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क्रिकेट की पिच से चयन की कुर्सी तक: 117 मैचों के अनुभवी आशीष यादव को मिली बड़ी जिम्मेदारी

वाराणसी के बरेका में कार्यरत आशीष यादव का क्रिकेट सफर खिलाड़ियों के लिए प्रेरणादायी मिसाल है। उत्तर प्रदेश और भारतीय रेल का रणजी ट्रॉफी में प्रतिनिधित्व करने वाले आशीष यादव ने 117 मैचों का अनुभव हासिल किया। बाएं हाथ के बल्लेबाज और स्लो लेफ्ट आर्म ऑर्थोडॉक्स गेंदबाज के रूप में पहचान बनाने के बाद अब वे भारतीय रेल की रणजी ट्रॉफी टीम के चयनकर्ता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनका अनुभव नई क्रिकेट प्रतिभाओं को पहचानने और अवसर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

वाराणसी। कुछ सफर मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए रास्ता बनाने के लिए तय किए जाते हैं। क्रिकेट की पिच पर वर्षों तक पसीना बहाने, संघर्ष करने और प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी पहचान बनाने के बाद जब कोई खिलाड़ी उसी खेल में प्रतिभाओं को तलाशने और उन्हें अवसर देने की जिम्मेदारी संभालता है, तो उसका अनुभव केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रह जाता, बल्कि नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन बन जाता है।

बनारस रेल इंजन कारखाना (बरेका), वाराणसी में कार्यालय अधीक्षक के पद पर कार्यरत आशीष यादव का क्रिकेट सफर इसी बदलाव, संघर्ष, अनुभव और जिम्मेदारी की प्रेरणादायी कहानी है। कभी क्रिकेट के मैदान पर बल्ले और गेंद के साथ अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने वाले आशीष यादव अब चयनकर्ता की भूमिका में युवा खिलाड़ियों के सपनों को पहचानने और उन्हें सही मंच तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

रेलवे स्पोर्ट्स प्रमोशन बोर्ड (RSPB), नई दिल्ली द्वारा उन्हें भारतीय रेल की रणजी ट्रॉफी क्रिकेट टीम के चयनकर्ता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। खिलाड़ी से चयनकर्ता तक का यह सफर उनके वर्षों के क्रिकेट अनुभव, अनुशासन, निरंतर मेहनत और खेल के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

उत्तर प्रदेश के घरेलू क्रिकेट से शुरू हुआ सफर

आशीष यादव ने क्रिकेट की दुनिया में कदम उत्तर प्रदेश के घरेलू क्रिकेट से रखा। प्रतिभा के साथ मेहनत और लगातार बेहतर करने की ललक ने उन्हें धीरे-धीरे उच्च स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुंचाया। वर्ष 2006 से 2010 तक उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने के बाद उन्होंने वर्ष 2010 से 2019 तक भारतीय रेल की ओर से रणजी ट्रॉफी में खेला। लगभग डेढ़ दशक तक उच्च स्तर की क्रिकेट से जुड़े रहने के दौरान उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और खेल के अलग-अलग आयामों को करीब से समझा।

उनके क्रिकेट करियर में रणजी ट्रॉफी, विजय हजारे ट्रॉफी, सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी, दलीप ट्रॉफी, देवधर ट्रॉफी, विज्जी ट्रॉफी तथा इंडियन यूनिवर्सिटी जैसी महत्वपूर्ण प्रतियोगिताएं शामिल रहीं। इसके अलावा उन्होंने सेंट्रल जोन का भी प्रतिनिधित्व किया। इस लंबे सफर में उन्होंने कुल 117 मैचों का अनुभव अर्जित किया। यह आंकड़ा केवल मैचों की संख्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे वर्षों का अभ्यास, यात्रा, प्रतिस्पर्धा, जीत-हार, दबाव, चोट, फिटनेस, टीम की रणनीति और कठिन परिस्थितियों में प्रदर्शन करने का अनुभव छिपा है।

