सेना का शिकार संपादक
के. विक्रम राव
पाकिस्तान के सबसे पुराने बहुसंस्करणीय उर्दू दैनिक ‘जंग’ और उसके लोकप्रिय जिओ टीवी के मुख्य संपादक शकील-उर-रहमान की भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ़्तारी (12 मार्च 2020) स्पष्ट दर्शाती है कि सेनापति जनरल जावेद कमर बाजवा, न कि प्रधान मंत्री खान मोहम्मद इमरान खान, इस इस्लामी जम्हूरियत के वास्तविक मालिक हैं| सरकार के इस तीव्र आलोचक संपादक रहमान पर लगा आरोप पैंतीस साल पुराना है| मियां मोहम्मद नवाज शरीफ ने तब पाकिस्तानी पंजाब के मुख्य मंत्री के नाते लाहौर विकास प्राधिकरण द्वारा (1984) तेरह एकड़ जमीन उन्हें आवंटित करायी थी| इतने दशकों बाद विकास प्राधिकरण ने जाना कि पत्रकारों को भूमि आवंटन की अधिकतम सीमा केवल चार एकड़ है| इतने वर्षों में लाहौर में कई वजीरे आला आये| मगर सरदार उस्मान अहमद खान बुजहर, मुख्य मंत्री, को मामला आज नियम का पता चला| वे इमरान की तहरीके इंसाफ पार्टी के हैं|
फ़िलहाल संपादक रहमान पुलिस हिरासत में हैं| लन्दन में इलाज करा रहे नवाज शरीफ की बेटी मरियम ने इस्लामाबाद हाई कोर्ट में उनकी रिहाई के लिये याचिका दायर की है|
मसला यहाँ न केवल अखबारी आजादी का है, बल्कि पाकिस्तान को फौजी तानाशाही के नियंत्रण से मुक्त कराने वाला भी है| संपादक रहमान के लिये जिओ टीवी और दैनिक ‘जंग’ द्वारा वोटरों की हुकूमत का अभियान ही मात्र मुद्दा है| ‘जंग’ ने जनरल बाजवा को तीन साल की सेवा विस्तार देने का विरोध किया था| जिओ टीवी के एंकर हामिद मीर पर इमरान के लोगों ने कुछ वक्त हुए गोली चलाई थे, वे बच गए| यह आम बात बहुत स्पष्ट है कि पुतले तो इमरान खान हैं, मगर डोर खींचते हैं जनरल बाजवा|
दैनिक ‘जंग’ का इतिहास भारत से जुड़ा हुआ है| एक कश्मीरी युवा मीर खली-उर-रहमान (जन्म गुजरानवाला में) नई दिल्ली 1938 में आ गये थे| वहीँ पढ़ाई की और वहीँ ‘हिंदुस्तान टाइम्स’, ‘इंडियन न्यूज़’ क्रोनिकल’ आदि दैनिकों से प्रेरित होकर उर्दू समाचारपत्र शुरू किया| तब द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो गया था| युवा मीर ने दैनिक का नाम रखा ‘जंग’, जो जिन्नावादी मुसलमान पाठकों के लिए खास था| विभाजन के पश्चात वे कराची आ गये| तब राजधानी कराची में अवध से हिजरत कर गये कई उर्दूदां रहते थे| अख़बार चल निकला| बाद में यह जुल्फिकार अली भुट्टो के परिवार के समीप रहा| सिंध कि सियासत खास वजह थी|
दैनिक जंग प्रबंधन से मेरा निजी साविका रहा है| तब जनाब मीर खली-उर-रहमान प्रधान संपादक थे| अत्यन्त मशहूर एडिटर थे|
तब (मई 1986) मैं अपने दो साथियों के साथ चीन की यात्रा से भारत लौट रहा था| यूएनआई (एर्नाकुलम) के के. मैथ्यू रॉय जो इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट (IFWJ) के प्रधान सचिव थे, और दिल्ली में फाइनेंसियल एक्सप्रेस के विशेष संवाददाता चितरंजन आलवा, मुख्यालय सचिव, और मैं IFWJ अध्यक्ष| कराची में पड़ाव था| वहाँ पाकिस्तान फेडरल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स द्वारा कराची प्रेस क्लब में IFWJ के पदाधिकारियों का स्वागत होना था| रमजान का महीना था| सबके रोजे थे| किन्तु पत्रकार को परहेज कैसा? फिर भी कराची प्रेस क्लब के सदस्यों ने मेरा लिहाज करके शराब नहीं पी| हाँ समोसे स्वादिष्ट थे| उसी रात ‘जंग’ के प्रधान संपादक मीर खली-उर-रहमान ने हमें दावत पर बुलाया| कराची में भारतीय दूतावास के अधिकारी जनाब आफ़ताब सेठ (संत स्टीवेंस के पढ़े और रौशन सेठ के अनुज) ने इस दावत का कार्यक्रम करवाया था ताकि ‘जंग’ कार्यालय में अन्य पाकिस्तानी सहाफियों से वार्ता हो सके| (रौशन सेठ रंगकर्मी रहे और ‘गाँधी’ फिल्म में जवाहरलाल नेहरु की भूमिका अदा की थी|) आफ़ताब सेठ शाकाहारी हो गए थे| मुझे कारण बतया, “ पाकिस्तान में गोश्त का अम्बार देखकर उबकाई आ रही है|” रॉय और आलवा इसाई थे तो मीट से कोई परहेज नहीं था| मीर रहमान साहब ने मेरे लिए विशेष तौर पर बिना लहसुन प्याज के भोजन बनवाया था| मैं अचंभित और आह्लादित था| उस रात साठ साल के मीर साहब भारतीय मतदान प्रणाली और प्रेस आजादी की प्रशंसा कर रहे थे| वे बोले कि संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना भी भारत जैसा लोकतंत्र चाहते थे| मगर सेना ने उनका सपना तोड़ दिया| मेरा निजी मत उनसे भिन्न था| दूसरे दिन हम तीनों भारतीय पत्रकार जिन्ना की मजार देखने गए| हमें पर्यटन विभाग वाले ले गये| मेरे दोनों पत्रकार साथी तो संगमरमर के चबूतरे पर चढ़े| मैं मजार से लगे बगीचे में फूल निहारता रहा| लाखों गैरमुसलमान के हत्यारे, भारत के विभाजक जिन्ना से अपने सेवाग्राम के स्कूली दिनों से ही मेरी अतीव वितृष्णा रही| इस ढोंगी सरबराह को बापू ने अपनी भ्रमित नरमी के चलते कायदे आजम के ख़िताब से नवाजा था| लखनऊ में कई किस्से सुने थे मैंने इस जिन्ना के बारे में| पाकिस्तान के स्थापना दिवस पर (शुक्रवार, 14 अगस्त 1947) जिन्ना ने कराची में एक शानदार लंच दिया था| शराब खूब ढल रही थी| तभी गवर्नर जनरल के एडीसी ने उनके कान में फुसफुसाया कि वह दिन रमजान के रोजे का आखिरी जुमा था| जिन्ना ने अनसुनी कर फिर जाम भर लिया|
आज संपादक शकील-उर-रहमान की कैद पर मुझे इंदिरा गाँधी की एमरजेंसी याद आती है| तब हम विरोधी श्रमजीवी पत्रकारों को जेलों में ठूंसा गया था| दुआ है शकील-उर-रहमान भाई शीघ्र आजाद हों|



