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रक्त की जरूरत की खबर मिलते ही पिघल गया ‘खाकी’ का दिल

वाराणसी में चौबेपुर थाने के उप निरीक्षक उमेश कुमार गुप्ता ने मानवता की मिसाल पेश की। 79 वर्षीय दुलारी देवी को रक्त की जरूरत पड़ने पर उनकी पोती ने मदद की तलाश शुरू की। रक्तदान के लिए सक्रिय राजेश कुमार गुप्ता ने उमेश से संपर्क किया। मरीज के लिए जरूरी ब्लड ग्रुप उमेश का भी था। उन्होंने ड्यूटी पूरी करने के बाद करीब 25 किलोमीटर मोटरसाइकिल चलाकर बीएचयू पहुंचकर रक्तदान किया और फिर वापस लौटे। उनका यह कदम पुलिस की संवेदनशीलता और स्वैच्छिक रक्तदान का प्रेरक उदाहरण बना।

वाराणसी। पुलिस की वर्दी को आमतौर पर अनुशासन, जिम्मेदारी और सख्ती का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इसी वर्दी के भीतर संवेदना, करुणा और मानवता का दिल भी धड़कता है। वाराणसी में चौबेपुर थाने पर तैनात उप निरीक्षक उमेश कुमार गुप्ता ने 79 वर्षीय बुजुर्ग महिला के लिए रक्तदान कर खाकी के इसी मानवीय चेहरे को सामने रखा है। मरीज को जिस ब्लड ग्रुप की तत्काल आवश्यकता थी, वही ब्लड ग्रुप उमेश कुमार गुप्ता का था। सूचना मिलते ही उन्होंने बिना किसी संकोच के रक्तदान करने का निर्णय लिया और अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद मोटरसाइकिल से करीब 25 किलोमीटर दूर बीएचयू पहुंचकर रक्तदान किया।

यह घटना केवल रक्तदान की एक सामान्य कहानी नहीं है। इसमें एक जरूरतमंद बुजुर्ग महिला की जिंदगी बचाने की चिंता, एक परेशान पोती की भागदौड़, रक्तदान के लिए सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं की तत्परता और एक पुलिस अधिकारी की संवेदनशील पहल- सभी एक साथ दिखाई देते हैं।

तीन महीने से चल रहा था दुलारी देवी का उपचार

दुलारी देवी, उम्र 79 वर्ष, मूल रूप से सैयदराजा, चंदौली की निवासी हैं। उनका परिवार भरा-पूरा है। बीमारी के कारण वह पिछले करीब तीन महीने से उपचार के सिलसिले में अस्पताल में भर्ती हैं। वर्तमान में वह वाराणसी के सिगरा क्षेत्र स्थित अपनी पोती नेहा सिंह के आवास पर रह रही थीं। उपचार के दौरान जब उन्हें रक्त की आवश्यकता पड़ी तो परिवार के सामने तत्काल रक्त की व्यवस्था करने की चुनौती खड़ी हो गई। बुजुर्ग महिला की हालत और उपचार की जरूरत को देखते हुए उनकी पोती नेहा सिंह लगातार परिचितों और अन्य लोगों से संपर्क कर रक्त की व्यवस्था करने का प्रयास कर रही थीं। इसी प्रयास के दौरान उनका संपर्क काशी रक्तदान नेत्रदान कुटुंब समिति के संस्थापक सचिव एवं रोटरी क्लब ब्लड एंड ऑर्गन डोनर के अध्यक्ष राजेश कुमार गुप्ता से हुआ।