बाएं हाथ के बल्लेबाज और स्लो लेफ्ट आर्म ऑर्थोडॉक्स गेंदबाज के रूप में पहचान

आशीष यादव की पहचान एक ऐसे ऑलराउंडर के रूप में बनी, जो बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों से टीम के लिए उपयोगी योगदान देने में सक्षम रहे। बाएं हाथ के बल्लेबाज और स्लो लेफ्ट आर्म ऑर्थोडॉक्स गेंदबाज के रूप में उन्होंने मैदान पर अपनी अलग पहचान बनाई।

ऑलराउंडर के रूप में खेलना अपने आप में चुनौतीपूर्ण होता है। खिलाड़ी को केवल एक विभाग में नहीं, बल्कि बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों में लगातार अपने प्रदर्शन को बनाए रखना पड़ता है। इसके साथ ही फिटनेस, एकाग्रता और टीम की जरूरत के अनुसार अपनी भूमिका बदलने की क्षमता भी आवश्यक होती है। यही अनुभव आज उनके चयनकर्ता के रूप में काम आ रहा है। किसी खिलाड़ी की प्रतिभा को केवल उसके आंकड़ों से नहीं, बल्कि मैदान पर उसके व्यवहार, परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता और टीम के लिए योगदान देने की मानसिकता से समझना—यह दृष्टि लंबे खेल अनुभव से ही विकसित होती है।

रणजी ट्रॉफी ने सिखाई क्रिकेट की असली परीक्षा

घरेलू क्रिकेट में रणजी ट्रॉफी को खिलाड़ियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मंच माना जाता है। लंबे प्रारूप में बल्लेबाज की तकनीक, गेंदबाज की निरंतरता, फिटनेस, धैर्य और मानसिक मजबूती की वास्तविक परीक्षा होती है।

आशीष यादव ने स्वयं इस स्तर की क्रिकेट का लंबा अनुभव हासिल किया है। इसलिए वह जानते हैं कि किसी युवा खिलाड़ी के लिए केवल एक शानदार पारी या कुछ अच्छे प्रदर्शन ही पर्याप्त नहीं होते। लगातार प्रदर्शन, कठिन परिस्थितियों में धैर्य और टीम की जरूरत के अनुरूप खेलने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। उनके खेल अनुभव में ऐसे अनेक अवसर आए होंगे, जब परिस्थितियां खिलाड़ी के अनुकूल नहीं रही होंगी। कभी प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा होगा, कभी टीम में जगह के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा रही होगी और कभी दबाव के बीच स्वयं को साबित करना पड़ा होगा। यही अनुभव अब उनके लिए प्रतिभाओं को परखने की दृष्टि बन चुका है।

खिलाड़ी से चयनकर्ता तक-बदली भूमिका, नहीं बदला खेल के प्रति जुनून

क्रिकेट में खिलाड़ी का सफर एक दिन समाप्त हो सकता है, लेकिन खेल से जुड़ाव वहीं समाप्त हो जाए, यह जरूरी नहीं। कई अनुभवी खिलाड़ी आगे चलकर कोच, मेंटर, प्रशासक या चयनकर्ता के रूप में खेल को अपनी सेवाएं देते हैं।

आशीष यादव का सफर भी इसी दिशा में आगे बढ़ा है।

अब उनके हाथ में बल्ला या गेंद नहीं, बल्कि प्रतिभाओं को पहचानने की जिम्मेदारी है। मैदान पर वह स्वयं प्रदर्शन करके टीम को मजबूत करते थे, जबकि चयनकर्ता के रूप में अब उनका योगदान उन खिलाड़ियों को चुनने में होगा, जो भविष्य में भारतीय रेल की क्रिकेट टीम को मजबूती प्रदान कर सकें। यह जिम्मेदारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चयनकर्ता की नजर केवल वर्तमान प्रदर्शन पर नहीं होती। उसे खिलाड़ी की क्षमता, निरंतरता, तकनीकी पक्ष, फिटनेस, मानसिक मजबूती और भविष्य की संभावनाओं को भी समझना होता है।

