अखिल भारतीय कान्यकुब्ज वैश्य महासभा में चुनाव का रास्ता साफ
सहायक निबंधक, फर्म्स सोसाइटीज़ एवं चिट्स, वाराणसी ने अखिल भारतीय कान्यकुब्ज वैश्य महासभा में नए सिरे से चुनाव कराने का आदेश दिया है। 2018 की 234 सदस्यीय सूची के आधार पर होने वाले चुनाव की जिम्मेदारी वित्त एवं लेखा अधिकारी को सौंपी गई है। 2021 का चुनाव शून्य घोषित होने के बाद महासभा में हलचल तेज है। अध्यक्ष पद को लेकर जिम्मेदारी और चुनौतियाँ दोनों बढ़ गई हैं।
- सहायक निबंधक वाराणसी के आदेश के बाद महासभा में बढ़ी हलचल, अध्यक्ष पद बना सबसे बड़ी चुनौती
वाराणसी। अखिल भारतीय कान्यकुब्ज वैश्य महासभा से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर सहायक निबंधक, फर्म्स सोसाइटीज़ एवं चिट्स, वाराणसी मण्डल की अदालत ने 3 दिसंबर 2025 को महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए महासभा में नए सिरे से चुनाव कराए जाने का निर्देश दिया है। इस आदेश के बाद देशभर में फैले महासभा के सदस्यों के बीच गतिविधियाँ तेज़ हो गई हैं और संगठन के भविष्य को लेकर चर्चाएँ शुरू हो गई हैं।
सहायक निबंधक अनूप मिश्रा द्वारा पारित आदेश के अनुसार, चुनाव को सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के प्रावधानों के अनुरूप संपन्न कराया जाएगा। चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष ढंग से पूरा कराने की जिम्मेदारी बेसिक शिक्षा विभाग, वाराणसी के वित्त एवं लेखा अधिकारी श्री प्रदीप कुमार मिश्रा को सौंपी गई है। हालांकि, चुनाव की तिथि और स्थान फिलहाल निर्धारित नहीं किए गए हैं।
2018 की कार्यकारिणी सूची बनी चुनाव का आधार
अपने आदेश के साथ सहायक निबंधक कार्यालय ने वर्ष 2018 की 234 सदस्यीय कार्यकारिणी सूची को भी मान्य दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि इसी सूची के आधार पर आगामी चुनाव कराए जाएंगे।
हालांकि, इस सूची को लेकर भी कई व्यावहारिक प्रश्न सामने आए हैं। महासभा से जुड़े जानकारों और सदस्यों के अनुसार, इस सूची में शामिल लगभग 20 से 25 सदस्य अब इस दुनिया में नहीं हैं। ऐसे में चुनाव प्रक्रिया में केवल जीवित एवं उपलब्ध सदस्य ही मतदान के पात्र होंगे।
यह वही सूची मानी जा रही है, जिसके आधार पर 2018 में चित्रकूट में आयोजित चुनावी अधिवेशन में श्री गोपाल चंद्र साव (कोलकाता) को सर्वसम्मति से महासभा का अध्यक्ष चुना गया था।
2021 का महाधिवेशन चुनाव शून्य घोषित
सहायक निबंधक के आदेश का एक अहम पहलू यह भी है कि वर्ष 2021 में हुए महाधिवेशन चुनाव को शून्य घोषित कर दिया गया है। आदेश में कहा गया है कि यह चुनाव कार्यवाहक अध्यक्ष की अध्यक्षता में कराए गए थे, जबकि महासभा के संविधान में कार्यवाहक अध्यक्ष नामक किसी पद का उल्लेख नहीं है।
यह तर्क वादी पक्ष के मुकेश कुमार गुप्ता (कोलकाता) की ओर से रखा गया था, जिसे निबंधक अदालत ने स्वीकार किया। वादी का कहना था कि कार्यवाहक अध्यक्ष का पद संविधानविरुद्ध है और इसे तत्कालीन अध्यक्ष श्री गोपाल चंद्र साव के कथित कूट-रचित एवं फर्जी हस्ताक्षरयुक्त दस्तावेज़ों के आधार पर स्थापित किया गया।
निबंधक अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि किसी भी संस्था का संचालन उसके संविधान और अधिनियम के दायरे में ही किया जा सकता है और इससे बाहर की गई कार्यवाहियाँ वैध नहीं मानी जा सकतीं।
वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी रिकॉर्ड पर
