प्रदीप वर्मा का दावा- “समर्पित कार्यकर्ता को भाजपा में जिम्मेदारी मिलती है, गणेश परिक्रमा से नहीं”
भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री एवं राज्यसभा सांसद डॉ. प्रदीप वर्मा ने विशेष बातचीत में अपने राजनीतिक सफर, संघ से जुड़ाव, भाजपा संगठन में मिली जिम्मेदारियों और झारखंड की राजनीति पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि राजनीति पार्ट टाइम जॉब नहीं, बल्कि समर्पण और मनोयोग का क्षेत्र है। डॉ. वर्मा ने आदिवासी राजनीति, चुनावी हार, संताल परगना में भाजपा के प्रदर्शन, रघुवर सरकार की नीतियों, औद्योगिक विकास और झारखंड में भाजपा की सरकार बनाने के लक्ष्य पर भी विस्तार से अपनी बात रखी।
रांची/लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मंत्री एवं झारखंड से राज्यसभा सदस्य डॉ. प्रदीप वर्मा का राजनीतिक सफर पारंपरिक राजनीतिक परिवार से निकलकर सत्ता के गलियारों तक पहुंचने की कहानी नहीं है। सामाजिक कार्यों से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए डॉ. वर्मा ने संगठनात्मक जिम्मेदारियों के जरिए भाजपा में अपनी पहचान बनाई। वर्ष 2024 में वे झारखंड से राज्यसभा पहुंचे और अगस्त 2026 में भाजपा की राष्ट्रीय टीम में उन्हें राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी मिली। सितंबर 2026 में पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के लिए सह-प्रभारी की जिम्मेदारी भी सौंपी है।
संगठन में लंबी पारी खेलने वाले डॉ. वर्मा राजनीति को पद प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि निरंतर समर्पण और समय देने वाला क्षेत्र मानते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि राजनीति पार्ट टाइम जॉब नहीं है। उनके अनुसार राजनीति में यह महत्वपूर्ण नहीं कि कोई व्यक्ति कितना समय देता है, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि वह कितने मनोयोग और समर्पण भाव से अपना समय देता है।
हालिया जिम्मेदारियों के बीच दिए गए एक विस्तृत साक्षात्कार में डॉ. वर्मा ने अपने राजनीतिक सफर, संघ से जुड़ाव, भाजपा संगठन की कार्यशैली, झारखंड में पार्टी की चुनावी चुनौतियों, आदिवासी राजनीति, औद्योगिक विकास और भविष्य की प्राथमिकताओं पर खुलकर अपनी बात रखी।
सामाजिक कार्यों से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
डॉ. वर्मा बताते हैं कि उनके परिवार की पृष्ठभूमि राजनीति की नहीं रही। उनके पिता कोलकाता की एक फैक्टरी में कार्यरत थे और भारतीय मजदूर संघ से सक्रिय रूप से जुड़े थे। घर पर नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आना-जाना था, जिसने उनके मन पर प्रभाव डाला। सामाजिक कार्यों के दौरान वे झारखंड अलग राज्य आंदोलन और अन्य सामाजिक मुद्दों से जुड़े। इसी दौर में उनका सार्वजनिक जीवन सक्रिय होता गया। वर्ष 2009 में उन्हें भाजपा के साथ सक्रिय रूप से काम करने का अवसर मिला।
शुरुआत में भाजपा के कार्यक्रमों और रैलियों में कार्यकर्ताओं के लिए भोजन व्यवस्था जैसी जिम्मेदारियां संभालने से लेकर संगठन के महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचने का उनका सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री की एक बड़ी सभा के दौरान कार्यकर्ताओं के लिए भोजन व्यवस्था की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली। इसके बाद संगठन में उनकी सक्रियता बढ़ती गई और उन्हें प्रदेश संगठन में विभिन्न दायित्व मिले। वर्ष 2015 में भाजपा की डिजिटल सदस्यता अभियान की जिम्मेदारी झारखंड में उन्हें दी गई। डॉ. वर्मा के अनुसार, इस अभियान के दौरान लगभग 42 लाख सदस्य बनाए गए। इसके बाद वे लगातार संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय होते चले गए।
