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जनजातियों की समृद्ध परंपरा को जानिए करीब से…

जनजातियों की समृद्ध परंपरा, वीरता से परिपूर्ण इतिहास और आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को याद करने के लिए देश आज जनजातीय गौरव दिवस मना कर सम्मान दे रहा है। आज भगवान बिरसा मुंडा की जयंती है और इसी क्रम में आज सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रांची, झारखण्ड में भगवान बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान और स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय का वर्चुअल माध्यम से उद्घाटन किया। इस अवसर पर पीएम मोदी ने कहा कि ये संग्रहालय, स्वाधीनता संग्राम में आदिवासी नायक-नायिकाओं के योगदान का, विविधताओं से भरी हमारी आदिवासी संस्कृति का जीवंत अधिष्ठान बनेगा। आइये, जानते हैं आदिवासी संस्कृति को करीब से…

जनजातीय नृत्य

जनजातीय संस्कृति अपने आप में एक समृद्ध विरासत को समेटे हुए है। जनजातीय जीवन शैली में नृत्य का विशेष स्थान है। इनकी लोक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है नृत्य। नृत्य एक तरफ उल्लास का प्रतीक है तो वहीं आस्था का पर्याय भी है। कोई भी मांगलिक अवसर हो, अनुष्ठान हो, या पर्व हो, नृत्य के बिना अधूरा ही रह जाता है। जनजातीय समुदाय में गीत – संगीत और नृत्य की एक समृद्ध परंपरा रही है। आइए, आज जानते हैं ऐसे ही कुछ प्रसिध्द जनजातीय नृत्यों के बारे में

गुदुम बाजा नृत्य

गोण्ड जनजाति की उप जाति ढुलिया द्वारा गुदुमबाजा नृत्य किया जाता है। यह जनजाति मुख्य तौर पर बांस का कार्य करती है। इस समुदाय द्वारा विवाह एवं अन्य अनुष्ठान और खुशियों के अवसर पर मांगलिक वाद्य के रूप में गुदुम बाजा और सहायक वाद्य के रूप में टिमकी, ढफ, मंजीरा, शहनाई आदि की संगति होती है। गुदुम वादक समूह में सहायक वाद्यों के साथ नृत्य करते हुए हस्त-पद संचालन के माध्यम से विभिन्न नृत्य मुद्राएँ और पिरामिड बनाते हैं, जो नृत्य को आकर्षक बनाती हैं। गोण्ड और बैगा समुदाय के साथ ही नागर समुदाय द्वारा भी विभिन्न अवसरों पर मांगलिक वादन के लिये इस समुदाय को आमंत्रित किया जाता है।

सैला नृत्य

गोण्ड जनजाति द्वारा विभिन्न अवसर- अनुष्ठानों के अवसर पर अलग-अलग तरह के नृत्य और संगीत की सुदीर्घ परम्परा है। समुदाय द्वारा शरद ऋतु की चांदनी रातों में सैला नृत्य किया जाता है। नर्तकों के हाथों में लगभग सवा हाथ के डंडे होने के कारण इसका नाम सैला पड़ा। आदिदेव को प्रसन्न करने के लिए सैला नृत्य का प्रचलन है। कहते हैं सरगुजा की रानी से अप्रसन्न होकर आदिदेव बधेसुर अमरकंटक चले गये थे, वहां के बांसों को काटकर इस नृत्य का प्रचलन हुआ। सैला गोण्ड जनजाति का लोकप्रिय नृत्य है।

ठाट्या नृत्य

मध्य प्रदेश की गोण्ड जनजाति में नृत्य की समृद्ध परम्परा है। गोण्ड जनजाति में विभिन्न त्योहारों-पर्व, अनुष्ठानों एवं अन्य खुशियों के अवसरों पर नृत्य किये जाते हैं। ठाट्या गोण्ड जनजाति की उप जाति है, जो मूलतः गोण्ड समुदाय के ग्वाले हैं। ठाट्या समूह द्वारा दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से ठाट्या नृत्य किया जाता है। ढोलक की थाप पर भुगडू (बांसुरी) की मधुर धुन नृत्य को धीमी गति से द्रुत की ओर ले जाती है। भैंस के सींग से निर्मित सिंगी की ध्वनि से नृत्य का प्रारंभ किया जाता है।

घोड़ीपैठाई नृत्य

डिण्डौरी जिले के चाड़ा के घने जंगलों में निवास करने वाली बैगा जनजाति द्वारा विभिन्न अवसरों पर नृत्य-गीत की समृद्ध परम्परा है। बैगाओं के प्रमुख नृत्यों में करमा, दशहरा, बिलमा, परघौनी, घोड़ीपैठाई नृत्य प्रमुख हैं। बैगाओं द्वारा दशहरे के अवसर पर घोड़ीपैठाई नृत्य किया जाता है। यह नृत्य दशहरे से प्रारंभ होकर होली तक चलता है। इस नृत्य में आनंद और उल्लास की अभिव्यक्ति मुख्य है। पुरुष और महिला नर्तक आमने-सामने हो संगीत और गीत के माध्यम से एक-दूसरे से सवाल-जवाब करते हैं।

