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“भोजपुरी सिनेमा क्यों खो बैठा अपना सुनहरा दौर?”

"विदेशिया से नदिया के पार तक… और अब अश्लीलता के आरोप","गांव की माटी से मसाले तक: भोजपुरी फिल्मों की दुर्दशा".

  • “गंगा मईया से अश्लीलता तक: भोजपुरी सिनेमा का सफर और संकट”
  • “भोजपुरी फिल्मों की गिरती साख: परिवार से कटते परदे की कहानी”
  • “एक जमाने का गौरव, आज बदनामी का कारण: भोजपुरी सिनेमा”
  • “बदलता भोजपुरी सिनेमा: संस्कृति की जगह अश्लीलता का बोलबाला”

भोजपुरी सिनेमा एक दौर में गांव की खुशबू, लोकगीतों की मिठास और रिश्तों की गहराई का आईना हुआ करता था। लेकिन आज वही सिनेमा अश्लीलता और मसाले के आरोपों में घिरकर अपनी पहचान और लोकप्रियता खो बैठा है। स्थिति यह है कि निर्माता का लगाया हुआ पैसा तक निकलना मुश्किल हो रहा है और पारिवारिक दर्शक वर्ग पूरी तरह कट चुका है।

स्वर्णिम दौर की चमक

भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत 1963 में गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ाइबो से हुई थी। इस फिल्म ने सिर्फ भोजपुरी ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज में भावनाओं की गहरी छाप छोड़ी। इसके बाद लागी नहीं छूटे राम (1963), विदेशिया (1968), नदिया के पार (1982) जैसी कालजयी फिल्मों ने भोजपुरी को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इन फिल्मों में गांव की माटी, खेत-खलिहानों की गंध और पारिवारिक मूल्यों की गहरी झलक देखने को मिलती थी। यही कारण था कि परिवार के हर सदस्य गर्व से सिनेमाघर जाकर भोजपुरी फिल्में देखते थे।

संकट की शुरुआत

सन् 2000 के बाद भोजपुरी सिनेमा ने एक नया मोड़ लिया। सासुर बड़ा पइसावाला (2004) जैसी फिल्मों ने व्यावसायिक सफलता जरूर पाई, लेकिन साथ ही सिनेमा पर अश्लीलता की छाया भी पड़ने लगी। उसके बाद आई कई फिल्में—लैला मजनू, हॉट गर्लफ्रेंड, प्यार तो होना ही था, और सैकड़ों तथाकथित “मसाला फिल्में”—ने भोजपुरी इंडस्ट्री की छवि धूमिल कर दी। इन फिल्मों में गीत-संगीत से लेकर संवादों तक द्विअर्थी और अशोभनीय सामग्री हावी रही।

परिवार से कटाव

भोजपुरी फिल्मों का सबसे बड़ा आकर्षण यही था कि इन्हें पूरा परिवार साथ बैठकर देख सकता था। लेकिन बीते डेढ़-दो दशकों में कथानकों में हिंसा, अश्लील नृत्य और बेहूदा संवादों के बढ़ते प्रयोग ने परिवारों को सिनेमाघरों से दूर कर दिया। आज हाल यह है कि भोजपुरी फिल्मों के दर्शक घटते जा रहे हैं और निर्माता निवेश करने से कतराने लगे हैं। हालात इतने बिगड़े कि आज बड़ी संख्या में दर्शक टीवी और ओटीटी पर दक्षिण भारतीय फिल्में देखना ज्यादा पसंद करते हैं। यही वजह है कि भोजपुरी फिल्मों की आय घट गई और कई बार निर्माता-निर्देशक अपने लगाए पैसे भी वापस नहीं निकाल पा रहे।

अन्य क्षेत्रीय सिनेमा से तुलना

जहां भोजपुरी सिनेमा गिरावट की ओर बढ़ा, वहीं दक्षिण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने अपनी साख मजबूत की। बाहुबली, पुष्पा और केजीएफ जैसी फिल्मों ने न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया भर में लोकप्रियता हासिल की। बंगाली और उड़िया फिल्म इंडस्ट्री भी लगातार कलात्मक फिल्मों और सार्थक कथानकों के लिए जानी जा रही हैं। इसके विपरीत भोजपुरी सिनेमा सिर्फ तात्कालिक मनोरंजन और उत्तेजना पर आधारित फिल्मों में उलझकर रह गया।

सुधार की राह

भोजपुरी सिनेमा की हालत सुधारने के लिए ज़रूरी है कि वह अपने सुनहरे दौर की ओर लौटे। गांव की कहानियां, सामाजिक रिश्ते, लोकगीत और परंपरा उसकी सबसे बड़ी ताकत रहे हैं। यदि निर्माता-निर्देशक पटकथा, संवाद और तकनीकी स्तर पर ध्यान दें, तो भोजपुरी फिल्में फिर से खोई हुई साख पा सकती हैं।

दर्शकों और समाज की उम्मीदें

भोजपुरी समाज और दर्शकों की अपेक्षा अब भी वही है—साफ-सुथरा, मनोरंजक और संस्कृति से जुड़ा सिनेमा। दर्शक चाहते हैं कि भोजपुरी फिल्में फिर से गांव की कहानियों, रिश्तों की मिठास और लोकगीतों की विरासत को परदे पर उतारें। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भोजपुरी सिनेमा ने पटकथा, संवाद और तकनीक पर ध्यान दिया तथा परिवारिक मूल्यों को केंद्र में रखा, तो वह फिर से अपने सुनहरे दौर में लौट सकता है।

निष्कर्ष

भोजपुरी सिनेमा का सफर गांव की माटी से शुरू होकर आज मसाले और अश्लीलता तक पहुंच गया है। यह वही सिनेमा है जिसने कभी गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ाइबो और नदिया के पार जैसी कालजयी रचनाएं दी थीं। आज ज़रूरत है कि इंडस्ट्री अपनी जड़ों की ओर लौटे और परिवार व समाज के लिए सम्मानजनक सिनेमा बनाए। तभी भोजपुरी फिल्मों का खोया गौरव वापस आ सकेगा।

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