“गणेश परिक्रमा से नहीं, काम से मिलती है जिम्मेदारी”
भाजपा में अपेक्षाकृत तेजी से आगे बढ़ने को लेकर उठने वाले सवालों पर डॉ. वर्मा ने ‘गणेश परिक्रमा’ की धारणा को खारिज किया।
उनका कहना है कि पार्टी में समर्पित भाव से काम करने वाले कार्यकर्ता को उसकी क्षमता के अनुरूप जिम्मेदारी दी जाती है। उन्होंने कहा कि भाजपा में लाखों कार्यकर्ता हैं और संगठन में काम करने वाले व्यक्ति की भूमिका उसके काम और क्षमता के आधार पर तय होती है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने कभी किसी नेता की व्यक्तिगत परिक्रमा नहीं की और दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय भी वे नियमित रूप से नहीं जाते रहे।
“संघ को प्रभावित करने का रास्ता शाखा से होकर जाता है”
संघ के पदाधिकारियों को प्रभावित करके संगठन में आगे बढ़ने के आरोपों पर भी डॉ. वर्मा ने स्पष्ट प्रतिक्रिया दी। उनके मुताबिक, संघ के पदाधिकारियों को प्रभावित करने का कोई शॉर्टकट नहीं है। यदि कोई व्यक्ति संघ की कार्यपद्धति और कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ना चाहता है तो उसे नियमित रूप से शाखाओं में जाना चाहिए।उनका कहना है कि “संघ के पदाधिकारियों को आप तभी प्रभावित कर पाएंगे जब आप संघ की दैनिक शाखाओं में जाएंगे।”
चुनावी हार से संगठन की क्षमता का आकलन नहीं
झारखंड में 2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन, विशेषकर आदिवासी सीटों पर पार्टी के नुकसान को लेकर पूछे गए सवाल पर डॉ. वर्मा ने चुनावी हार को संगठन की कमजोरी का सीधा प्रमाण मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि चुनाव में जीत और हार के कई कारण होते हैं और केवल चुनावी परिणाम के आधार पर किसी पार्टी के संगठन का आकलन नहीं किया जा सकता।
उनका आरोप है कि चुनाव के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों और आदिवासी समाज के बीच भाजपा के खिलाफ विभिन्न प्रकार की अफवाहें फैलायी गयीं। उन्होंने विशेष रूप से स्थानीय नीति को लेकर पैदा किए गए भ्रम का उल्लेख किया। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप डॉ. वर्मा के अपने बयान हैं और इनके संबंध में संबंधित पक्षों के स्वतंत्र दावों को इस बातचीत में शामिल नहीं किया गया है।
आदिवासी वोट और भाजपा की चुनौती
झारखंड में आदिवासी समाज के भाजपा से दूर होने की धारणा को भी डॉ. वर्मा स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि चुनावी सीटों में कमी को सीधे तौर पर आदिवासी समाज के भाजपा से दूर होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे रघुवर दास सरकार के कार्यकाल में आदिवासियों के लिए किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि पढ़ा-लिखा आदिवासी समाज उन नीतियों और कार्यों को याद रखता है। डॉ. वर्मा ने चुनाव के दौरान प्रलोभन और धन के इस्तेमाल का आरोप भी लगाया, हालांकि यह उनका राजनीतिक दावा है।
संताल परगना में कमजोर प्रदर्शन पर गठबंधन को बताया कारण
संताल परगना में भाजपा के कमजोर प्रदर्शन के सवाल पर डॉ. वर्मा ने विपक्षी दलों के गठबंधन को महत्वपूर्ण कारण बताया।उनके मुताबिक पहले कांग्रेस, झामुमो और राजद अलग-अलग चुनाव लड़ते थे, जबकि बाद के चुनाव में इन दलों के बीच गठबंधन हुआ। उनका मानना है कि इस गठबंधन का चुनावी लाभ विपक्षी दलों को मिला। जब उनसे पूछा गया कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में भी जदयू और आजसू शामिल थे, तो उन्होंने स्वीकार किया कि संताल परगना में उनका गठबंधन अपेक्षित रूप से मजबूत साबित नहीं हो सका।