प्रतिभा पहचानने के साथ जिम्मेदारी भी बड़ी

किसी युवा क्रिकेटर के लिए चयन केवल टीम में जगह मिलने का अवसर नहीं होता, बल्कि उसके वर्षों के परिश्रम को एक नई दिशा देने वाला पड़ाव होता है। ऐसे में चयनकर्ता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी कभी-कभी आंकड़ों में उतना प्रभावशाली दिखाई नहीं देता, लेकिन उसके खेल में भविष्य की संभावनाएं छिपी हो सकती हैं। दूसरी ओर, किसी खिलाड़ी का एक-दो मैचों का शानदार प्रदर्शन उसकी वास्तविक क्षमता का पूरा आकलन नहीं हो सकता।

यहीं अनुभवी नजर की भूमिका सामने आती है।

आशीष यादव के सामने अब ऐसे ही खिलाड़ियों को पहचानने की चुनौती है। उन्हें यह देखना होगा कि कौन-सा खिलाड़ी दबाव में किस तरह प्रदर्शन करता है, कौन टीम की जरूरत को समझता है, कौन लगातार सीखने और सुधारने के लिए तैयार है और किस खिलाड़ी में उच्च स्तर की क्रिकेट खेलने की क्षमता विकसित हो सकती है।

मैदान के अनुभव ने दी खिलाड़ियों को समझने की दृष्टि

आशीष यादव का सबसे बड़ा अनुभव यही है कि उन्होंने क्रिकेट को केवल बाहर से नहीं देखा, बल्कि उसे मैदान के भीतर रहकर जिया है.उन्होंने अभ्यास सत्रों की मेहनत देखी है। प्रतियोगिता का दबाव महसूस किया है। चयन की प्रतिस्पर्धा का सामना किया है। टीम की रणनीति का हिस्सा रहे हैं। जीत की खुशी और हार की निराशा दोनों को करीब से महसूस किया है।

इसलिए किसी युवा खिलाड़ी की स्थिति को समझने के लिए उन्हें केवल आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। मैदान पर खिलाड़ी की बॉडी लैंग्वेज, परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता, अनुशासन और टीम के प्रति रवैया भी उनके आकलन का हिस्सा हो सकता है।यही अनुभव उन्हें एक अलग दृष्टिकोण प्रदान करता है।

क्रिकेट सिर्फ रन और विकेट का खेल नहीं

आशीष यादव के क्रिकेट सफर की सबसे महत्वपूर्ण सीखों में से एक यह है कि क्रिकेट को केवल रन और विकेट के आंकड़ों तक सीमित नहीं किया जा सकता। क्रिकेट में अनुशासन, धैर्य, फिटनेस, मानसिक मजबूती, टीम भावना और लगातार सीखने की इच्छा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। एक खिलाड़ी प्रतिभाशाली हो सकता है, लेकिन उच्च स्तर पर लंबे समय तक टिके रहने के लिए उसे अपने खेल के साथ व्यक्तित्व और व्यवहार पर भी काम करना पड़ता है।

लंबे समय तक क्रिकेट खेलने के कारण आशीष यादव इन पहलुओं की अहमियत को समझते हैं। यही वजह है कि चयनकर्ता के रूप में उनकी भूमिका केवल खिलाड़ियों के चयन तक सीमित नहीं मानी जा सकती। अनुभवी खिलाड़ी के रूप में उनकी दृष्टि युवा क्रिकेटरों के लिए मार्गदर्शन का माध्यम भी बन सकती है।

117 मैचों की यात्रा- हर मैच ने सिखाया कुछ नया

आशीष यादव के 117 मैचों का अनुभव उनकी क्रिकेट यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। हर मैच अपने साथ एक अलग कहानी, चुनौती और सीख लेकर आता है। कभी बल्लेबाजी में जिम्मेदारी निभानी होती है, कभी गेंदबाजी से विपक्षी टीम पर दबाव बनाना होता है और कभी टीम की रणनीति के अनुसार अपनी व्यक्तिगत भूमिका को पीछे रखना पड़ता है। यही सामूहिक अनुभव किसी खिलाड़ी को धीरे-धीरे परिपक्व बनाता है।

वर्षों की इस यात्रा ने आशीष यादव को क्रिकेट के तकनीकी पहलुओं के साथ-साथ खेल की मानसिकता को समझने का अवसर दिया। अब यही अनुभव उनके चयनकर्ता की भूमिका में उपयोगी साबित हो सकता है।

