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विजया एकादशी: विजय, श्रद्धा और धर्म का महापर्व

काशी में 13 फरवरी को विजया एकादशी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से जीवन की सभी बाधाओं पर विजय प्राप्त होती है। गंगा स्नान, विष्णु पूजन और एकादशी माता की आराधना से पापों का नाश और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

  • फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी पर काशी में गंगा स्नान, विष्णु पूजा और व्रत का विशेष धार्मिक महत्व, जानें व्रत नियम और लाभ

वाराणसी : सनातन धर्म की आध्यात्मिक राजधानी काशी में गुरुवार, 13 फरवरी को विजया एकादशी का पावन व्रत श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक मनाया जाएगा। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की यह एकादशी भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से किया गया व्रत जीवन की समस्त बाधाओं पर विजय दिलाता है, इसी कारण इसे “विजया एकादशी” कहा गया है।

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार विजया एकादशी का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह व्रत न केवल पापों के क्षय का माध्यम है, बल्कि साधक को आत्मबल, धैर्य और सफलता प्रदान करता है। काशी में इस एकादशी का पुण्यफल और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह नगरी स्वयं मोक्षदायिनी मानी गई है। गंगा स्नान के साथ व्रत आरंभ करने की परंपरा यहां विशेष रूप से प्रचलित है।

काशी पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 13 फरवरी को उदयातिथि में पड़ रही है, इसलिए इसी दिन व्रत रखा जाएगा। प्रातःकाल श्रद्धालु गंगा में स्नान कर व्रत का संकल्प लेंगे और दिनभर भगवान विष्णु की आराधना करेंगे। मंदिरों में विष्णु सहस्रनाम पाठ, भजन-कीर्तन और विशेष आरतियों का आयोजन होगा।

व्रत का पारणा द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद किया जाएगा। धर्माचार्यों के अनुसार पारणा से पूर्व हरि वासर काल का ध्यान रखना आवश्यक है। पारणा के समय सबसे पहले भगवान विष्णु को भोग अर्पित कर जल या फल ग्रहण करना श्रेष्ठ माना गया है। नियमों के उल्लंघन से व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता, इसलिए संयम और शुद्धता पर विशेष जोर दिया गया है।

13 फरवरी को दिन के मध्याह्न के समय राहुकाल रहेगा। इस दौरान नए धार्मिक संकल्प, पारणा या किसी विशेष शुभ कार्य से बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि विष्णु नाम-स्मरण, जप और ध्यान राहुकाल में भी किए जा सकते हैं।

विजया एकादशी व्रत के नियमों में ब्रह्मचर्य, सत्य और संयम का विशेष महत्व है। व्रती को प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए, दिनभर उपवास या फलाहार रखना चाहिए और रात्रि में जागरण कर भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। काशी में अनेक श्रद्धालु इस दिन निर्जला व्रत भी रखते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार विजया एकादशी की कथा त्रेता युग से जुड़ी है। जब भगवान श्रीराम लंका विजय के लिए समुद्र तट पर पहुंचे, तब विजय को लेकर संशय बना हुआ था। ऋषि-मुनियों के परामर्श पर भगवान श्रीराम ने विजया एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से समुद्र ने मार्ग दिया, सेतु का निर्माण संभव हुआ और अंततः अधर्म पर धर्म की विजय हुई। यही कारण है कि इस एकादशी को विजय प्रदान करने वाली माना जाता है। कथा यह संदेश देती है कि श्रद्धा, नियम और ईश्वर भक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जप विशेष फलदायी माना गया है। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करने से मन की शुद्धि होती है और साधक को आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। मंदिरों और घरों में विष्णु आरती के साथ-साथ एकादशी माता की आरती भी की जाती है, जिसमें भक्त एकादशी माता से कृपा की कामना करते हैं।

पुराणों में विजया एकादशी का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में इस व्रत के पुण्य फल, विधि और प्रभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत करने से न केवल व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन में सफलता मिलती है, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी सुख-शांति का संचार होता है।