रांची से चुनाव लड़ने की इच्छा पर भी बोले
रांची के तत्कालीन सांसद संजय सेठ का टिकट काटकर स्वयं चुनाव लड़ने की कोशिश संबंधी सवाल पर डॉ. वर्मा ने कहा कि राजनीति में सक्रिय हर व्यक्ति की चुनाव लड़ने की इच्छा हो सकती है। उन्होंने माना कि वे भी चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन उनका कहना है कि उन्होंने पार्टी की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। यह बयान उनके व्यक्तिगत राजनीतिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए; टिकट को लेकर पार्टी के भीतर क्या विचार-विमर्श हुआ, इसका स्वतंत्र विवरण इस बातचीत में उपलब्ध नहीं है।
“मंत्री बनने की इच्छा नहीं”
केंद्रीय मंत्रिमंडल में संभावित जगह मिलने की चर्चाओं पर डॉ. वर्मा ने कहा कि मंत्री बनने की उनकी कोई इच्छा नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व को अपनी इच्छा से अवगत करा दिया है और वे स्वयं को मूल रूप से संगठन का व्यक्ति मानते हैं। संगठनात्मक काम में उनकी रुचि है और आगे भी वे संगठन में काम करना चाहते हैं। यह रुख उनके राजनीतिक सफर की उस छवि से जुड़ा है जिसमें उन्होंने प्रदेश संगठन के विभिन्न दायित्वों पर काम किया है। अगस्त 2026 में उन्हें भाजपा की राष्ट्रीय टीम में राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया था।
औद्योगिक विकास पर रघुवर सरकार का बचाव
झारखंड में औद्योगिक विकास के मुद्दे पर डॉ. वर्मा ने तत्कालीन रघुवर दास सरकार के कार्यकाल का बचाव किया।उन्होंने दावा किया कि उस सरकार के प्रयासों से अरविंद मिल और ओरिएंट क्राफ्ट जैसे उद्योग रांची में आए और हजारों लोगों को रोजगार मिला। उन्होंने निजी विश्वविद्यालयों के विस्तार का भी उल्लेख किया।उनका दावा है कि रघुवर सरकार की नीतियों के कारण राज्य में पांच निजी विश्वविद्यालय खुले और इससे रोजगार के अवसर बढ़े।
वहीं, हेमंत सोरेन सरकार के कार्यकाल पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने दावा किया कि उक्त उद्योग अब बंदी के कगार पर हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए उद्योगों की वर्तमान स्थिति और रोजगार के आंकड़ों की अलग से पड़ताल आवश्यक होगी।
“सीएनटी-एसपीटी के बावजूद आदिवासी जमीन सुरक्षित नहीं”
आदिवासी जमीन के संरक्षण के सवाल पर डॉ. वर्मा ने सीएनटी और एसपीटी एक्ट का उल्लेख किया। उनका कहना है कि इन कानूनों के बावजूद झारखंड में आदिवासियों की जमीन पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह सकी। उन्होंने इसे राज्य में आदिवासी हितों से जुड़ी गंभीर चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया। यह विषय झारखंड की राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है और भूमि, स्थानीय नीति तथा आदिवासी अधिकारों को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मतभेद रहे हैं।
“झारखंड में भाजपा की सरकार बनाना लक्ष्य”
राष्ट्रीय स्तर पर नई जिम्मेदारी मिलने के बावजूद डॉ. वर्मा ने झारखंड को अपना प्राथमिक राजनीतिक क्षेत्र बताया।उनका कहना है कि वे अपने गृह राज्य में काम करना चाहते हैं और उनका प्रमुख लक्ष्य संगठन को मजबूत करना तथा अगले चुनाव में भाजपा की सरकार बनाने के लिए पार्टी को तैयार करना है।
डॉ. प्रदीप वर्मा के 10 प्रमुख बयान
- “राजनीति पार्ट टाइम जॉब नहीं है, इसमें मनोयोग और समर्पण जरूरी है।”
- “संघ के पदाधिकारियों को प्रभावित करना है तो दैनिक शाखा में जाना होगा।”
- “पार्टी में समर्पित भाव से काम करने वाले को क्षमता के अनुसार जिम्मेदारी मिलती है।”
