मरीजों के लिए डॉक्टर नहीं, उम्मीद थे डॉ. अश्विनी जैन; जानिए क्यों आज भी याद करता है बनारस
वाराणसी के लोकप्रिय चिकित्सक डॉ. अश्विनी कुमार जैन की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने अपने मधुर व्यवहार, संवेदनशीलता और सेवाभाव से हजारों मरीजों का विश्वास जीता। वर्ष 1987 में शुरू हुई उनकी क्लिनिक चिकित्सा के साथ अपनत्व और उम्मीद का प्रतीक बनी। कोविड काल में मरीजों की सेवा करते हुए 22 अक्टूबर 2020 को उनका निधन हो गया। आज उनके पुत्र डॉ. हर्षित जैन और पुत्रवधू डॉ. आंचल जैन उनके दिखाए रास्ते पर चलते हुए मरीजों को बेहतर उपचार और आत्मीयता प्रदान कर रहे हैं।
वाराणसी। चिकित्सा के संसार में कुछ डॉक्टर अपनी विशेषज्ञता के लिए पहचाने जाते हैं, कुछ अपनी उपलब्धियों के लिए, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनकी पहचान उनकी डिग्री या क्लिनिक तक सीमित नहीं रहती। वे अपने व्यवहार, अपनी संवेदनशीलता और अपने शब्दों से लोगों के जीवन में ऐसी जगह बना लेते हैं, जिसे समय भी मिटा नहीं पाता। डॉ. अश्विनी कुमार जैन ऐसे ही चिकित्सक थे। उनके लिए चिकित्सा महज एक पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का माध्यम थी। उनके पास आने वाला मरीज केवल दवा लेकर नहीं लौटता था, वह अपने साथ उम्मीद, हिम्मत और मन का सुकून भी लेकर जाता था।
वाराणसी की गलियों में आज भी उनके व्यक्तित्व को याद करने वाले लोग उस अपनत्व भरे अंदाज का जिक्र करते हैं, जिसमें बीमारी से जूझते मरीज को सबसे पहले यह भरोसा मिलता था कि वह अकेला नहीं है। मलदहिया स्थित उनकी क्लिनिक में वर्षों तक मरीजों की भीड़ उमड़ती रही। यह भीड़ केवल चिकित्सकीय परामर्श के लिए नहीं होती थी, बल्कि उस भरोसे के लिए भी थी, जो डॉ. जैन ने अपने व्यवहार से अर्जित किया था। उनके पास पहुंचने वाला व्यक्ति अक्सर बीमारी से अधिक उसकी आशंकाओं से परेशान होता था, लेकिन डॉक्टर साहब से दो बातें कर लेने के बाद उसके चेहरे पर राहत दिखाई देने लगती थी।
जब डॉक्टर के शब्द बन जाते थे आधी बीमारी का इलाज
डॉ. अश्विनी जैन की सबसे बड़ी विशेषता थी- मरीज की परेशानी को समझना और उसे सहज कर देना। गंभीर रिपोर्ट हाथ में लिए घबराए हुए परिजन जब उनके सामने पहुंचते, तो उनकी चिंता स्वाभाविक थी। किसी रिपोर्ट में कोई मान असामान्य होता, किसी जांच में कुछ बढ़ा या घटा हुआ दिखाई देता, तो परिवार के मन में अनगिनत आशंकाएं जन्म लेने लगतीं। ऐसे में डॉ. जैन मरीज की नब्ज थामते और अपने चिरपरिचित बनारसी अंदाज में कहते-
“क्या हो गया बाबा! अरे, कुछ नहीं, सब ठीक हो जाएगा। हम काहे के लिए हैं!”
