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बनारसी वस्त्र उद्योग में 800 करोड़ से अधिक का उत्पादन प्रभावित

अचानक पूरे देश में लाकडाउन से उद्योग, आढतियो और थोक व्यापारियों के यहाँ अरबों का स्टॉक जाम ,बुनकारी से जुडे पांच लाख लोगों को रोजी-रोटी की चिंता सता रही

(युगल किशोर जालान)
वाराणसी। पूर्वांचल में कृषि के बाद टेक्सटाइल उद्योग ही सबसे बडा रोजगारपरक छेत्र है। अकेले वाराणसी जनपद में बुनकारी से जुडे पांच लाख लोगों को रोजी-रोटी की चिंता सताने लगी है। कोरोना संक्रमण पर अंकुश के लिए हुए लाकडाउन से सर्वाधिक नुकसान बनारसी वस्त्र उद्योग को पहुंचा है। यार्न के विभिन्न ट्रेडरो की बात पर विश्वास करें तो लाकडाउन के बाद से अबतक बनारसी वस्त्र उद्योग में 800 करोड रुपये से भी अधिक का उत्पादन प्रभावित हो चुका है। कोई अधिकृत आकडा तो उपलब्ध नहीं परन्तु बताया जाता है कि वाराणसी में ट्रेडर, इम्पोर्टर और मिलों के डिपो इत्यादि महीने मे 175 करोड रुपये से भी अधिक का विभिन्न प्रकार का यार्न बनारसी वस्त्र उद्योग से जुडे लोगों को बेचते हैं। निर्माताओं से डायरेक्ट यार्न मंगाने वाले पावरलूम संचालकों की भी संख्या कम नहीं है। अचानक पूरे देश में लाकडाउन से हैण्डलूम व पावरलूम संचालकों, आढतियो और थोक व्यापारियों के यहाँ अरबों का स्टॉक जाम हो गया है। बनारसी वस्त्र उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुडे पांच लाख से अधिक लोगों को रोजी-रोटी की चिंता सताने लगी है।
बनारसी वस्त्र उद्योग का मुख्य कच्चा माल श्रम है। बनारसी वस्त्र उद्योग और कालीन उद्योग को श्रम प्रधान उद्योग कहा जाता है। यार्न ट्रेडरो की अप्रैल महीने मे लगभग दो सौ करोड़ की बिक्री प्रभावित होंने की बात पर ही 800 करोड़ से अधिक का उत्पादन प्रभावित होने का अनुमान है। बनारसी वस्त्र उद्योग में यार्न के साथ अन्य अनेक चीजें भी कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होती हैं। बुनकारी के पेशे से जुडे लोगों से मिली जानकारी के अनुसार हैण्डलूम व पावरलूम पर अधूरी बुनी चढी हुई साडियो, दुपट्टे, शेरवानी के कपडे सहित विभिन्न क्वालिटी की फैब्रिक, सोफाकवर के कपडे इत्यादि में उद्यमियों की सौ करोड़ रुपये से भी अधिक की पूंजी फंसी हुई है। आमतौर पर लोग यही मानते हैं कि बुनकर मतलब मुसलमान। वास्तव में बनारसी वस्त्र उद्योग में बुनकारी के कार्य से आजीविका चलाने वालों में हिन्दुओं की संख्या भी कम नहीं है। यही वजह है कि लाकडाउन में कुछ छूट मिलने पर भी हैण्डलूम व पावरलूम पर बुनाई कार्य प्रभावित रहेगा।
ईद की निकटता से बनारसी वस्त्र उद्योग में काफी बेचैनी है। आमतौर पर रमजान का महीना शुरू होते ही हैण्डलूम और पावरलूम पर काम की गति बढा दी जाया करती थी। पूरा प्रयास रहता है कि ईद के पांच दिन पूर्व तक लूम से कपडा उतरकर मंडी में पहुँच जाए। बनारसी वस्त्र उद्योग में परम्परा हैकि ईद के बाद 15-20 दिन छुट्टी मनाते है। इसलिए पूरा प्रयास रहता है कि ईद के पांच दिन पूर्व लूम पर कोई अधूरा बुना कपडा या साडी ना रहे। अलविदा की नमाज़ तक पावरलूम संचालक कारीगरों का भुगतान कर दिया करते थे लेकिन इस बार पूरा बनारसी वस्त्र उद्योग गंभीर आर्थिक संकट में है।
बनारसी वस्त्र दुनियाभर में अपनी उत्कृष्टता, कारीगरी व सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध हैं। पीढी दर पीढी यह कला प्रतिभाशाली बुनकरों को अपने पूर्वजों से हस्तान्तरित होती रही है। यह प्रतिभा 15वी शताब्दी के संत और मौलिक समाज सुधारक कबीर को समर्पित है। यह भी कहा जाता है कि वाराणसी में बुनकारी की प्रथा 17वी शताब्दी में उस समय आई जब 1603 के अकाल के कारण गुजराती बुनकरों ने यहां आकर शरण ली।
एक समय था जब बनारसी वस्त्र का मतलब होता था ‘प्योर सिल्क’, लेकिन अब ऐसा नहीं है। तीस साल पहले बनारसी वस्त्र उद्योग में खपने वाले यार्न मे सिल्क यार्न की हिस्सेदारी 95 फीसदी के करीब होती थी। अब मैनमेड फाइबर यानी पॉलिएस्टर, सिन्थेटिक्स, नायलान और काटन यार्न की हिस्सेदारी 95 फीसदी के करीब बतायी जाती है। तीस सालों में सिल्क यार्न 900 रुपये प्रति किलो से बढता हुआ अब चार हजार रुपये प्रति किलो के आसपास है। महंगाई की मार से ही रेशम की जगह काटन और मैनमेड फाइबर का इस्तेमाल बढने लगा।

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