बरेका के लिए भी उपलब्धि का विषय

बनारस रेल इंजन कारखाना केवल औद्योगिक गतिविधियों के लिए ही नहीं, बल्कि खेल और प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए भी जाना जाता है। बरेका से जुड़े किसी खिलाड़ी का भारतीय रेल की रणजी ट्रॉफी टीम के चयनकर्ता की भूमिका तक पहुंचना संस्थान के लिए भी गौरव का विषय है।

आशीष यादव की उपलब्धि यह संदेश देती है कि खेल प्रतिभा और संस्थागत समर्थन के बीच बेहतर समन्वय से खिलाड़ी अपने करियर में नई ऊंचाइयां हासिल कर सकते हैं। उनका सफर बरेका से जुड़े युवा खिलाड़ियों को यह विश्वास भी देता है कि खेल के क्षेत्र में मेहनत और निरंतरता के साथ आगे बढ़ने के अवसर मौजूद हैं।

युवा क्रिकेटरों के लिए प्रेरणा

आशीष यादव की कहानी केवल एक क्रिकेटर के चयनकर्ता बनने की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें व्यक्ति अपने अनुभव को अपने तक सीमित रखने के बजाय अगली पीढ़ी के लिए उपयोग करता है। आज जब युवा क्रिकेटर कम उम्र में बड़े मंच पर पहुंचने का सपना देखते हैं, ऐसे में आशीष यादव का सफर उन्हें धैर्य और निरंतरता का महत्व समझाता है।

वर्षों तक घरेलू क्रिकेट खेलना, अलग-अलग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना, भारतीय रेल का प्रतिनिधित्व करना और अंततः चयन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी तक पहुंचना बताता है कि खेल में उपलब्धि केवल किसी एक दिन के प्रदर्शन से नहीं बनती। इसके पीछे वर्षों की तैयारी और निरंतर प्रयास की भूमिका होती है।

क्रिकेट की पिच से चयन की मेज तक

आशीष यादव के सफर का सबसे भावनात्मक पक्ष यही है कि जिस खेल में उन्होंने कभी खुद को साबित करने के लिए संघर्ष किया, आज उसी खेल में दूसरों की प्रतिभा को पहचानने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। कल तक वह टीम में अपनी जगह के लिए प्रदर्शन कर रहे थे, आज वह उन खिलाड़ियों को तलाश रहे हैं, जो टीम में अपनी जगह बना सकें।

कल तक उनके सामने विपक्षी बल्लेबाज और गेंदबाज चुनौती होते थे, आज चुनौती है-सैकड़ों प्रतिभाओं के बीच उन खिलाड़ियों को पहचानना, जिनमें भविष्य की संभावनाएं छिपी हैं। भूमिका बदल गई है, लेकिन क्रिकेट के प्रति समर्पण वही है।

एक खिलाड़ी की यात्रा, कई खिलाड़ियों के सपनों की जिम्मेदारी

आशीष यादव का सफर इस बात का उदाहरण है कि खेल में करियर की कोई एक मंजिल नहीं होती। खिलाड़ी मैदान से बाहर आने के बाद भी खेल को अपनी विशेषज्ञता और अनुभव से आगे बढ़ा सकता है।117 मैचों का अनुभव अब केवल उनके व्यक्तिगत क्रिकेट रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं, बल्कि नई प्रतिभाओं को पहचानने की जिम्मेदारी का आधार बन रहा है।

भारतीय रेल की रणजी ट्रॉफी टीम के चयनकर्ता के रूप में उनकी नई भूमिका उनके क्रिकेट जीवन का एक नया अध्याय है। इस भूमिका में उनके सामने प्रतिभाओं की पहचान, प्रदर्शन का मूल्यांकन और टीम के भविष्य के लिए उपयुक्त खिलाड़ियों को अवसर देने जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होंगी।

क्रिकेट की पिच पर खिलाड़ी के रूप में शुरू हुआ सफर अब चयन की मेज तक पहुंच चुका है। यह सफर बताता है कि मैदान पर बिताया गया समय कभी व्यर्थ नहीं जाता। अनुभव समय के साथ खत्म नहीं होता, बल्कि सही अवसर मिलने पर वह किसी और की सफलता की नींव बन सकता है।

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