नेहा का फोन पहुंचा राजेश कुमार गुप्ता तक

रक्त की जरूरत की जानकारी मिलने पर राजेश कुमार गुप्ता ने पहले मरीज और आवश्यक ब्लड ग्रुप की जानकारी ली। उन्होंने परिवार को मदद का भरोसा दिया और कहा कि वह रक्तदाता की व्यवस्था करने का प्रयास करेंगे। राजेश कुमार गुप्ता सामाजिक और रक्तदान गतिविधियों से लंबे समय से जुड़े हैं। रक्तदान के क्षेत्र में उनके कार्यों के लिए उन्हें मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किए जाने की जानकारी भी दी गई है। वह बाबा गणिनाथ भक्त मंडल के संस्थापक ट्रस्टी भी हैं। मरीज की आवश्यकता को देखते हुए राजेश कुमार गुप्ता ने समय गंवाए बिना संभावित रक्तदाता की तलाश शुरू की। इसी क्रम में उन्होंने चौबेपुर थाने में तैनात उप निरीक्षक उमेश कुमार गुप्ता से फोन पर संपर्क किया।

संयोग से वही था उमेश का ब्लड ग्रुप

राजेश कुमार गुप्ता ने जब उमेश कुमार गुप्ता को मरीज के बारे में बताया और आवश्यक ब्लड ग्रुप की जानकारी दी तो पता चला कि मरीज को जिस ब्लड ग्रुप की आवश्यकता थी, वही ब्लड ग्रुप उप निरीक्षक उमेश कुमार गुप्ता का भी है। यह जानकारी मिलने के बाद उमेश कुमार गुप्ता ने रक्तदान के लिए सहमति दे दी। हालांकि समस्या अभी भी सामने थी- समय की। उमेश कुमार गुप्ता की उस समय चौबेपुर थाने में ड्यूटी थी। ड्यूटी का समय रात करीब नौ बजे तक था, जबकि मरीज को रक्त की आवश्यकता तत्काल थी। चौबेपुर से बीएचयू की दूरी भी लगभग 25 किलोमीटर है। लेकिन मरीज की जरूरत के सामने उन्होंने दूरी और समय को बाधा नहीं बनने दिया।

ड्यूटी खत्म की और सीधे बीएचयू के लिए निकल पड़े

उमेश कुमार गुप्ता ने अपनी ड्यूटी पूरी की। इसके बाद वह मोटरसाइकिल से चौबेपुर से बीएचयू के लिए रवाना हो गए। करीब 25 किलोमीटर की दूरी मोटरसाइकिल से तय कर वह बीएचयू पहुंचे। वहां उन्होंने जरूरतमंद मरीज के लिए रक्तदान किया।रक्तदान करने के बाद उन्हें फिर वापस चौबेपुर लौटना था। इस तरह रक्तदान के लिए घर या ड्यूटी स्थल से अस्पताल तक पहुंचने और वापस लौटने में उन्होंने करीब 50 किलोमीटर की यात्रा की। उनका यह प्रयास इसलिए भी उल्लेखनीय रहा क्योंकि रक्तदान उन्होंने किसी परिचित, रिश्तेदार या करीबी व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि ऐसी बुजुर्ग महिला के लिए किया, जिनसे उनका कोई व्यक्तिगत संबंध नहीं था।

‘दादी को रक्त दूंगा’- और निभा दिया अपना वादा

मरीज की स्थिति की जानकारी मिलने के बाद उमेश कुमार गुप्ता ने रक्तदान करने की बात कही और फिर अपने कथन को व्यवहार में उतार दिया। एक तरफ थाने की जिम्मेदारी थी तो दूसरी तरफ एक बुजुर्ग महिला की जिंदगी से जुड़ी जरूरत। उन्होंने दोनों जिम्मेदारियों के बीच रास्ता निकाला- पहले ड्यूटी पूरी की और फिर रक्तदान के लिए निकल पड़े। यही पहल इस घटना को विशेष बनाती है।

खाकी का एक संवेदनशील चेहरा

पुलिसकर्मियों के बारे में आम धारणा अक्सर सख्त और अनुशासनप्रिय होने की होती है। लेकिन उप निरीक्षक उमेश कुमार गुप्ता का यह कार्य खाकी के उस चेहरे को सामने लाता है, जिसमें संवेदना और सेवा की भावना भी उतनी ही मजबूत है। उन्होंने रक्तदान को केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं समझा, बल्कि एक जरूरतमंद बुजुर्ग की तत्काल आवश्यकता के रूप में देखा। उनके लिए 25 किलोमीटर की दूरी और ड्यूटी के बाद का समय बाधा नहीं बना। रक्तदान के लिए उन्होंने अपनी सुविधा नहीं देखी, मरीज की जरूरत देखी।

