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घंटा बजा ! किसके वास्ते ? के. विक्रम राव

नरेंद्र मोदी के आह्वान पर भारत ने आज (22 मार्च 2020) संध्या पांच बजे ताली बजाई, थाली पीटी, घंटी घनघनाई और “कोरोना भागो” सूत्र को गुंजाया| हालाँकि कल रात को ही टीवी पर राहुल गाँधी के अति-गंभीर उद्गार थे कि “थाली पीटने से कुछ भी नहीं होने वाला है|” टीवी और संवाद समितियों की रपट और चित्रों के अनुसार सारा देश साझेदार रहा| मगर पप्पूभक्त जन, वामी, गंगाजमुनी, मुल्ले और मदरसे इससे किनारा कर गए| भूलकर भी टीवी पर कोई दिखा नहीं| शायद कोरोना भगाना नहीं चाहते होंगे| हालाँकि, घंटाघर (लखनऊ) और शाहीनबाग (दिल्ल्ली) में बैठे लोग इसमें शिरकत कर सकते थे| थाली पीट सकते थे| पर प्रश्न था कि कोरोना बड़ा खतरा है या मोदी ?

राष्ट्रीय एकात्मकता का ऐसा भाव-विभोर और आह्लादमय नजारा दशकों बाद पेश आया है| दांडी नमक सत्याग्रह (1930) और नवनिर्माण छात्र आन्दोलन (गुजरात 1974) के बाद ही जनसरोकार का ऐसा प्रदर्शन हुआ है| अहमदाबाद के छात्र-आन्दोलन (तब नरेंद्र मोदी बाईस वर्ष के युवा स्वयंसेवक थे) में उन्होंने देख होगा कि कैसे प्रतिदिन शाम को सारे गुजरात में पूरे परिवारवाले घंटी और थाली बजाकर भ्रष्ट इंदिरा-कांग्रेसी मुख्य मंत्री चिमनभाई जीवनभाई पटेल की सरकार का ‘मृत्युघंट’ टनटनाते थे| फिर सरकार गिर गई| मोदी ने महागुजरात आन्दोलन (बम्बई प्रदेश का भाषावारी विभाजन) के दौर में अस्सी-वर्षीय इन्दुलाल याज्ञनिक के नेतृत्ववाले जनसंघर्ष को जाना होगा| तब केंद्रीय काबीना के वित्तमंत्री और गुजरात के सुप्रीमो मोरारजी रणछोड़ देसाई अहमदाबाद, बड़ौदा और सूरत आये थे| ‘जनता कर्फ्यू’ का इन्दुलाल ने ऐलान किया था| सिवाय कुत्ते-बिल्ली के वीरान सड़कों पर मोरारजीभाई को कोई प्राणी दिखा ही नहीं था| ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ (अहमदाबाद) में नवनिर्माण संघर्ष की रपट मैंने लिखी थी|

मोदी ने संघर्ष के इन पुराने अस्त्रों को आयुधभंडार से तराश कर निकाला है| प्रधान मंत्री द्वारा जनचेतना को प्रस्फुटित करने का यह तरीका नायाब रहा| मगर आज माहौल भिन्न है| शत्रु भी अजीब सा है, अमूर्त| विस्तारवादी चीन के वुहान प्रान्त से आया विषाणु है|

इतना तो तय है कि आज उनके जिन विरोधियों ने अपनी खुन्नस और संकीर्णता के कारण इस राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन में भाग नहीं लिया, वे महंगी सियासी भूल कर बैठे| प्रतीक्षा करें खामियाजा के लिए|

K Vikram Rao

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