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सरयू नहर से और समृद्ध होगी कालानमक की खेती

जिन जिलों में मिली है सरयू नहर परियोजना की सौगात, सभी के पास है कालानमक की जीआई.खेतों के लिए भरपूर पानी मिलने से इन जिलों के किसान अब और होंगे मालामाल-खुशहाल .

  • गिरीश पांडेय

लखनऊ । यकीनन सरयू नहर परियोजना कालानमक धान का कायाकल्प करेगी। नहर से खेतों को भरपूर पानी मिलेगा तो इसकी खेती और समृद्ध होगी और साथ ही समृद्ध होंगे अन्नदाता किसान। जी हां! इत्तेफाक से सरयू नहर से पूर्वांचल के जिन नौ जिलों (बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा, सिद्धार्थनगर, बस्ती, संतकबीरनगर, गोरखपुर, महराजगंज) को सिंचाई की सुविधा मिलेगी, उन सबके लिए कालानमक धान को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) हासिल है। यूं तो प्रदेश सरकार ने कालानमक को सिद्धार्थनगर का एक जिला- एक उत्पाद (ओडीओपी) घोषित किया है, पर जीआई इस बात की प्रतीक है कि समान कृषि जलवायु वाले जिलों में पैदा होने वाले कालानमक धान की खूबियां स्वाद, सुगंध और पौष्टिकता एक जैसी होगी।

कालानमक को पूर्वांचल के 11 जिलों (गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, महराजगंज, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा) के लिए जीआई प्राप्त है। इनमें से बहराइच एवं सिद्धार्थनगर नीति आयोग के आकांक्षात्मक जिलों की सूची में शामिल हैं। खूबियों से भरपूर कालानमक की खेती कर इन जिलों के भी किसान भी मालामाल-खुशहाल होंगे। डबल इंजन (मोदी-योगी) की सरकार की यही मंशा भी है। यही वजह है कि कृषि निवेश के लिए सबसे जरूरी सिंचाई की सुविधा पर दोनों सरकारों ने सर्वाधिक फोकस किया। करीब पांच दशक बाद सरयू नहर को पूरी कर सरकार ने अपनी इस प्रतिबद्धता को साबित भी किया।

छह हजार साल पुराना है कालानमक का इतिहास

रही कालानमक के इतिहास और खूबियों की बात तो इसका इतिहास करीब छह हजार साल पुराना है। माना जाता है कि यह भगवान बुद्ध का प्रसाद है। तथागत बुद्ध ने कालानमक चावल से बनी खीर को खुद ग्रहण किया था और अपने शिष्यों में प्रसाद स्वरूप वितरित किया था। अक्टूबर माह में कुशीनगर के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के लोकार्पण के दौरान बौद्ध देशों से आए महानुभावों को तथागत का यह प्रसाद उपहार स्वरूप भेंट भी किया गया था।

खुश्बू में है बेमिसाल

कालानमक का खुश्बू में कोई जोड़ नहीं है। फसल जब खेत में रहती है तो उधर से गुजरने वालों को इसकी खुश्बू बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है। फसल जब कटकर खलिहान में आती है तो खलिहान और उसके आसपास का इलाका महक उठता है। पकाने के दौरान इसकी महक से पड़ोसी भी जान जाते हैं कि अमुक के घर कालानमक नमक चावल बन रहा है।

जिंक व आयरन के नाते पौष्टिकता से भी भरपूर

तथागत का यह प्रसाद सिर्फ खुश्बू में ही बेमिसाल नहीं है। इसकी अन्य खूबियां इसे धान की बाकी प्रजातियों से बहुत आगे रखती हैं। मसलन इसमें बाकी चावलों की तुलना में जिंक और ऑयरन की मात्रा अधिक है। ग्लाइसिमिक इंडेक्स कम होने के नाते मधुमेह के रोगियों के लिए भी मुफीद है। एक चावल में इतनी खूबियों की वजह से डबल इंजन (योगी-मोदी) की सरकार भी इसकी मुरीद है।