इसके बाद परिजन रिपोर्ट दिखाते हुए अपनी चिंता जाहिर करते, तो वे बड़े सहज भाव से कहते-
“बेटवा, यह हमारा सिरदर्द है, तुम्हारा नहीं। तुम बाबा की सेवा करो, बाकी सब हम पर छोड़ दो।”
उनके ये शब्द केवल सांत्वना नहीं थे। उनमें एक चिकित्सक का आत्मविश्वास, एक अभिभावक का स्नेह और एक सेवाभावी इंसान का समर्पण झलकता था। मरीज और उसके परिजनों के चेहरे पर लौटती राहत इस बात का प्रमाण होती थी कि इलाज की शुरुआत कई बार दवा से पहले भरोसे से होती है।
निश्चित ही, बीमारी का उपचार जांच, सही निदान और उचित चिकित्सा से होता है, लेकिन बीमारी से लड़ने का साहस मरीज को संवेदनशील व्यवहार से भी मिलता है। डॉ. अश्विनी जैन इस मानवीय पक्ष को भली-भांति समझते थे। वे जानते थे कि बीमार शरीर के साथ-साथ चिंतित मन को भी सहारे की जरूरत होती है। यही वजह थी कि उनके लिए हर मरीज एक केस नहीं, बल्कि एक इंसान था।
1987 में शुरू हुआ सफर, भरोसे की मिसाल बन गई क्लिनिक
वर्ष 1987 में स्थापित उनकी क्लिनिक ने धीरे-धीरे वाराणसी के चिकित्सा जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। इस पहचान की नींव केवल वर्षों के अनुभव पर नहीं, बल्कि अनुशासन, सहज व्यवहार और मरीजों के प्रति समर्पण पर टिकी थी।
डॉ. जैन समय के बेहद पाबंद थे। उनकी दिनचर्या व्यवस्थित रहती और मरीजों को देखने का क्रम भी अनुशासन के साथ चलता था। व्यस्तता कितनी भी हो, वे मरीज को यह एहसास नहीं होने देते थे कि उनके पास समय की कमी है। कई बार लगातार मरीज देखते-देखते भोजन का समय निकल जाता, लेकिन उनके चेहरे पर वही सहज मुस्कान बनी रहती।
उनका मानना था कि डॉक्टर के पास आने वाला व्यक्ति केवल बीमारी का उपचार कराने नहीं आता, वह अपनी चिंता किसी ऐसे व्यक्ति के सामने रखना चाहता है, जिस पर उसे विश्वास हो। इसलिए वे मरीज की बात ध्यान से सुनते, उसकी परेशानी समझते और उसे आश्वस्त करने का प्रयास करते थे।
आज जब चिकित्सा सेवाओं में तकनीक, जांच और आधुनिक सुविधाओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है, डॉ. जैन का जीवन यह याद दिलाता है कि चिकित्सा की आत्मा आज भी संवेदना, संवाद और विश्वास में ही बसती है।
लोकप्रियता बहुत थी, लेकिन व्यक्तित्व में रत्ती भर अहंकार नहीं
डॉ. अश्विनी कुमार जैन पूर्वांचल के लोकप्रिय चिकित्सकों में गिने जाते थे, लेकिन लोकप्रियता ने उनके स्वभाव को कभी कठोर नहीं बनाया। वे खांटी बनारसी थे। बनारस की सहजता, मस्ती, अपनापन और जिंदगी को खुलकर जीने का अंदाज उनके व्यक्तित्व में रचा-बसा था।
वे एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के चिकित्सक थे, लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा सहित दूसरी विधाओं की उपयोगी बातों के प्रति भी सम्मान रखते थे। किसी भी क्षेत्र में अच्छी बात दिखाई देती, तो उसे स्वीकार करने में उन्हें संकोच नहीं होता था। उनके लिए महत्वपूर्ण यह था कि मरीज को सही सलाह और बेहतर उपचार मिले।
परिवार के प्रति भी उनका जुड़ाव उतना ही गहरा था। व्यस्त दिनचर्या के बावजूद वे अपनों के लिए समय निकालते थे। कभी क्लिनिक से देर रात लौटने के बाद मन हुआ, तो चप्पल पहनकर दोस्तों के साथ गोदौलिया की सैर पर निकल पड़े। सड़क किनारे लक्ष्मी चाय वाले के यहां बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ मित्रों से बतकही करना उन्हें अच्छा लगता था।
उस समय उनके चेहरे पर जो निश्छल मुस्कान होती थी, उसे देखकर सहज ही विश्वास नहीं होता था कि यही वह चिकित्सक हैं, जिनके पास प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग अपनी बीमारी और परेशानियां लेकर पहुंचते हैं। उनके भीतर लोकप्रिय डॉक्टर की गंभीरता भी थी और एक आम बनारसी की बेफिक्री भी। यही सहजता उन्हें लोगों के और करीब ले आती थी।
सेवा का दूसरा नाम था ‘संकल्प’
डॉ. अश्विनी जैन का व्यक्तित्व केवल क्लिनिक तक सीमित नहीं था। समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी का भाव उन्हें जरूरतमंदों के बीच भी ले जाता था। वे वाराणसी की अग्रणी सामाजिक संस्था ‘संकल्प’ के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। संस्था के माध्यम से क्षय रोगियों की चिकित्सा और सहायता के लिए चलाए जा रहे ‘क्षय मुक्त काशी, निरोग काशी’ अभियान से उनका गहरा जुड़ाव रहा। यह अभियान पिछले 26 वर्षों से चलाए जाने का उल्लेख करता है, जो समाज के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का परिचायक है।
टीबी जैसी बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए चिकित्सा के साथ जागरूकता, समय पर उपचार और निरंतर सहयोग की आवश्यकता होती है। डॉ. जैन इस आवश्यकता को समझते थे। जरूरतमंद मरीजों की सहायता, निःशुल्क चिकित्सा शिविरों और सेवा कार्यों के प्रति उनका समर्पण उनके मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता था।
