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पथ प्रदर्शक हैं कथा सम्राट की रचनाएं-अजय कुमार मिश्रा

राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन संपन्न

वाराणसी। राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा ने कार्यक्रम की सफलता पर राजभाषा विभाग व सभी मंत्रालयों कार्यालयों व उपक्रमों के प्रतिभागियों को बधाई देते हुए कहा कि हिंदी भाषा के प्रति समर्पण भाव से भारी संख्या में प्रतिभागिता हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है व प्रेरणादायक है।

मंत्री अजय मिश्र ने कहा कि कई ऐसे देश हैं जहां आज़ादी के बाद बलपूर्वक भाषा को लागू किया गया किन्तु हमारे देश में ऐसी संस्कृति है कि हम सबसे यह अपेक्षा करते हैं कि स्वप्रेरणा से कार्य करें। बिना दबाव के जो काम किया जाता है वह स्थायी होता है। यह वह राष्ट्र है जो अध्यात्म पर आधारित है। अजय कुमार मिश्रा का कहना था कि यह हमारी संस्कृति है कि हम दबाव या घृणा की बात नहीं करते, सर्वे भवन्तु सुखिनः की बात करते हैं।

श्री मिश्रा का कहना था कि संघ ने जो दायित्व दिया है उसमें ऐसे दायित्व हैं कि देश मे कामकाज की भाषा क्या हो, संघ से प्रदेश के संचार की भाषा, प्रदेश से प्रदेश के संचार की भाषा क्या हो, और इसमें किसी प्रकार की कठिनाई न आये। उनका कहना था कि क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के साथ ही हिंदी का विकास सम्भव है क्योंकि क्षेत्रीय भाषाएं हिंदी से जुड़ी हैं। अजय कुमार मिश्रा ने कहा कि भारत से बाहर रह रहे लोगों ने भी हिंदी और अपनी-अपनी भाषाओं के प्रसार में बहुत योगदान दिया और भारत वसुधैव कुटुम्बकम की संस्कृति पर विचार करता है।

श्री मिश्रा ने कहा कि पंडित दीनदयाल जी ने जो दर्शन दिया उसमें कहा है कि जो हमारे गर्व और गौरव के जो प्रतीक हैं, चिह्न हैं उनका सम्मान होना चाहिए। जब माननीय प्रधानमंत्री जी पहली बार देश के बाहर गए उन्होंने नवरात्र के व्रत के द्वारा अपनी संस्कृति का प्रसार किया। प्रधानमंत्री ने पूरी दुनिया में एक ऐसे मंच से संस्कृति का विस्तार किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति का दर्शन विश्व को कराया है। प्रधानमंत्री  ने न केवल भाषा की पुनर्स्थापना की, उन्होंने देश की संस्कृति, गौरव परंपरा को विश्व को दिखाया है। अजय कुमार मिश्रा ने कहा कि यह प्रतिबद्ध सरकार है, राजभाषा विभाग एक प्रतिबद्ध विभाग है। हम सभी भाषाओं को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं, राजभाषा को उसके लिए निर्धारित लक्ष्य तक ले जाने का प्रयास करेंगे।

विदित हो कि राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का उद्घाटन केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने किया था । दो दिन में कई सत्रों में राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर चर्चा हुई । एक सत्र में बोलते हुए सांसद प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी ने कहा कि हमारे देश की शत-प्रतिशत जनता हिंदी भाषा लिख नहीं पाए तो क्या हुआ उसके भाव को भलीभांति समझ लेती है। यही भारतीय जनता की विशेषता है।

एक सत्र के मुख्य अतिथि पूर्व सांसद विजय कुमार दरड़ा ने अपना अनुभव बताते हुए कहा जर्मनी में प्रिंटिंग मशीन लेने गया था। उस दौरान मैंने अपने भाई से हिंदी में कहा कि यह हमें मूर्ख बना रहा है। वह जर्मनीवासी मेरी भाषा समझ गया। उसने कहा नहीं मैं आपको मूर्ख नहीं बना रहा हूं, मैं आश्चर्य में पड़ गया कि इसे मेरी भाषा कैसे समझ में आई तो उसने बताया कि मैंने 2 वर्ष तक बनारस में हिंदी भाषा लिखना पढ़ना सीखा है ।

इसी क्रम में साहित्य अकादमी, भोपाल के निदेशक प्रोफेसर विकास दवे ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी भाषा के साम्राज्य में सूरज नहीं डूबता है, जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया की कुलपति प्रोफेसर कल्पलता पाण्डेय ने कहा कि इस अमृत वर्ष में पूरे देश के लिए एक हिंदी भाषा होनी चाहिए, स्वभाषा अमर हो जाए ऐसी मैं आशा करती हूं।

एक सत्र में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. राम मोहन पाठक, पूर्व कुलपति दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई ने कहा कि भावों की अभिव्यक्ति ही सात्विक भाषा की अभिव्यक्ति है। आज हमें भाषा में सात्विक सोच अपनाने की जरूरत है। मीडिया एक संवेदनशील कार्य है। उनका कहना था भाषा ही भाव है, न्यू और डिजिटल मीडिया ने हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, हालांकि आज हिंदी पत्रकारिता में भाषायी चुनौतियां सामने आ रही हैं।