विटामिन ए से भरपूर एकमात्र प्राकृतिक चावल

कालानमक धान (चावल) की एकमात्र ऐसी प्राकृतिक प्रजाति है जिसमें विटामिन ए भी मिला है। रीजनल फ़ूड रिसर्च एंड एनालिसिस सेंटर लखनऊ की तरफ से किए गए अनुसंधान में यह जानकारी मिली है। यह अनुसंधान कालानमक के संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रही संस्था पीआरडीएफ की पहल पर किया गया। 26 नवंबर 2021 को संस्था ने जो रिपोर्ट दी उसके मुताबिक प्रति 100 ग्राम में विटामिन ए (बीटा कैरोटीन) की मात्रा 0.42 ग्राम और कुल कैरोटीनॉयडस की मात्रा 0. 53 ग्राम रही।

प्रदेश और केंद्र का ओडीओपी उत्पाद है कालानमक

चूंकि यह पूर्वांचल की फसल है, इसलिए स्वाभाविक रूप से योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने के पहले से इसकी खूबियों से परिचित थे। यही वजह है कि उन्होंने जनवरी 2018 में उत्तर प्रदेश की स्थापना दिवस पर एक जिला-एक उत्पाद /वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) के नाम से जिस बेहद महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की उसमें कालानमक को सिद्धार्थनगर जिले की ओडीओपी में शामिल किया गया। मुख्यमंत्री की ओडीओपी योजना के साथ केंद्र सरकार कालानमक की मुरीद है। पिछले केंद्रीय बजट के दौरान संसद में इसकी चर्चा भी हुई थी। केंद्र की मंशा तो हर महत्वपूर्ण विभाग का ओडीओपी घोषित करने की है। कृषि और बागवानी फसलों की तो हो भी चुकी है। इस क्रम में करीब सालभर पहले देशभर के कृषि उत्पादों की घोषणा की थी। इसमें कालानमक को छह जिलों गोरखपुर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, संतकबीरनगर, महराजगंज और बलरामपुर का ओडीओपी घोषित किया गया।

पूरा पूर्वांचल कालानमक के खुश्बू और स्वाद का मुरीद
कालानमक पूर्वांचल के हर किसी के लिए जाना-पहचाना नाम है। पूर्वांचल देश का सबसे सघन आबादी वाला इलाका है। प्राचीनकाल से खेतीबाड़ी यहां के लोगों की रोजी-रोटी का मुख्य जरिया रहा है। जमीन पर जरूरत से अधिक भार होने के नाते बहुत पहले से यहां के लाखों लोग रोजी-रोटी की तलाश में देश के प्रमुख शहरों में नहीं, विदेशों में जाकर बस गए। परदेशी होकर भी जिन चीजों को वह नहीं भूले उसमें कालानमक चावल भी है। हर किसी को कालानमक चाहिए। शर्त यह है कि इसकी शुद्धता की गारंटी हो। इनमें से बहुत से लोग तो ऐसे हैं जिनको कालानमक की शुद्धता के प्रति भरोसा हो तो उनके लिए इसकी कीमत कोई खास मायने नहीं रखती।

ब्रांडिंग से रकबा बढ़कर 50 हजार हेक्टेयर तक पहुंचा
डबल इंजन की सरकार ने कालानमक को ओडीओपी में शामिल कर इसकी जबरदस्त ब्रांडिंग की। नतीजतन इस साल इसकी बम्पर पैदावार हुई है। कालानमक पर करीब चार दशकों से काम रहे अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाले धान प्रजनक डॉक्टर आरसी चौधरी के मुताबिक देरी से होने वाली इस प्रजाति के लिए देर से होने वाली बारिश से खासा लाभ हुआ। इससे प्रति हेक्टेयर औसत उपज भी करीब क्विंटल रही। रकबा बढ़कर 50 हजार हेक्टयर हो गया।

“किसानों की खुशहाली डबल इंजन सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसी के मद्देनजर दोनों सरकारों ने कालानमक को ओडीओपी में शामिल किया। जिन जिलों के लिए कालानमक को जीआई मिली है, उनमें से तकरीबन सभी जिले सरयू नहर से भी आच्छादित हैं। करीब साढ़े चार दशक बाद यह नहर परियोजना पूरी हुई। उत्पादक क्षेत्रों में भरपूर पानी मिलने से इनमें कालानमक की संभावनाएं और बेहतर हो जाएंगी। इससे लाखों किसान लाभान्वित होंगे

नवनीत सहगल-अपर मुख्य सचिव-सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग

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