उनका विश्वास था कि आर्थिक कठिनाई किसी व्यक्ति के उपचार में बाधा नहीं बननी चाहिए। बीमारी से संघर्ष कर रहे व्यक्ति को केवल दवा ही नहीं, बल्कि यह भरोसा भी मिलना चाहिए कि समाज उसके साथ खड़ा है। वे सेवा को किसी प्रदर्शन का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी मानते थे।
उनके लिए किसी जरूरतमंद की मदद करना कोई असाधारण काम नहीं था। यह उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था। यही कारण है कि चिकित्सा के क्षेत्र में उनकी पहचान के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों में उनके योगदान को भी सम्मान के साथ याद किया जाता है।
तीन भाइयों का स्नेह और संस्कारों से जुड़ा परिवार
डॉ. अश्विनी कुमार जैन का जन्म वाराणसी के एक प्रतिष्ठित आभूषण व्यवसायी परिवार में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय गुलाल चंद जैन अपने समय के जाने-माने व्यापारी थे। परिवार का अग्रवाल और जैन समाज में सम्मान था। हालांकि, डॉ. जैन की शिक्षा पूरी होने से पहले ही पिता का निधन हो गया।
तीन भाइयों-अनिल कुमार जैन, आलोक जैन और अश्विनी कुमार जैन के बीच स्नेह और सहयोग का संबंध रहा। बड़े भाइयों अनिल कुमार जैन और आलोक जैन ने आभूषण व्यवसाय को आगे बढ़ाया, जबकि अश्विनी कुमार जैन ने चिकित्सा को अपने जीवन का मार्ग बनाया। अलग-अलग जिम्मेदारियों के बावजूद पारिवारिक आत्मीयता उनके रिश्तों की विशेषता रही।
डॉ. अश्विनी जैन का जीवन इस बात की मिसाल था कि परिवार से मिले संस्कार व्यक्ति के व्यक्तित्व को किस तरह आकार देते हैं। सेवा, विनम्रता और रिश्तों के प्रति सम्मान उनके व्यवहार में सहज रूप से दिखाई देता था।
कोविड काल: जब कर्तव्य के आगे अपने जीवन की चिंता भी छोटी पड़ गई
वर्ष 2020 में कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को भय और अनिश्चितता से भर दिया था। वाराणसी भी इस संकट से अछूता नहीं था। अस्पतालों पर दबाव था, मरीज परेशान थे और हर परिवार संक्रमण के खतरे से आशंकित था। ऐसे समय में डॉ. अश्विनी जैन ने अपनी चिकित्सकीय जिम्मेदारी से पीछे हटने के बजाय मरीजों की सेवा जारी रखी।
उनके लिए यह समय केवल अपनी सुरक्षा के बारे में सोचने का नहीं, बल्कि जरूरतमंदों के साथ खड़े रहने का भी था। वे मरीजों का उपचार करते रहे और अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहे। लेकिन जिस महामारी के बीच वे दूसरों को राहत देने में जुटे थे, आखिरकार उसी संक्रमण ने उन्हें भी अपनी चपेट में ले लिया।
22 अक्टूबर 2020 को डॉ. अश्विनी कुमार जैन इस दुनिया से विदा हो गए। उनके जाने से परिवार ने अपना प्रिय सदस्य खोया, मरीजों ने अपना भरोसेमंद चिकित्सक और समाज ने एक संवेदनशील सेवाभावी व्यक्तित्व। उनकी अनुपस्थिति एक ऐसी रिक्तता छोड़ गई, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है।
लेकिन कुछ लोगों की विदाई उनके जीवन के प्रभाव को समाप्त नहीं करती। वे अपने काम, अपने संस्कारों और उन लोगों के जीवन में जीवित रहते हैं, जिन्हें उन्होंने कभी सहारा दिया था। डॉ. जैन की स्मृतियां भी आज उसी रूप में जीवित हैं।
पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे डॉ. हर्षित जैन और डॉ. आंचल जैन
डॉ. अश्विनी कुमार जैन के जीवन की सबसे भावुक और प्रेरणादायक कड़ी यह है कि उनके जाने के बाद भी मरीजों के प्रति सेवा और संवेदना का सिलसिला थमा नहीं। उनके पुत्र डॉ. हर्षित जैन और पुत्रवधू डॉ. आंचल जैन अब उसी क्लिनिक में उनके दिखाए रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।
उनके लिए यह केवल एक क्लिनिक का संचालन नहीं, बल्कि पिता की वर्षों की साधना, मरीजों के विश्वास और परिवार के सेवा-संस्कारों को आगे ले जाने की जिम्मेदारी है। मरीजों के प्रति अपनापन, उनकी समस्याओं को ध्यान से सुनना और उन्हें सहज महसूस कराना इस विरासत के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
आज भी मरीज उपचार के लिए आते हैं और संतुष्ट होकर लौटते हैं। उनके लिए यह राहत महत्वपूर्ण है कि बीमारी की चिंता लेकर आने पर उनकी बात सुनी जाती है, उनकी परेशानी को समझा जाता है और उन्हें उचित चिकित्सकीय सलाह मिलती है। उपचार के बाद संतोष और विश्वास के साथ लौटता मरीज इस बात का संकेत है कि डॉ. अश्विनी जैन ने जिस मानवीय चिकित्सा परंपरा की नींव रखी थी, वह आगे बढ़ रही है।
डॉ. हर्षित जैन और डॉ. आंचल जैन के सामने अपने वरिष्ठ की स्मृतियों से जुड़ी अपेक्षाएं भी हैं और मरीजों का विश्वास बनाए रखने की जिम्मेदारी भी। पिता की विरासत को सच्चे अर्थों में आगे बढ़ाना केवल उनके नाम को जीवित रखना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को व्यवहार में उतारना है, जिनके कारण लोग उन्हें आज भी याद करते हैं।
एक चिकित्सक के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी कि उसके जाने के बाद भी उसके मरीजों को उसी परिवार में अपनापन, भरोसा और सेवा का भाव मिलता रहे!
