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दुद्धी की धरती पर ईश्वर के प्रतिनिधि बनकर आये नन्हकू बाबा

क्षेत्रीय आस्था एवं विश्वास के केन्द्र बने नन्हकू बाबा आज भी करते हैं लोगों का कल्याण

देवेश मोहन

दुद्धी, सोनभद्र- समय समय पर धरती पर बढ़ रहे पाप, अत्याचार एवं विपदाओं के विनाश के लिये ईश्वर अनेक रूपों में अवतरित होकर धर्म एवं प्राणियों की रक्षा करते रहे हैं।कभी स्वयं तो कभी अपने प्रतिनिधि को धरती पर भेजकर, प्रभु ने जग का उद्धार किया है।
क्षेत्र के बुजुर्गों की जुबानी एवं सच्ची कहानियों पर गौर करें तो 19 वीं सदी में भी ईश्वर ने अपने एक प्रतिनिधि नन्हकू माझी को दुद्धी की धरती पर भेजा।जिनके द्वारा किये गये अनेको उपकार एवं चमत्कार आज भी प्रासंगिक व अविस्मरणीय हैं।जिसकी वजह से लोग सिद्ध पुरूष नन्हकू बाबा को ईश्वर का साक्षात अवतार मानते हैं।

लोगों की मानें तो दुद्धी तहसील क्षेत्र के ग्राम धनौरा में आदिवासी परिवार में जन्में बाबा नन्हकू माझी की आज भी पूरे क्षेत्र पर दया दृष्टि बनी हुई है।देर रात्रि में सफेद घोड़े की सवारी करते हुए क्षेत्र भ्रमण कर रखवाली करते हैं। गांव के ही प्राचीन बगीचे में बनी उनकी समाधि स्थल धाम पर आज भी आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु जो कुछ भी सच्चे दिल से मांगते हैं,बाबा उनकी मन्नतें पूरी करते हैं।बताया जाता है कि 1890 के दशक तक बाबा का परचम व आधिपत्य पूरे क्षेत्र पर था।वे क्षेत्र के मसीहा हुआ करते थे।उनके यहां जो कोई अपनी व्यथा लेकर पहुंचता,उसके सिर पर बाबा हाथ फेरते हुए कहते “जा सब ठीक हो जाही तोर” और उसका कल्याण हो जाता था।वह चाहे गम्भीर बीमारी से ग्रसित हो या कोई अन्य विपदाओं से।

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आदिवासी नेता विधायक हरीराम चेरो

बाबा की जीवनशैली एवं उनके महात्म्य पर प्रकाश डालते हुए क्षेत्रीय विधायक आदिवासी नेता हरीराम चेरो बताते हैं कि बाबा नन्हकू माझी “हेड मैन ऑफ दी विलेज थे।” पूरे क्षेत्र के मालिक को ही माझी का ओहदा मिलता था। ईश्वर की विलक्षण शक्तियां भी उनके पास मौजूद थीं।दुद्धी पड़ाव वर्तमान में टाऊन क्लब मैदान उनका बथान हुआ करता था।जो सैकड़ो मवेशियों का आश्रय स्थल था।यहां एक विशाल पीपल का पेड़ व महुआ के सैकड़ो पेड़ थे।वर्ष 1960 तक बाबा के वंशज महुआ के फूल बीनते रहे और उनके बंशज आज भी गांवों में हैं।

उनके महात्म्य के बारे में बताया कि क्षेत्र के लोग एक डायन से परेशान रहा करते थे।बाबा से गांव के लोगों ने उसकी शिकायत की तो, बाबा ने डायन को क्षेत्र छोड़कर जाने को कहा।इससे खिन्न डायन ने बाबा को चैलेंज किया कि तुम बड़े कि हम बड़े इसका फैसला हो जाये।बाबा ने डायन का चैलेंज को स्वीकार किया और गांव से बाहर धनौरा,खजुरी व दिघुल गांव के सिवान पर स्थित एक पहाड़ी पर डायन के साथ शक्ति परीक्षण के लिए पहुंचे।वहां दोनों ने एक दूसरे पर अपने शक्तियों का प्रयोग किया।जिसमें बाबा ने उसे अपनी ईश्वरीय शक्तियों से उसे पत्थर बनाकर हमेशा हमेशा के लिए उसी पहाड़ी में दफन कर दिया।जिससे उस पहाड़ी का नाम डयनिया पहाड़ पड़ गया।

एक दूसरे घटना क्रम के अनुसार अंग्रेज मिशनरी 1871 में जब दुद्धी आये तो यहां के मुखिया के बारे में जानकारी ली और तहसील, थाना आवास आदि के लिए भूमि व्यवस्थापन हेतु अपने कर्मचारी से बाबा को बुलाने के लिए भेजा।बाबा क्षेत्र के मुखिया थे, इसलिए अंग्रेज के बुलावे से नाराज हो गये।उन्होंने बुलावे के लिए आये कर्मचारी से कहा कि ” जा कह दे तैं अपने साहेब के ओकरे ठे मैं नहीं शाम के मोर कुकरा मन जाहिं।” शाम होते ही अंग्रेज के कैम्प के इर्द-गिर्द दर्जनों शेर दहाड़ने लगे।यह दृश्य देख उसकी हालत पतली हो गयी।तुरन्त उसने बाबा से क्षमा याचना की तो शेर विलुप्त हो गये।उन्होंने यह भी बताया कि वे गोंड़ विरादरी के थे। इस विरादरी में पूर्वजों की मृत्यु के पश्चात उन्हें घर मे स्थान दिया जाता है और देवतुल्य उनकी आराधना व पूजा की जाती है।जबकि हिन्दू धर्म में मृतक पूर्वजों को शांति के लिए गया (बिहार) वास कराया जाता है।बाबा और उनकी पत्नी का समाधि स्थल उनके पैतृक गांव धनौरा में है।जिसे बुढ़ऊ बाबा व बूढ़ी माई धाम कहा जाता है।ऐसी मान्यता है कि यहां आने वाले हर भक्तों की बाबा उनकी मन्नतें पूरी करते हैं।

शिक्षक पंडित नंदकिशोर तिवारी बताते हैं कि एक बार दुद्धी समेत आसपास के क्षेत्रों में भयंकर सूखा पड़ गया।पानी-पानी के लिए जानवर,इंसान सभी बेहाल होने लगे थे।तभी गांव के लोग बाबा के यहां पहुंचे और विनती की। बाबा ने अपने मन्त्रों से ईश्वर का आह्वान करके पूरे गांव का फेरा किया।इसके कुछ ही देर बाद झमाझम बारिश हो गयी तथा लोगों के चेहरे खुशी से दमक उठे।वर्ष 1898 में दुद्धी नगर में जानलेवा बीमारी हैजा का भीषण प्रकोप हुआ।एक पखवाड़े के भीतर सैकड़ो लोगों की जानें चली गयी।हर तरफ इस बीमारी ने महामारी का रूप अख्तियार कर लिया।तब लोग बाबा के पास पहुंचे और महामारी का रूप ले चुकी हैजा से निजात दिलाने की गुहार लगाई।बाबा ने ग्रामीणों को साफ सफाई रखने का निर्देश देते हुए,ईश्वर की आराधना की।उसी दिन से बीमारी का क्षेत्र से सफाया हो गया।ऐसी अनेक सच्ची कहानी एवं किवदंतियां बाबा के बारे में प्रचलित हैं।

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