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जौनपुर में पराली जलाने की एक घटना होते ही प्रशासन हरकत में, रोकने के ढेरों इंतजाम

जौनपुर। जिले में पराली (फसल अवशेष) जलाने का चलन न होने के बावजूद एक घटना प्रकाश में आते ही जौनपुर को भी प्रदेश के 24 ज़िलों के साथ नोटिस मिल गई। मुख्य सचिव ने पराली जलने पर जिलाधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा है। इधर जिलाधिकारी ने इस सन्दर्भ में किसानों को पराली न जलाने के कड़े निर्देश जारी किए हैं। साथ ही कृषि, राजस्व और पुलिस विभाग को इस पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी दी गई है।

जिलाधिकारी दिनेश कुमार सिंह ने कहा है कि कोई भी किसान फसल अवशेष खेत में न जलाए बल्कि उनका प्रबंधन कर मृदा स्वास्थ्य को टिकाऊ बनाए। कोई भी हार्वेस्टर धारक फसल अवशेष प्रबंधन वाले यंत्रों के बिना कटाई करते हुए पाए गए तो तत्काल उनकी मशीन सीज कर दी जाएगी। हर हार्वेस्टर मशीन पर कृषि विभाग के कर्मचारी तैनात किये गए हैं, जो प्रतिदिन कटाई की सूचना सेल को उपलब्ध कराएंगे। बकौल जिलाधिकारी, पिछले वर्ष जिले में पराली जलाने की 17 घटनाएं घटी थी, उन गांवों में विशेष रूप से टीम लगाकर किसानों को जागरुक किया जाएगा।

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किसानों को फसल अवशेष न जलाने के लिए जागरूक करने के लिए ग्राम सभाओं में कृषि तथा राजस्व विभाग के कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है, जो कैंप लगाकर जागरूकता अभियान चलाएंगे। जिला स्तर पर अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व की निगरानी में एक सेल का गठन भी किया गया है। समस्त थाना प्रभारियों को निर्देश दिए गए हैं कि अपने क्षेत्र में फसल अवशेष को जलाने से रोकने हेतु प्रभावी कार्यवाही करें। जागरूकता अभियान के लिए विशेष रूप से हर न्याय पंचायतवार व ग्राम पंचायतवार क्लस्टर बनाकर 1200 राजकीय कर्मचारियों को नामित किया गया है, ताकि फसल अवशेष जलाए जाने की घटनाएं बिल्कुल न हो।

कृषि विभाग के उप परियोजना निदेशक प्रसार डा. रमेश चंद्र यादव ने किसानों को सुझाव देते हुए बताया कि पराली को जलाने के अतिरिक्त पराली प्रबंधन के कई विकल्प है, अगर किसान पराली काटकर गौशाला भेजेगा तो उसे राज वित्त से धनराशि मिलेगी, इसके साथ ही डी-कम्पोजर से पराली का प्रबंधन कर सकते है, किसान चाहे तो मनरेगा से पराली की कटाई करा सकते हैं, वही कृषि विभाग भी पराली के प्रबंधन के लिए कई यंत्रों को 50-80 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध करा रहा है।

गौरतलब है कि मुख्य सचिव राजेंद्र तिवारी ने संबंधित जिलाधिकारियों को पत्र लिखकर पराली जलाने की घटनाओं का विवरण मांगने के साथ दोषियों पर कार्रवाई की जानकारी देने को भी कहा है। साथ ही भविष्य में घटनाएं नहीं होने देने के निर्देश भी दिए हैं। उन्होंने कहा कि गत एक से चार अक्टूबर तक सेटेलाइट के जरिये प्रदेश में कृषि अवशेष जलाने की कुल 33 घटनाओं की सूचना मिली थी। मुख्य सचिव ने चार बिंदुओं पर उत्तर मांगा है। उन्होंने पूछा कि अगर यह घटनाएं धान या गन्ना अवशेष जलाने की हैं तो निश्चित रूप से उच्चतम न्यायालय के आदेश का उल्लंघन है ऐसे में यह घटनाएं यदि पराली जलाने से संबंधित थीं तो दोषियों पर कार्रवाई की जाए। कंबाइन को सीज किया गया या नहीं, यह बताने के साथ जानकारी दी जाए कि संबंधित गांव में पराली प्रबंधन के लिए मशीन थी या नहीं। इसके अलावा गांव में उत्पन्न पराली को गो-आश्रय स्थलों में भेजने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई।

प्रदेश के 25 जिलों में पराली जलाने की संज्ञान में आयी 33 घटनाओं में जौनपुर की एक घटना का भी उल्लेख है। हालांकि जौनपुर जनपद में अधिकांश छोटी जोत होने के कारण कंबाइन का  प्रयोग नहीं होता था, लेकिन पिछले कुछ सालों से कृषि श्रमिकों के अभाव में किसानों की मशीनों पर निर्भरता बढ़ने लगी है। फिर भी जौनपुर जिले के अधिकांश गांवों में कृषि अवशेषों का पशु चारे, जलावन और मड़हा या झोपड़ी की छत बनाने में प्रयोग होने के कारण पराली जलाने का चलन नहीं है। लाॅकडाउन के दौरान पशु चारे के लिए धान की पुआल बेच कर किसानों ने अच्छा पैसा कमाया।

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