डॉ. अश्विनी जैन के बड़े भाई अनिल जैन और आलोक जैन भी परिवार की इस यात्रा में साथ खड़े रहे हैं। अश्विनी जैन का जीवन परिवार के लिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है-कि जीवन की सार्थकता केवल अपने लिए उपलब्धियां जुटाने में नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में है।
डॉ. अश्विनी जैन: एक नाम नहीं, चिकित्सा में मानवीय संवेदना की पहचान
आज डॉ. अश्विनी कुमार जैन हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी उन सभी चिकित्सकों के लिए प्रेरणा है, जो चिकित्सा को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि सेवा मानते हैं। उन्होंने अपने व्यवहार से यह सिद्ध किया कि मरीज को स्वस्थ करने की प्रक्रिया में दवा के साथ विश्वास, विशेषज्ञता के साथ विनम्रता और उपचार के साथ संवेदना भी जरूरी है।
उनकी सबसे बड़ी पूंजी कोई भव्य प्रतिष्ठान नहीं थी। उनकी असली पूंजी वे मरीज थे, जो उनके पास घबराए हुए आते और आश्वस्त होकर लौटते थे। वे परिवार थे, जिन्हें कठिन समय में एक चिकित्सक के रूप में सहारा मिला। वे जरूरतमंद लोग थे, जिनके लिए उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार सेवा का हाथ बढ़ाया।
उनकी जिंदगी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है-चिकित्सा में सफलता केवल बीमारी की पहचान और उपचार तक सीमित नहीं है। एक अच्छा चिकित्सक वह भी है, जो मरीज के मन में उम्मीद जगाए, उसके भय को समझे और उसे सम्मान के साथ उपचार दे।
डॉ. अश्विनी जैन ने अपने जीवन से यही सिखाया। उनके पुत्र डॉ. हर्षित जैन और पुत्रवधू डॉ. आंचल जैन उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। इस अर्थ में उनका जीवन एक व्यक्ति की कहानी भर नहीं, बल्कि एक ऐसी विरासत की कहानी है, जिसमें सेवा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है।
श्रद्धांजलि: कुछ लोग जाते नहीं, अपने व्यवहार में जीवित रहते हैं
यह शब्दांजलि डॉ. अश्विनी कुमार जैन की स्मृति, उनके परिवार, सामाजिक संस्था ‘संकल्प’ और उन तमाम मरीजों को समर्पित है, जिनके जीवन में उन्होंने उपचार के साथ उम्मीद भी जगाई।
समय बीत जाता है, चेहरे स्मृतियों में बदल जाते हैं और आवाजें यादों में गूंजने लगती हैं। लेकिन किसी के कहे वे आत्मीय शब्द, जिन्होंने कठिन समय में हिम्मत दी हो, जीवन भर साथ रहते हैं।
शायद इसीलिए डॉ. अश्विनी जैन को याद करते हुए आज भी उनके मरीजों के मन में वही भाव उठता होगा-काश, डॉक्टर साहब एक बार फिर सामने होते और अपने उसी सहज अंदाज में कहते, “अरे बाबा, घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा!”
क्योंकि कुछ चिकित्सक केवल शरीर का उपचार नहीं करते, वे अपने व्यवहार से जिंदगी पर भरोसा करना सिखाते हैं। डॉ. अश्विनी कुमार जैन ऐसे ही चिकित्सक थे-जिनकी सबसे बड़ी दवा उनका संवेदनशील हृदय था और जिनकी सबसे अमूल्य विरासत आज भी सेवा, विश्वास और मानवता के रूप में जीवित है।



