Opinion

देश बनाया, पर अपना घर नहीं

हर चार वर्ष बाद आती है (मोरारजी देसाई की 124वीं जयंती पर)

blankजब किरायेदार मोरारजी देसाई को मकान मालिक ने उनके मुम्बई वाले फ्लैट से बेदखल कर दिया था तब देशवासियों ने जाना कि इस पूर्व प्रधान मंत्री का कोई निजी घर कभी नही रहा। सर्वोच्च न्यायालय तक तीन दशको से मुकदमा वे लडे़ मगर हार गये। मेरीन ड्राइव स्थित ओसियाना बिल्डिंग का फ्लैट खाली कर दिया। बेघर हो गये। भला हो कांग्रेसी मुख्य मंत्री शरद पवार का जिन्होने इस प्रथम गैरकाग्रेसी प्रधानमंत्री को रेन्ट कन्ट्रोल के तहत मानवतावश एक सामान्य आवास आवंटित किया।

अविभाजित बम्बई राज्य के 1952 से मुख्यमंत्री और 1937 में बालासाहब खेर की काबीना के मंत्री रहकर भी मोरारजी देसाई ने मुम्बई में अपना कोई भी मकान नही बनवाया। पांच वर्षेां तक ब्रिटिश जेल में रहे, गांधीवादी सादगी के लिए विख्यात मोरारजी देसाई के खिलाफ कुछ लोगो, खासकर सोशलिस्टो तथा कम्युनिस्टो ने दूषित प्रचार किया था कि वे अमीर और पूँजीपतियों के हितैषी थे। अमरीका के समर्थक रहे। हालाकि कई वर्षों बाद उनके यही अलोचक जयप्रकाश नारायण, चन्द्रशेखर, मधुलिमये, जार्ज फर्नीण्डिस आदि को एहसास हुआ कि वे भ्रमित थे। अतः जनता पार्टी के साथ आये। माक्र्सवादी कम्यनिस्ट एके गोपाल और ज्योतिर्मय बोस ने मोरारजी देसाई की सरकार का समर्थन किया था। उसी वर्ष (1977) में जम्मू कश्मीर विधान सभा का निर्वाचन था। सरकारी अमला प्रधान मंत्री से मतदान के बारे के आवश्यक निर्देश लेने आया। मोरारजी देसाई ने नाराजगी व्यक्त की और स्पष्ट आदेश दिया कि कश्मीर में पूर्ण तथा निष्पक्ष चुनाव हो। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने कहा भी कि पहली बार घाटी में ईमानदारी से मतदान हुआ जिसमें जनता पार्टी और सतारुढ़ कंाग्रेस पराजित हुई थी। मगर 1974 के उत्तर प्रदेश विधान सभा मतदान में व्यापक धाँधली का आरोप लगा था। तब कई वर्षों बाद कांग्रेस बहुमत मे आई थी। हेमवती नन्दन बहुगुणा मुख्य मंत्री थे। कई जिलो का दौरा कर मोरारजी देसाई ने इन्दिरा कांग्रेस पर जालसाजी का इलजाम लगाया था। इस आरोप की ताइद स्वंय बहुगुणा ने 1977 के लोकसभा निर्वाचन के समय चन्द्रमानु गुप्ता से की थी। दोनो नेता तब जनता पार्टी में एक साथ थे। चन्द्र भानु गुप्ता की जमानत 1974 चुनाव के जब्त हो गई थी। यह काम लखनऊ (पूर्व) के आला अफसरो की शह पर किया था