मुकदमे की सुनवाई के दौरान महासभा में कथित रूप से हुए लाखों रुपये के वित्तीय गबन का मुद्दा भी सामने आया। वादी पक्ष की ओर से आरोप लगाया गया कि महासभा के खाते से अनियमित तरीके से धनराशि निकाली गई, जिसके लिए वैधानिक स्वीकृति और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।हालांकि, निबंधक अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि चुनाव कराना प्राथमिक आवश्यकता है और धन-वसूली या आगे की कार्रवाई भविष्य की प्रक्रिया का विषय होगा।
धर्मशालाओं के संचालन पर भी सवाल
वादी पक्ष द्वारा यह भी आरोप लगाया गया कि महासभा से जुड़ी कई महत्वपूर्ण संपत्तियों—जैसे चित्रकूट धर्मशाला, सतना धर्मशाला, हरिद्वार धर्मशाला और प्रयागराज स्थित अरैल धर्मशाला-का संचालन नियमों के अनुरूप नहीं किया जा रहा।
आरोप है कि इन धर्मशालाओं के आय-व्यय का विवरण न तो नियमित रूप से तैयार किया जाता है और न ही सदस्यों के सामने प्रस्तुत किया जाता है। इससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए हैं और महासभा के भीतर असंतोष भी बढ़ा है।
जय नारायण गुप्ता ‘भारती’ का बयान: “अध्यक्ष पद गर्व नहीं, जिम्मेदारी का पहाड़”
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता जय नारायण गुप्ता ‘भारती’ (कानपुर) ने कहा कि सहायक निबंधक का आदेश महासभा के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत है, लेकिन यह राह आसान नहीं होगी।
उन्होंने कहा- “आज महासभा का अध्यक्ष पद गर्व का नहीं, बल्कि साँपों की माला जैसा है। जो भी व्यक्ति इस पद को स्वीकार करेगा, उसके सामने महासभा की संपत्ति, धन-वसूली, लेखा-जोखा, ऑडिट और वर्षों पुराने विवादों को सुलझाने की भारी जिम्मेदारी होगी।”
जय नारायण गुप्ता भारती के अनुसार, महासभा की संपत्तियाँ समाज के पुरखों की मेहनत और त्याग का परिणाम हैं, जिनकी कीमत पचासों करोड़ रुपये आँकी जाती है। यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ समाज को दोष देंगी।
अध्यक्ष पद को लेकर चर्चाएँ तेज
निबंधक अदालत के आदेश के बाद महासभा में यह चर्चा तेज हो गई है कि अगला अध्यक्ष कौन होगा। सदस्यों के बीच कई नामों पर विचार किया जा रहा है, जिनमें- डॉ. मोतीलाल गुप्ता , राजकुमार गुप्ता (सतना), रामबाबू गुप्ता (चित्रकूट), बद्दी प्रसाद गुप्ता (जबलपुर), डॉ. स्वामी दीन राठ (हमीरपुर), प्रमुख रूप से चर्चा में हैं।
हालांकि, वरिष्ठ सदस्यों का मानना है कि नाम से अधिक जरूरी है चरित्र, निष्पक्षता और धैर्य। महासभा को ऐसे अध्यक्ष की आवश्यकता है जो किसी गुट या व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर निर्णय ले सके।
पहले चुनाव, फिर धन-वसूली-वरिष्ठों की राय
महासभा के कई वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण काम निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराना है। एक वैध और सर्वमान्य कार्यकारिणी के गठन के बाद ही वित्तीय अनियमितताओं, गबन और धन-वसूली जैसे मुद्दों पर ठोस निर्णय लिया जा सकता है। यदि आपसी बातचीत से धन की वापसी संभव नहीं होती, तो कानूनी विकल्प भी खुले हैं। लेकिन इसके लिए एक मजबूत और वैधानिक नेतृत्व का होना अनिवार्य है।
भविष्य की राह
सहायक निबंधक का आदेश अखिल भारतीय कान्यकुब्ज वैश्य महासभा के लिए चुनौती और अवसर-दोनों लेकर आया है। चुनौती इसलिए कि वर्षों से चले आ रहे विवादों को सुलझाना आसान नहीं होगा, और अवसर इसलिए कि यदि सही नेतृत्व चुना गया, तो महासभा को फिर से एक सशक्त, पारदर्शी और समाज-सेवी संस्था के रूप में स्थापित किया जा सकता है।
अब सबकी निगाहें आने वाले चुनाव पर टिकी हैं- क्या महासभा ऐसा अध्यक्ष चुन पाएगी जो इन जटिल परिस्थितियों में संगठन को संभाल सके, या फिर विवादों का यह दौर और लंबा खिंचेगा?
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