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अल्ज़ाइमर की संभावना बताएगी कृत्रिम बुद्धि

जल्द ही कृत्रिम बुद्धि किसी व्यक्ति में अल्ज़ाइमर होने के आसार के बारे में पहले ही पता लगा लेगी। आईबीएम की टीम ने लेखन में उपयोग किए गए शब्दों/वाक्यों के पैटर्न से अल्ज़ाइमर के शुरुआती संकेत पहचानने के लिए कृत्रिम बुद्धि को प्रशिक्षित किया है। वैसे तो कई शोध दलों द्वारा मस्तिष्क स्कैन या शारीरिक जांच के डैटा का उपयोग करके अल्ज़ाइमर जैसी संज्ञानात्मक गड़बड़ियों की पूर्व-पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धि को प्रशिक्षित किया जा रहा है। लेकिन यह अध्ययन इस मायने में अलग है कि इसमें प्रशिक्षण के लिए फ्रामिंगहैम हार्ट स्टडी का ऐतिहासिक डैटा लिया गया है। फ्रामिंगहैम हार्ट स्टडी वर्ष 1948 के बाद से अब तक लगभग तीन पीढ़ियों के 14,000 से अधिक लोगों के स्वास्थ्य पर नज़र रखे हुए है।

इस स्टडी में प्रतिभागियों से एक तस्वीर का वर्णन भी लिखवाया गया था। इन वर्णनों की सिर्फ डिजिटल प्रतियां उपलब्ध थी, हस्तलिखित मूल प्रतियां सहेजी नहीं गई थीं।अपने कृत्रिम बुद्धि मॉडल के प्रशिक्षण के लिए शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के द्वारा लिखे गए इन विवरणों का डिजिटल ट्रांस्क्रिप्शन कृत्रिम बुद्धि को पढ़ाया। इस तरह मॉडल ने संज्ञानात्मक क्षति के शुरुआती भाषागत लक्षणों को पहचानना सीखा। जैसे गलत वर्तनी, कुछ शब्दों का बार-बार उपयोग और व्याकरण की दृष्टि से जटिल वाक्यों की जगह सरल वाक्यों का उपयोग। मॉडल ने 70 प्रतिशत सही अनुमान लगाया कि किन प्रतिभागियों को 85 वर्ष की उम्र के पहले अल्ज़ाइमर से सम्बंधित स्मृतिभ्रंश की शिकायत हुई होगी।

एक तो यह घटित हो चुकी घटनाओं के अतीत के डैटा के आधार पर आकलन है। इस मॉडल की कुछ अन्य सीमाएं भी हैं। इस मॉडल में फ्रामिंगहैम स्टडी के मात्र वृद्ध प्रतिभागियों का डैटा शामिल किया गया था जो प्राय: एंग्लो-अमेरिकन गोरे लोग थे। इसलिए संपूर्ण अमेरिका और विश्व पर इन नतीजों का सामान्यीकरण मुश्किल है। इस मॉडल में विश्लेषण के लिए केवल 80 लोगों का डैटा लिया गया था – 40 ऐसे लोगों का जिन्हें अल्ज़ाइमर की समस्या हुई थी और 40 कंट्रोल समूह। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि मॉडल अधिक डैटा पर कैसा प्रदर्शन करेगा। इसके अलावा यह भी सवाल उठता है कि निदान पूर्व, अलग-अलग उम्र पर अल्ज़ाइमर की संभावना का अनुमान क्या इतनी ही सटीकता से लगा पाएगा?

यह मॉडल और भी सटीक हो सकता था यदि इसमें मूल लिखावट को शामिल किया जा सकता। इससे अल्ज़ाइमर की पहचान के कुछ अन्य संकेत शामिल हो जाते। जैसे लिखते समय हाथ हल्का कांपना, कहीं-कहीं प्रिंट और कहीं-कहीं कर्सिव में लिखना और बहुत बारीक अक्षर में लिखना। और यदि मौखिक भाषा का डैटा शामिल किया जाता तो बोलते-बोलते बीच में रुकने जैसे संकेतों को भी पहचाना जा सकता था, जो लेखन से संभव नहीं है। लेखन में सिर्फ साक्षर लोगों का डैटा होता है।

बहरहाल ये मॉडल लोगों के संज्ञानात्मक स्वास्थ्य की निगरानी बिना तकलीफ पहुंचाए कर पाएंगे। हालांकि लोगों की सहमति और डैटा की गोपनीयता का सवाल भी उठेगा क्योंकि हो सकता है कुछ लोग पहले से अपनी बीमारी के बारे में ना जानना चाहें। फिलहाल दोनों मॉडल, मौखिक और डिजिटल पेन की मदद से लिखित, को शामिल करने पर काम चल रहा है। आईबीएम का भी भविष्य में इसी तरह के मॉडल पर काम करने का इरादा है।

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