परिवार ने जताया आभार

दुलारी देवी के परिवार के सदस्यों ने उप निरीक्षक उमेश कुमार गुप्ता के प्रति आभार व्यक्त किया। परिवार के लिए वह समय बेहद चिंता और परेशानी का था। ऐसे समय में रक्तदाता मिलना उनके लिए बड़ी राहत थी। परिवार ने उमेश कुमार गुप्ता के इस सहयोग को यादगार बताया। उनके रक्तदान से न केवल तत्काल रक्त की आवश्यकता पूरी करने में मदद मिली, बल्कि परिवार को मुश्किल समय में समाज और पुलिस के मानवीय सहयोग का अनुभव भी हुआ।

राजेश गुप्ता की पहल ने जोड़ी मदद की कड़ी

इस पूरी घटना में राजेश कुमार गुप्ता की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। पोती नेहा सिंह के फोन के बाद उन्होंने मरीज की आवश्यकता को समझा और तत्काल संभावित रक्तदाता से संपर्क किया। एक फोन से शुरू हुई मदद की यह कड़ी अंततः रक्तदान तक पहुंची। नेहा सिंह ने मदद के लिए फोन किया, राजेश कुमार गुप्ता ने रक्तदाता तलाशा और उप निरीक्षक उमेश कुमार गुप्ता ने अपना रक्त देकर उस तलाश को सार्थक कर दिया।

सिर्फ रक्त नहीं, भरोसा भी दिया

रक्तदान को अक्सर कुछ मिनटों की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, लेकिन किसी जरूरतमंद परिवार के लिए वह रक्त कई बार उम्मीद और जीवन के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी बन जाता है। उमेश कुमार गुप्ता ने दुलारी देवी के लिए रक्तदान करके यही संदेश दिया कि मानवता के लिए उठाया गया छोटा-सा कदम भी किसी परिवार के लिए बहुत बड़ा सहारा बन सकता है। चौबेपुर से बीएचयू तक 25 किलोमीटर की दूरी तय करना और फिर रक्तदान के बाद वापस लौटना उनके लिए एक व्यक्तिगत प्रयास था, लेकिन इसका संदेश व्यापक है। वर्दी की जिम्मेदारी निभाते हुए इंसानियत की जिम्मेदारी निभाना-उमेश कुमार गुप्ता के इस रक्तदान ने खाकी के इसी मानवीय पक्ष को सामने रखा।

समाज के लिए संदेश

आज जब रक्त की जरूरत के समय परिवारों को अक्सर रक्तदाता तलाशने के लिए कई लोगों से संपर्क करना पड़ता है, ऐसे में स्वैच्छिक रक्तदाता किसी जरूरतमंद परिवार के लिए बड़ी राहत बनते हैं। उमेश कुमार गुप्ता का उदाहरण बताता है कि रक्तदान के लिए हमेशा बड़े अभियान या मंच की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक फोन, एक सहमति और कुछ किलोमीटर का सफर किसी परिवार की सबसे बड़ी चिंता को कम कर सकता है।

उप निरीक्षक उमेश कुमार गुप्ता का यह रक्तदान इसलिए भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने पहले अपनी ड्यूटी पूरी की और उसके बाद रक्तदान के लिए समय निकाला। खाकी की जिम्मेदारी और इंसानियत की पुकार-दोनों को साथ लेकर चलने वाली यह कहानी समाज में स्वैच्छिक रक्तदान की भावना को मजबूत करने वाली है। दुलारी देवी के लिए दिया गया यह रक्त केवल एक यूनिट रक्त नहीं था-यह एक अनजान बुजुर्ग के प्रति संवेदना, एक परेशान परिवार के प्रति सहयोग और मानवता के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक बन गया।

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