blankमोरारजी देसाई जो सतासी वर्ष की आयु के प्रधान मंत्री थे और सौ वर्षां तक जिये की चट्टानी हठ धर्मिता बहुत चर्चित रही। जवाहरलाल नेहरु के केरलवासी निजी सचिव एम.ओ.मथाई ने कहा था कि कुतब मीनार पर गांधी टोपी पहना दो वह मोरारजी देसाई का प्रतिरुप दिखेगा। इस तीव्र मन्तव्य का सबब भी था। मसलन जब गृह मंत्री चरण सिंह तथा स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण ने सार्वजनिक तौर पर जनता पार्टी तथा सरकार की नीतियों की आलोचना की तो मोरारजी देसाई ने इन दोनो का त्यागपत्र ले लिया। काबीना के सामूहिक उत्तरदायित्व के नियम का उल्लंघन हुआ था। आज मनमोहन सिंह के मंत्रियो के नित्य दिये जा रहे भिन्न भिन्न बयानो को देखे। शक होता है की सरकार नाम की चीज है भी , मगर अपने मंत्रीमंडलीय सहयोगियों का उचित बचाव भी प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने किया था। उदाहरणार्थ उन्हे आरोपपत्र मिला था कि उनके सूचना तथा प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी आकाशवाणी तथा दूरदर्शन द्वारा राष्ट्रीय स्ंवय सेवक संघ का प्रचार करते हैं तो उन्होने जांच के बाद उसे खारिज कर दिया। मगर विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर लगे आरोपो को गंभीरता से पड़ताल की कि वाजपाई जी अत्यधिक मदिरापान करते है तथा महिलाओं की सानिध्य पाते रहते थे। इस पर मोरारजी ने जवाब दिया की यह दोनो बाते सच है किन्तु विदेश मंत्री के काम काज पर उस का कोई असर नही पडा। (मोरारजी पेपर्स, अरुण गांधी, विकास बुक्स, नई दिल्ली, पृष्ट 119) मोरारजी देसाई को हटाकर प्रधानमंत्री बनने वाले अपार महात्वाकांक्षी चरण सिंह मात्र 23 दिनों के लिए क्रार्यरत प्रधान मंत्री रहे। लोक सभा की पीएम सीट पर केवल तीन मिनट ही बैठ सके थे।

वित मंत्री के रुप में मोरारजी देसाई ने तो पारदर्शिता की मिसाल कायम की। जवाहरलाल नेहरु ने अपनी किताबो पर ब्रिटिश प्रकाशकों द्वारा प्रदत रायलटी की राशि लन्दन के बैंक में जमा करा दी थी। पता चलने पर मोरारजी देसाई ने प्रधान मंत्री को आगाह किया कि इससे विदेशी मुद्रा कानून का उल्लंघन होता है जिसके अंजाम में कारागार और जुर्माना हो सकता है। तिलमिलाये नेहरु लन्दन से दिल्ली अपना बैंक खाता ले आये। तभी इन्दिरा गाँधी ने अपने दोनो पुत्रों राजीव और संजय को शिक्षा हेतु इंग्लैण्ड भेजना चाहा तो वित मंत्री ने कहा कि इन दोनो किशोरो की बुनियादी अर्हता इतनी नही है कि व उच्चतर शिक्षा हेतु विदेशी मुद्रा प्राप्त कर सकें

मोरारजी देसाई ने एक नियम बनाया था कि प्राक्तिक आपदा अथवा दुर्घटना के समय प्रधानमंत्री उस स्थल की यात्रा नही करेंगे। उनका तर्क था कि यात्रा करने से पीडित जन हेतु राहत कार्य के बजाय प्रशासन विशिष्ट अतिथि के आवभगत में लग जाते है।
एक कानूनी प्रयास पर भी नजर डालें। बम्बई के गृह मंत्री मोरारजी देसाई ने कहा की बहुपत्नी प्रथा का अन्त कर दिया जाये। इसका कई कांग्रेसियों, सी राजगोपालाचारी को मिलाकर, ने विरोध किया था। उनका तर्क था कि हिन्दु पुरुष इसे स्वीकार नही करेंगे (हिन्दु विवाह संशोधन 1955 में आया था)। इस पर मोरारजी देसाई ने कहा कि इस हालत में हिन्दू महिला को भी बहुपति प्रणाली का अधिकार मिले।

