों में विश्वास पैदा होगा और बिक्री में वृद्धि होगी।

बनारस हथकरघा उद्योग के विकास पर काम कर रहे मैकेनिकल इंजीनियरिंग के रिसर्च स्कॉलर श्री एम. कृष्ण प्रसन्ना नाइक ने बताया कि बनारस हैंडलूम उद्योग कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसमें मार्केटिंग प्रमुख है। उनके अध्ययन के अनुसार, अधिकांश ग्राहकों को हथकरघा और पावरलूम साड़ी के बीच अंतर के बारे में जानकारी नहीं है। हथकरघा चिह्न और जीआई चिह्न के बारे में केवल सीमित संख्या में ही ग्राहक जानते हैं। उनके अध्ययन से यह भी पता चलता है कि ग्राहक इस बात से अनजान हैं कि विक्रेता साड़ियों पर असली हैंडलूम मार्क प्रदान कर रहे हैं या उत्पादों के साथ डुप्लिकेट हैंडलूम चिह्न दे रहे। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए रिसर्च स्कॉलर एम. कृष्ण प्रसन्ना नाइक ने साड़ियों पर ही लोगो और क्यूआर कोड की तकनीक का इजाद किया।

उन्होंने बताया कि पूरी तरह से डिज़ाइन की गई साड़ी में 6.50 मीटर लंबाई होती है जिसमें 1 मीटर ब्लाउज के टुकड़े शामिल होते हैं। साड़ी का हिस्सा पूरा होने के बाद, ब्लाउज के बुनने से पहले सादे कपड़े का एक हिस्सा 6-7 इंच का होता है। इस पैच में क्यू आर कोड और अन्य तीन लॉग डिज़ाइन किए गए हैं। इन लॉग डिजाइनों को जगह-जगह लगाने से कपड़े की मजबूती और खूबसूरती कम नहीं होगी और साड़ी का लुक बरकरार रहेगा।

अंगिका सहकारी समिति, वाराणसी के अध्यक्ष श्री अमरेश कुशवाहा और डिजाइनर सुश्री अंगिका ने पहली बार इस क्यूआर कोड की तकनीक को साड़ियों में लगाना शुरू किया है। उन्होंने कहा कि जीआई चिह्नों और हथकरघा चिह्नों के समुचित उपयोग के अभाव में ग्राहक हथकरघा पर बुनी साड़ियों और हैंडलूम से बनी साड़ियों में अंतर नहीं कर पाता। इसलिए, हम अपनी साड़ियों में इस क्यूआर कोड और हैंडलूम मार्क लॉग को इनबिल्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। यह हमारे स्थानीय और विदेशी ग्राहकों को हथकरघा उत्पाद और पावरलूम उत्पादों के बीच अंतर करने में मदद करेगा। टीम ने इनबिल्ट क्यूआर कोड और हथकरघा चिह्न लोगो के साथ सफलतापूर्वक एक साड़ी बनाई है।

for further details please contact: M. Krishna: 7607987722

Press & Publicity Cell, IIT(BHU).

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