- “चुनाव की जीत-हार से संगठन की क्षमता का आकलन नहीं किया जा सकता।”
- “संताल परगना में विपक्षी गठबंधन का मजबूत होना भाजपा के लिए चुनौती बना।”
- “मंत्री बनने की मेरी कोई इच्छा नहीं है, मैं संगठन का आदमी हूं।”
- “झारखंड में संगठन को मजबूत कर भाजपा की सरकार बनाना हमारा लक्ष्य है।”
- “सीएनटी और एसपीटी एक्ट के बावजूद आदिवासियों की जमीन पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह सकी।”
- “भाजपा जातिवाद की राजनीति में विश्वास नहीं करती, सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है।”
- “मैं शुरू से संगठन के काम में रुचि रखता हूं और आगे भी संगठन में काम करना चाहता हूं।”
उनका यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा ने सितंबर 2026 में उन्हें उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव के लिए प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े के साथ सह-प्रभारी नियुक्त किया है। उनके साथ जगदीश पटेल, मेधा कुलकर्णी और अनंत ओझा को भी सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। इस तरह एक तरफ डॉ. वर्मा को राष्ट्रीय और उत्तर प्रदेश की संगठनात्मक जिम्मेदारी मिली है, वहीं दूसरी तरफ वे झारखंड को अपना प्राथमिक राजनीतिक कर्मक्षेत्र बता रहे हैं।
जातीय राजनीति पर स्पष्ट रुख
झारखंड में कुर्मी समाज के भाजपा समर्थक माने जाने और पार्टी में व्यापक स्तर पर नेतृत्व करने वाले कुर्मी चेहरे की कमी के सवाल पर डॉ. वर्मा ने जातीय राजनीति से दूरी का अपना रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि वे शुरुआत से जातिवाद की राजनीति के विरोधी रहे हैं। उनके अनुसार किसी भी राजनीतिक दल का व्यापक जनाधार किसी एक जाति या वर्ग के आधार पर नहीं बनाया जा सकता।उनका कहना है कि भाजपा सभी जातियों को प्रतिनिधित्व देने की बात करती है और यही व्यापक सामाजिक आधार बनाने की उसकी रणनीति है।
संगठन बनाम सत्ता की राजनीति
डॉ. प्रदीप वर्मा के पूरे साक्षात्कार में एक बात लगातार उभरती है-वे अपनी राजनीतिक पहचान को सत्ता की बजाय संगठन से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं।
राज्यसभा सदस्य बनने के बाद भी उनका जोर संगठनात्मक जिम्मेदारियों पर रहा है। अगस्त 2026 में राष्ट्रीय मंत्री बनाए जाने के बाद उन्होंने कार्यकर्ताओं की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने को प्राथमिकता बताया था। अब उत्तर प्रदेश में सह-प्रभारी की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके सामने एक बड़े राज्य में संगठनात्मक समन्वय की नई भूमिका है। सितंबर 2026 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश के लिए विनोद तावड़े को प्रभारी और चार सह-प्रभारियों की नियुक्ति की है।
राजनीति को लेकर डॉ. वर्मा का संदेश
डॉ. वर्मा की बातचीत का केंद्रीय संदेश यही है कि राजनीति को वे सीमित समय की गतिविधि नहीं मानते। उनके अनुसार संगठन में काम करने वाले व्यक्ति के लिए पद से अधिक महत्वपूर्ण उसकी प्रतिबद्धता है। उनके शब्दों में-“राजनीति में आप कितना समय देते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि कितना मनोयोग से और समर्पण भाव से समय देते हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।” झारखंड में संगठन को मजबूत करने की उनकी प्राथमिकता और उत्तर प्रदेश की नई जिम्मेदारी, दोनों को साथ रखकर देखें तो आने वाला समय उनके लिए राष्ट्रीय संगठन और राज्य की राजनीति-दोनों स्तरों पर सक्रिय भूमिका वाला होगा।
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