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विकास की किरण से कोसों दूर है दस्यु सरगना रहे सलीम गुर्जर का गांव

औरैया । प्रदेश सरकार द्वारा प्रत्येक गांव को विकास के मुहाने पर खड़ा किए जाने का दावा किया गया है। मगर औरैया जनपद की सीमा से सटे दस्यु सरगना रहे सलीम गुर्जर के गांव का हाल अब तक बेहाल है। यहां पर मूलभूत सुविधाएं भी नहीं है। यहां के लोग कच्ची सड़कों एवं गंदा पानी पीकर अपना गुजारा करने को मजबूर है।

पचनद घाटी के सिंध, पहुंज और क्वारी नदियों के संगम तट पर डरावने बीहड़ों में बसा है बिलौड़। बिलायती बबूल के जंगलो में ऊंचे-नीचे खराब रास्ते सिहरन पैदा कर देते हैं। दिन के उजाले में गांव में भयानक सन्नाटा पसर जाता है। ज्यादातर घर यहां पर कच्चे हैं तो आधे से ज्यादा घरों में ताले लटके पड़े हैं। पलायन की मार से दर्जनों घर खंडहर बन गए है। यह गांव है कुख्यात दस्यु सरगना रहे सलीम गुर्जर उर्फ पहलवान का। जिसकी चंबल घाटी में डेढ़ दशक तक तूती बोलती थी।

वर्ष 2006 में औरैया जनपद के कैथोली के बीहड़ों में दस्यु सम्राट सलीम गुर्जर के एनकाउंटर के बाद भी बिलौड़ की सूरत नहीं बदली है। यही हाल बिलौड़ पंचायत में शामिल हुकुमपुरा और जखेता का भी है। जालौन जनपद का यह हाशिये का गांव माना जाता है क्योंकि सिंधु नदी इसे अलग-थलग कर देती है। यहीं से सटे इटावा जनपद की सीमा शुरू हो जाती है और कुछ दूर पर भिन्ड जनपद की सीमा तो दूसरी ओर कुछ दूरी पर औरैया की सरहद।

चंबल आश्रम के संस्थापक और दस्तावेजी लेखक डॉ. शाह आलम राना कहते है कि बिलौड़ पर एक तरफ से प्रकृति की मार, दूसरी तरफ से डाकुओं की ललकार और तीसरी तरफ से सरकार की दुत्कार से गांव पूरी तरह पिस गया है। यह गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से महरूम है।

इसी गांव के हनु सिंह चौहान कहते हैं कि यह गांव हमेशा से बागियों-डाकुओं की शरणस्थली के रूप में कुख्यात रहा है। यहां मान सिंह, पुतलीबाई, बाबा मुस्तकीम, मलखान सिंह, लाला राम, फूलन देवी, धनश्याम, फक्कड़, अरविंद, जगजीवन आदि गैंगो की सुरक्षित शरणस्थली रहा है। इसी का परिणाम है कि इस गांव में बाहरी लोग अपनी बेटियों की शादी नहीं करते थे।

बिलौड़ की आशा गुप्ता कहतीं हैं कि नदी में पीपे का पुल अभी तक नहीं बना है। दबंग लोग नाव भी नहीं चलने दे रहे हैं। वह अपने घर में अकेली हैं हर महीने राशन मिलता है ऐसे में नदी कैसे पार करें। घूमकर जाने में बीहड़ी खराब रास्तों से 22 किमी जाना पड़ता है। बताया कि यहां महीनों तक सब्जी तक नसीब नहीं होती है।

हरीराम बताते हैं कि दवा के नाम पर यहां दर्द की गोली भी नहीं मिलती है। अस्पताल यहां से सौ किमी दूर है। लिहाजा बीते महीने दो बहुओं को अस्पताल ले जाने के रास्ते में ही जान गवानी पड़ी। यहां अब बस नरक की जिन्दगी भोग रहे हैं। यहां न बिजली है न पीने का साफ पानी।

चंबल अंचल में इस बार आई भयानक बाढ़ और बारिश ने यहां बहुत तबाही मचाई। इस बार 26 वर्षों का रिकार्ड टूट गया। आज तक बाढ़ पीड़ितों को मुवाअजा तक नहीं मिल पाया है। इस गांव में ‘चंबल विद्यापीठ’ के जरिए आदिल खान बुनियादी शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। जिसमें दर्जनों बच्चे हर दिन चार घंटे पढ़ाई पाठशाला के साथ खेलकूद करते हैं। विविध शिक्षा तकनीक-कौशल के जरिए चंबल विद्यापीठ बच्चों में रोशनी उकेर रहा है और तमाम मुश्किलों के बाद भी निःशुल्क शिक्षा यहां दी जाती है।

आखिर कब तक पहुंचेगी बिलौड़ में विकास की किरण

यहां के ग्रामीणों का कहना है आजादी मिले 70 साल से अधिक का समय बीत गया है। मगर अब तक यहां मूलभूत सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाई है। लोगों का कहना है कि करीब ढाई दशक पूर्व यहां पर दस्यु दलों का साम्राज्य रहता था। दस्यु दलों का सफाया हो गया मगर इस गांव गांव में आज तक मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिल पाई है।(हि.स.)

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