भलुअनी:शौचालय नहीं, तो ससुराल नहीं: सम्मान और स्वच्छता की सच्ची लड़ाई
देवरिया जिले के भलुअनी नगर पंचायत से सामने आई यह घटना समाज को झकझोरने वाली है। यहां एक नवविवाहिता ने ससुराल में शौचालय न होने के कारण मायके लौटने का कठिन निर्णय लिया। गरीबी और मजबूरी से जूझता पति मेहनत-मजदूरी कर परिवार का पालन कर रहा है, लेकिन सीमित संसाधन उसकी राह में बाधा बने हुए हैं। महिला का यह फैसला जिद नहीं, बल्कि स्वच्छता, सुरक्षा और आत्मसम्मान की मांग है। यह कहानी बताती है कि स्वच्छ भारत केवल योजना नहीं, बल्कि परिवार, रिश्तों और सम्मान को बचाने की आवश्यकता है।
भलुअनी (देवरिया)। साल 2017 में आई चर्चित फिल्म ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ को देखने के बाद बहुतों ने सोचा था कि यह कहानी केवल परदे तक ही सीमित रहेगी। लेकिन देवरिया जिले के नगर पंचायत भलुअनी से सामने आई एक सच्ची-सी लगने वाली घटना बताती है कि स्वच्छता और सम्मान की यह लड़ाई आज भी ज़मीनी हकीकत बनी हुई है।
नगर पंचायत भलुअनी के वार्ड संख्या 4, भगत सिंह नगर में रहने वाले एक साधारण युवक राजू कुशवाहा (काल्पनिक नाम ) की शादी फरवरी 2023 में बरहज क्षेत्र के एक गांव निवासी कुसुम देवी (काल्पनिक नाम ) से हुई थी। सपनों और उम्मीदों के साथ नई दुल्हन ससुराल आई, लेकिन जल्द ही उसे उस कमी का अहसास हुआ, जो उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को मुश्किल बना रही थी-घर में शौचालय का न होना।
शुरुआत में कुसुम ने हालात को समझने की कोशिश की। उसने सोचा, “गरीबी है, आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा।” लेकिन खुले में शौच जाने की मजबूरी, सुबह-शाम का डर और असहजता, और एक महिला होने के नाते सम्मान पर पड़ता असर उसे भीतर ही भीतर तोड़ने लगा।
राजू कुशवाहा नगर में सुबह-सुबह ठेला लगाकर ब्रेड, पाव और रोटी बेचता है। दिन भर की मेहनत के बाद जो थोड़ी-बहुत कमाई होती है, उसी से घर का चूल्हा जलता है। संसाधनों की कमी के कारण वह चाहकर भी शौचालय का निर्माण नहीं करा सका। इसी बीच दंपती की एक नन्ही-सी बेटी पायल (काल्पनिक नाम ) ने जन्म लिया, जिसने घर में खुशियां तो बढ़ाईं, लेकिन जिम्मेदारियां भी कई गुना हो गईं।
करीब सात महीने तक ससुराल में रहने के बाद कुसुम ने आखिरकार एक कठिन फैसला लिया। वह मायके चली गई और जाते समय उसने साफ शब्दों में कह दिया- “जब तक घर में शौचालय नहीं बनेगा, तब तक मैं वापस नहीं आऊंगी।” राजू कई बार पत्नी को मनाने मायके गया। हाथ जोड़कर, आंखों में आंसू लिए उसने समझाया कि वह कोशिश कर रहा है, हालात से लड़ रहा है। लेकिन कुसुम का जवाब हर बार वही रहा-यह जिद नहीं, आत्मसम्मान और सुरक्षा का सवाल है।
यह कहानी केवल पति-पत्नी के बीच का मतभेद नहीं है, बल्कि समाज को आईना दिखाती है। कुसुम का निर्णय बताता है कि आज की महिलाएं समझौता नहीं, सम्मान चाहती हैं। वहीं राजू की मेहनत और संघर्ष यह सिखाता है कि गरीबी अपराध नहीं, लेकिन गरीबी से लड़ने के लिए सहारा ज़रूरी है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि ऐसे मामलों में प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि जरूरतमंद परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिले। यदि समय रहते मदद मिल जाए, तो न सिर्फ एक घर में शौचालय बनेगा, बल्कि एक परिवार भी फिर से जुड़ सकेगा। यह कहानी दर्द भी देती है, सोचने पर मजबूर भी करती है और साथ ही प्रेरणा भी देती है-कि स्वच्छता केवल सुविधा नहीं, सम्मान है। और जब सम्मान मिलेगा, तभी रिश्ते भी सुरक्षित रहेंगे।
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