सत्र में भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि वही भाषा जीवित रहती है, जिसका प्रयोग जनता करती है। देश में आपसी संवाद का सबसे सरल माध्यम हिंदी है और भारतीय मीडिया के माध्यम से आम जनमानस तक पहुंच ने इसे धार देने का काम किया है। एक सत्र को संबोधित करते हुए बालेंदु शर्मा दाधीच, निदेशक, भारतीय भाषाएं, माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि देश में हिंदी अखबारों और समाचार चैनलों का सबसे बड़ा क्षेत्र है, अगर टॉप 20 अखबारों की बात करें तो इसमें ज्यादातर हिंदी के हैं, वहीं टॉप टेन न्यूज चैनलों में अधिकांश हिंदी के हैं।

एक सत्र में दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि के सहायक प्रोफसर डॉक्टर किंशुक पाठक ने मीडिया में हिन्दी भाषा के प्रयोग पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि भाषा में प्रयोग होने वाले कई महत्वपूर्ण शब्दों का लुप्त होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। एक सत्र में बोलते हुए प्रोफेसर प्रमोद कुमार जैन ने कहा कि भारत के महापुरुषों जैसे बंकिम चंद्र चटर्जी, स्वामी दयानंद सरस्वती, महामना मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी जी का मानना था कि भारत की राष्ट्रभाषा के तौर पर हिंदी को स्थान दिया जाए। भारत में जितने भी तीर्थ स्थान हैं उन सभी स्थानों पर हिंदी शुरू से प्रभावी रही है।

सत्र में प्रोफेसर मोहन, प्रभारी हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कहा कि भारत को आजाद हुए आज 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं अब हमें इन 75 वर्षों में अपने किए कार्यों का मंथन करने की जरूरत है। उनका कहना था कि जो कार्य हमसे छूट गए हैं उसके लिए हमें संकल्प लेना होगा कि हम अगले 25 वर्षों में उन कार्यों को पूर्णरूपेण पूर्ण कर सकें।   एक सत्र में श्री जी सेल्वारजन, प्रधान सचिव, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा चेन्नई ने तमिल भाषा के राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम की कविता से अपनी बात को प्रारंभ किया। उनका कहना था कि ग्राम भाषा के बिना चिंतन संभव नहीं है। अपनी मातृभाषा और आसान लगने वाली भाषा में ही चिंतन करते हैं। डॉक्टर त्रिभुवन नाथ शुक्ल ने कहा कि पश्चिम के मनीषियों ने भारतीय भाषा चिंतन को सर्वमान्य स्वीकृति दी है।

एक सत्र में श्री केशरी नाथ त्रिपाठी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि अध्ययन और विषय जब दोनों गंभीर हो तो वह अद्वितीय मेधा का परिचय मिलता है। आज भारत का कोई ऐसा कोना नहीं है जहां हिंदी बोली या समझी ना जाती हो। सत्र की अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा के उप सभा पति श्री हृदय नारायण दीक्षित ने कहा कि इस पृथ्वी के 57 देशों के उच्च न्यायालय में अपनी मातृभाषा में कार्रवाई होती है। इन देशों में फ्रांस, ब्राजील पुर्तगाल इत्यादि देश शामिल हैं। इन का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि वहां की उच्च न्यायालय अपनी मातृभाषा को वह सम्मान देते हैं जो कि भारत में हिंदी को नहीं प्राप्त है।

अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन वाराणसी में प्रथम दिवस के दूसरे सत्र वैश्विक संदर्भ में हिंदी- चुनौतियों और संभावनाएं विषयक सत्र के अतिथि वक्ता श्री अनिल शर्मा उपाध्यक्ष हिंदी केंद्रीय संस्थान आगरा ने अपने वक्तव्य में कहा कि गिरमिटिया देशों जैसे फिजी, मारीशस, त्रिनिडाड में भारतीयों ने आज भी मातृभाषा को अपनाए रखा है और उसका जरिया रामचरित मानस है।

प्रोफेसर रमेश कुमार पाण्डेय कुलपति लाल बहादुर संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि सनातन परंपरा में भाषा का बहुत बड़ा योगदान और महत्व रहा है। ऋषि भर्तृहरी ने शब्द को ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया है। संसार में कोई ऐसा ज्ञान नहीं है जो शब्द के बिना होता है। इस अवसर पर प्रोफेसर उमापति दीक्षित, विभागाध्यक्ष केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने कहा कि केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा में विश्व के 42 विभिन्न देशों के बच्चे हिंदी सीखने प्रतिवर्ष आते हैं। डेढ़ सौ से अधिक देशों में हिंदी आज पांव पसार चुकी है। आज हिंदी अर्थकारी विद्या बन गई है, इसलिए विश्व हिंदी की ताकत को समझ रहा हैं।

मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही में गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा ने प्रेमचंद्र को श्रद्धा-सुमन अर्पित किए

मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही में गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा ने प्रेमचंद्र को श्रद्धा-सुमन अर्पित किए। लमही पहुंचे गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा ने मुंशी जी के आवास और परिसर का भ्रमण किया। इसके बाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि मुंशी जी की कृतियां आज भी प्रेरक और पथ-प्रदर्शक हैं। उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक लगती हैं। श्री अजय मिश्रा का कहना था कि मुंशी प्रेमचंद ने ऐसी कृतियों की रचना की जिसने हर वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। भविष्य में होने वाली घटनाओं की झलक ऐसे महान विभूतियों की कृतियों में साफ झलकती है।

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