मोरारजी देसाई सरदार पटेल के आत्मीय रहे। अतः कुछ लोगो ने उन्हे मुस्लिम विरोधी कहा। इन्दिरा गांधी के समर्थको ने अभियान चला दिया। शुरुआत 1951 से हुई जब राष्ट्रीय कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरु के आग्रह को अस्वीकार कर मोरारजी देसाई ने रफी अहमद किदवई का नाम कांगे्रस संसदीय बोर्ड के सदस्य हेतु प्रस्तावित नही किया। कारण था कि रफी साहब सरदार पटेल के विरोधी रहे। मगर जब गोविन्द वल्लभ पन्त और रफी साहब के दरमियान एक विवादित घटना हो गई तो रफी साहब ने नेहरु से कहा कि वे मोरारजी देसाई से जांच करा ले जो उन्हे स्वीकार होगा। अर्थात् रफी साहब को मोरारजी देसाई की निष्पक्षता पर भरोसा था। विभाजन के बाद बम्बई के दंगो के दौरान मुसलमानो की जिस प्रकार गृह मंत्री मोरारजी देसाई ने रक्षा की उसकी श्लाघा नेहरु ने स्वंय की। पडित पन्त ने उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यो की इतनी रक्षा नही की (रेमिनिसेंसेज ऑफ़ नेहरु एज, एमओ मथाई, विकास प्रकाशन, नई दिल्ली, 1978 पृष्ट 255) । गोधरा दंगे के दस वर्ष इस साल 27 फरवरी को हुए। 1927 में भी जब दंगे हुएथे तब मोरारजी देसाई मजिस्ट्रेट थे। गणेश चतुर्थी के दिन मस्जिद की राह पर से गुजरते हुए श्रृध्दालू मंजीरा बजा रहे थे। (मुस्लिम बहुल गोघरा के हिन्दुओ को मारा गाया था)। दंगो की खबर मिलते ही मोरारजी देसाई क्रिकेट मैच छोडकर साइकिल पर सवार होकर घटना स्थल पर पहुँच गये और शान्ति स्थापित की। इस घटना के पूर्व पुलिस उपाधीक्षक जियादीन अहमद ने समारोह में गायों को कटवाया था, तनाव था ही। अंग्रेज कलक्टर ने मुस्लिम दंगाइयो का पक्ष लिया मगर आई सी एस उपजिलाधीश एचवीआर आयंगर (बाद में रिजर्व बैंक के गवर्नर बने थे) ने मोरारजी देसाई द्वारा प्रबंधन की तारीफ की। उन्होने पाया कि दंगाई मुसलमान थे। मोरारजी देसाई एकमात्र राजनेता है जिन्हे पाकिस्तान से निशाने पाकिस्तान और भारत रत्न से नवाजा गया था। दोनो सबसे बड़े नागरिक सम्मान है।

मोरारजी देसाई की छवि रही कि वे समाजवाद के धुर विरोधी रहे,। यह विरोधाभासी तथ्य है। जब नाशिक जेल में 1932 मे सोशलिस्ट पार्टी की नीव रखी गई थी तो जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, मीनू मसानी आदि के साथ मोरारजी देसाई भी कैद थे । उन सबके अथक प्रयास के बावजूद मोरारजी देसाइ सोशलिस्ट पार्टी में शामिल नही हुए। उनकी अवघारणा थी कि सोशलिस्टो को साधन की पवित्रता वाला गांधीवादी नियम मान्य़ नही है। बस साघ्य की महत्ता ही स्वीकार्य है। सोवियत कम्युनिस्टों से वे सब प्रेरित होते है। निजी पूंजी की आवश्यकता को नकारते है। इसीलिए जब इन्दिरा गाधी ने बैकों का राष्ट्रीयकरण किया (1970) था तो उपप्रधानमंत्री तथा वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने कहा था प्रशासनिक अक्षमता बढेगी। तभी उन्हे वित्त मंत्रालय से हटाये ने की सूचना आकाशवाणी से मिली थी। उनकी यह निश्चित राय थी कि सार्वजानिक उद्यम में सरकार के तेरह हजार करोड़ रुपये लगे है और लाभ केवल चन्द सौ करोड रुपयो का ही होता है। मगर वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विरोधी रहे और लघु और तक ग्रामीण उद्योग के हिमायती रहे।

एक खास मसले पर कईयो ने, कांग्रेसीजन भी, मोरारजी देसाई से रुष्ट रहा करते थे। सवाल शराब बन्दी का था मगर इस महाऩ गांधीवादी के लिए मद्यनिषेघ नैतिक आस्था और पावन सिद्धांत की बात थी। जब सोवियत नेता निकिता खुश्चेव और बुलगानिन मुम्बई आये थे तो मुख्य मंत्री मोरारजी देसाई ने उनसे शराब की परमिट के लिए आवेदन करने को कहा। मगर ये रुसी नेता अपना वोडका इतना लाये थे कि जरुरत नही पडी। एक बार व्रिटिश प्रधान मंत्री के सम्मान मे समारोह अयोजित हुआ। नेहरु इसके मुख्य अतिथि थे। वहाँ सभी फल का रस पी रहे थे क्योकि वित मंत्री मोरारजी देसाई की शर्त थी कि यदि मदिरापान हुआ तो वे नही शामिल होंगे। कुछ ऐसे ही गुण है, विशिष्टताये है, जिनसे मोरारजी देसाई अपने किस्म के अनूठे राजनेता बने रहे। भले ही उनके लोग ही उनका मजाक उड़ाये। वे निडरता के पर्याय थे। एक बार जोरहट में (असम) में उनका जहाज धरती पर टकराकर उलट गया। वे शान्त भाव से कुर्ता, सदरी आदि ठीक कर के उतरे। सीधे चल दिये। उनके चहरे पर समभाव था, वही गीतावाला, न क्लेश, न हर्ष। वही बात उनकी राजनीति में भी थी।
वरिष्ठ पत्रकार के.विक्रम राव के फेसबुक वाल से

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