भगोरिया नृत्य

मध्य प्रदेश के झाबुआ और अलीराजपुर क्षेत्र में निवास करने वाली भील जनजाति का भगोरिया नृत्य, भगोरिया हाट में होली तथा अन्य अवसर पर भील युवक-युवतियों द्वारा किया जाता है। फागुन के मौसम में होली से पूर्व भगोरिया हाटों का आयोजन होता है। भगोरिया हाट केवल हाट न होकर युवक-युवतियों के मिलन मेले हैं। यहीं से वे एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं, आकर्षित होते हैं और जीवन सूत्र में बंधने के लिये भाग जाते हैं इसलिये इन हाटों का नाम भगोरिया पड़ा। भगोरिया नृत्य में विविध पदचाप समूहन पाली, चक्रीपाली तथा पिरामिड नृत्य मुद्राएं आकर्षण का केन्द्र होती हैं। रंग-बिरंगी वेशभूषा में सजी-धजी युवतियों का श्रृंगार और हाथ में तीरकमान लिये नाचना ठेठ पारम्परिक व अलौकिक सरंचना है।

थापटी नृत्य

कोरकू मध्य प्रदेश की एक प्रमुख जनजाति है। समुदाय द्वारा चिल्लुड़ी, थापटी, गादली और ढांढल कोरकुओं के अवसर विशेष के नृत्य हैं। यह परम्परा विभिन्न पर्व-त्यौहारों पर वर्ष भर चलती है। थापटी नृत्य की वेशभूषा अत्यधिक सादगीयुक्त और सुरुचिपूर्ण होती है। पुरूष सफेद रंग पसंद करते हैं, सिर पर लाल पगड़ी और कलंगी पुरुष नर्तक खास तौर से लगाते हैं। स्त्रियाँ लाल, हरी, नीली, पीली रंग की किनारी वाली साड़ी पहनती हैं। स्त्री के एक हाथ में चिटकोला तथा दूसरे हाथ में रूमाल और पुरुषों के हाथ में घुंघरूमाला तथा बांसुरी होती है। ढोलक की लय और ताल पर कोरकू हाथों और पैरों की विभिन्न मुद्राओं को बनाते हुए गोल घेरे में नृत्य करते हैं।

भड़म नृत्य

भारिया जनजाति के परम्परागत नृत्यों में भड़म, सैतम, सैला और अहिराई प्रमुख हैं। भड़म नृत्य के कई नाम प्रचलित हैं। विवाह के अवसर पर किया जाने वाला यह नृत्य भारियाओं का सर्वाधिक प्रिय नृत्य है। भड़म समूह नृत्य है। ढोल टिमकी वादक पहले घेरा बनाते हैं, घेरे के बीच का एक नर्तक लकड़ी उठाकर दोहरा गाता है। दोहरा के अंतिम शब्द से वाद्य बजना शुरू हो जाते हैं। ढोलक की थाप और टिमकी की ताल पहले मंद गति से उठती है और तीव्र से तीव्रतर होती जाती है। नृत्य की गति भी वाद्यों के साथ बढ़ती है। ढोल वादकों के पैर समानान्तर गति में धीरे-धीरे सरकते हैं। घेरे के बीच के नर्तक तेज गति से पैर, कमर और हाथों को गति देकर नाचते हैं।

दहका नृत्य

कोल संगीतप्रिय जनजाति है। कोल-दहका या कोल दहकी इनका सर्वप्रिय नृत्य है। कोल दहका का अर्थ है- कोलों का दहकना यानी उत्साह। यह नृत्य उमंग और आनन्द के साथ कुशल हस्त-पद संचालन और अपनी आदिम ऊर्जा के साथ किया जाता है सगाई, विवाह, छठी आदि अवसरों पर यह नृत्य किया जाता है। इस नृत्य में नगडिया, टोलक और झांझ मुख्य वाद्य के रूप में उपयोग होते हैं।

करमा- समवेत नृत्य प्रस्तुति

‘करमा’ जनजातीय जीवन का मूल नृत्योत्सव है। एक ऐसे समुदाय ने इस संस्कृति के बीज बोये, जहाँ बिना कर्म के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। खेती-किसानी, स्वयं के लिये आवास का निर्माण, देह को ढंकने के लिये वस्त्र और भोजन आदि की व्यवस्था के लिये कर्म में होना परम अनिवार्य था। जनजातीय समुदायों ने कर्म की प्रेरणा वृक्ष से प्राप्त की है। जैसे वृक्ष अपने पोषण के लिये आवश्यक तत्व धरती से लेता है, पर फल लोक के लिये है। वैसा ही आचरण जनजातीय चेतना ने ‘करमा नृत्य’ के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के लिये संरक्षित और सम्प्रेषित किया है।

लोक कल्याण और श्रम के परिहार के लिये इससे श्रेष्ठतम उपाय शायद ही कुछ और हो सकता है कि इस आचरण को ही उत्सव में परिवर्तित कर दिया जाये। मध्यप्रदेश में निवासरत जनजातियों में से अधिकांश जनजातियां ‘करमा उत्सव’ को अलग-अलग तरह से मनाती हैं। इसकी उत्सविकता में नृत्य, गान और अनुष्ठान की प्रमुखता है। करमा गीतों में जहां श्रम की महिमा है, वहीं प्रेम, अध्यात्म और प्रकृति की केन्द्रीयता भी होती है।

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