व्रत के दौरान फल, दूध, मेवे और सात्विक आहार ग्रहण करने की परंपरा है। सिंघाड़ा, कुट्टू और साबूदाने से बने व्यंजन व्रत में सेवन किए जा सकते हैं, जबकि चावल, गेहूं, दाल और तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित माने गए हैं। दशमी तिथि का भी विशेष महत्व है। धर्मशास्त्रों के अनुसार दशमी तिथि में सूर्यास्त से पूर्व सात्विक और हल्का भोजन कर लेना चाहिए, ताकि एकादशी व्रत निर्विघ्न संपन्न हो सके।

वर्तमान समय में विजया एकादशी का महत्व और भी बढ़ गया है। भागदौड़ और तनाव से भरे जीवन में यह व्रत आत्मसंयम, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। काशी में यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज और परिवार को धर्म, अनुशासन और सद्भाव से जोड़ने का माध्यम भी है।

13 फरवरी को मनाई जाने वाली विजया एकादशी काशीवासियों के लिए विजय, वैराग्य और विष्णु भक्ति का पावन अवसर है।

“दशमी युक्त एकादशी” क्या है?

जब एकादशी तिथि का प्रारंभ सूर्योदय से पहले हो और सूर्योदय के समय एकादशी पर दशमी का अंश प्रभावी माना जाए, तब उसे “दशमी युक्त एकादशी” कहा जाता है। कई शास्त्रीय परंपराएँ ऐसी एकादशी को व्रत के लिए अशुद्ध मानती हैं। कारण यह कि व्रत-तिथि की शुद्धता सूर्योदय के साथ मानी जाती है; यदि सूर्योदय पर दशमी का योग रह जाए तो एकादशी का व्रत उस दिन नहीं रखा जाता। इस सिद्धांत के आग्रह से कुछ परंपराएँ उस दिन का व्रत टालकर अगले दिन रखती हैं।

“दशमी युक्त” से परहेज का तर्क

धर्मशास्त्रों में व्रत-फल का रहस्य तिथि-शुद्धि में निहित बताया गया है। प्राचीन व्याख्याओं का सार यह कि दशमी का अंश यदि एकादशी के सूर्योदय में समा जाए, तो व्रत का सांकेतिक दोष माना जाता है। कई ग्रंथ और आचार्य ऐसे दिन उपवास को फल-क्षीण मानते हैं, क्योंकि व्रत की प्रधानता सूर्य-संयुक्त एकादशी पर टिकी है। इसीलिए “दशमी युक्त एकादशी” के दिन व्रत से बचने और अगली शुद्ध स्थित एकादशी को चुनने का विधान मिलता है।

“द्वादशी युक्त” का महात्म्य

वैष्णव आचार्यों की परंपरा में “द्वादशी युक्त एकादशी” को मोक्षप्रदा और सर्वपापहरिणी कहा गया है। तर्क यह कि जब एकादशी का प्रभाव अगले दिन सूर्योदय तक बना रहता है, तब रात का जागरण, संकीर्तन और प्रातःकालीन सात्त्विक पारण सुगठित क्रम में संपन्न होता है। कई परंपराएँ इसे “व्रत की सिद्धि” का आदर्श मानती हैं- क्योंकि व्रत, जागरण और पारण तीनों क्रियाएँ तिथि-संयोग के अनुशासन में आती हैं।

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डिस्क्लेमर :इस लेख में प्रस्तुत धार्मिक तिथि, पूजा-विधि और पारंपरिक मान्यताएँ विभिन्न पंचांगों, वैष्णव–स्मार्त परंपराओं और लोक-विश्वासों पर आधारित हैं। तिथि एवं पारण समय क्षेत्रानुसार भिन्न हो सकते हैं। पाठकों से अनुरोध है कि अपने स्थानीय पुरोहित, मठ-मंदिर या विश्वसनीय पंचांग के अनुसार अंतिम निर्णय लें। इस सामग्री का उद्देश्य केवल जानकारी प्रदान करना है; किसी भी प्रकार का धार्मिक मत थोपने या विवाद उत्पन्न करने का इरादा नहीं है।

 

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