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बलिया, जहां भगवान शंकर का खुला तीसरा नेत्र और जलकर भष्म हो गए कामदेव

विजय बक्सरी

बलियाः ऐतिहासिक, राजनीतिक व भौगोलिक नजरिए से पूरे विश्व में विशेष स्थान रखने वाले बलिया जनपद की धरा पौराणिक रुप से भी खास महत्व रखता है। ऋषि मनिषियों की तपस्थलि बलिया जनपद की धरती पर जगतपालनहार भगवान शंकर ने भी स्वयं तप किया था और भगवान शंकर ने यहीं अपना तीसरा नेत्र भी खोला। जिसमें स्वयं कामदेव जलकर भष्म हो गए। जिसके प्रमाण स्वरुप में बलिया के कारो गांव में आज भी कामेश्वर मंदिर स्थापित है। कामेश्वर धाम के रुप में विख्यात इस मंदिर में अधजला आम का एक वृक्ष आज भी खड़ा है, जो अजेय माना जाता है। इसी वृक्ष के पीछे छिपकर कामदेव ने तपस्यारत भगवान शंकर पर पुष्पवार चलाया था। सावन माह में उक्त मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालियों की जबरदस्त भीड़ जुटती है।
आज हम बलिया के इसी पौराणिक गाथा को विस्तार से चर्चा करते है जिसका वर्णन शिवपुराण व बाल्मिकी रामायण में भी मिलता है। राजा दक्ष ने जब महायज्ञ में भगवान शिव और माता सती को निमंत्रित नहीं किया, तो माता सती ने इसे अपमान समझा और राजा दक्ष के महल में बने हवनकुंड में जाकर आत्महत्या कर ली। माता सती के शरीर के नष्ट हो जाने पर भगवान शंकर क्रोध और प्रतिशोध की ज्वाला में तांडव मचाने लगे। जिससे घबराएं भगवान विष्णु समेत सभी देवता सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव शंकर से शांत होने की विनती करने लगे। जिसके बाद भगवान शंकर ने परमशांति की प्राप्ति के लिए गंगा और तमसा नदी के संगम तट पर समाधि ले लिया और घोर तपस्या में लीन हो गए। इधर माता सती का पार्वती के रूप में पुर्नजन्म होता है। माता पार्वती भी भगवान शिव की तपस्या करके उन्हें पति के रूप में मांगती हैं। भगवान शिव पार्वती से विवाह तो कर लेते हैं किंतु उनके मन में मोह या प्रेम की भावना नहीं आत और अधिकांश समय तपस्या में ही लीन रहते है। इस बीच राक्षस तारकासुर ने ब्रह्माजी की तपस्या कर उनसे वर मांग लिया कि उसकी मृत्यु केवल शिवपुत्र ही कर सकता है। वरदान मिलते ही वह स्वर्ग पर आधिपत्य का प्रयास करने लगता है और सभी देवताओं को हानि पहुंचाने लगता है। ऐसे में देवताओं में चर्चा जोर पकड़ने लगता है कि राक्षस तारकासुर का वध करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती का मिलन कराना बहुत जरूरी था। इसे मूर्त रुप देने के लिए सभी देवताओं ने कामदेव को अपना सेनापति नियुक्त करके भगवान शिव की तपस्या भंग करने की जिम्मेदारी सौंप दी। अब कामदेव ने तपस्या में लीन भगवान शिव को जगाने के लिए उनके ऊपर पुष्पबाण चला दिया। जिससे भगवान शिव की तपस्या तो भंग हो जाती हैं जिससे क्रोधित भगवान शंकर ने अपना तीसरा नेत्र खोला दिया। जिनके तीसरे नेत्र की क्रोध की अग्निज्वाला से बचने को आम के वृक्ष के पीछे छिपे कामदेव जलकर भस्म हो जाते हैं। इसी कथा के साक्ष्य के रुप मं विख्यात कामेश्वरधाम मंदिर में आज भी जला हुआ आम का वृक्ष अजेय खड़ा है। माना जाता है कि कि त्रेतायुग में भगवान राम और लक्ष्मण भी महर्षि विश्वामित्र जी के साथ बक्सर होते हुए गंगा नदी पारकर यहां आए थे।

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