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कृषि कानून -उत्तर प्रदेश और पंजाब में बीजेपी के पक्ष में ऐसे बदलेंगे समीकरण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरूनानक देव के प्रकाश पर्व के मौके पर तीनों कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान करके एक बड़ा राजनीतिक दांव चल दिया है। पीएम मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक से पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनाव के पूरे समीकरण ही बदल गए हैं। अभी तक कृषि कानून के विरोध को विपक्षी दल भाजपा के खिलाफ राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का मंसूबा बनाए हुए थे। प्रधानमंत्री ने बड़ी शालीनता के साथ विपक्षी नेताओं के दिवा-स्वप्नों पर पानी फेर दिया है। हालात यह हैं कि विपक्षी दलों के लिए अब चुनावी मुद्दा ढूढ़ना ही मुश्किल हो गया है। दरअसल, भाजपा शासित राज्यों में डबल इंजन की सरकार के चलते इतने ज्यादा विकास कार्य हो रहे हैं कि जनता को लग रहा है कि केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी को लाकर उन्होंने सबसे बड़ा काम कर दिया। इसका लाभ अब उन्हें देखने को मिल रहा है। और जहां गैर बीजेपी सरकारें हैं, उनके नेताओं को कुर्सी बचाओ अभियान और अपनी लड़ाई के ही फुर्सत नहीं मिल रही हैं तो प्रदेश की जनता के विकास कार्य कैसे हों।

कानून लागू होने के बाद भी राज्यों में बीजेपी को बढ़त

सितंबर 2020 में तीनों कृषि कानून लागू होने और कृषि आंदोलन के बाद सबसे पहले नवंबर में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए थे। जिसमें जद (यू) के साथ भाजपा की सत्ता में फिर वापसी हुई। और ऐसा पहली बार हुआ कि वह जद (यू) से ज्यादा सीटें जीत कर आई। इसके बाद अहम चुनाव मई 2021 में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल, पुडुचेरी में हुए। पश्चिम बंगाल में बीजेपी को पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में बहुत ज्यादा सीटें मिलीं। असम में पार्टी ने सत्ता में वापसी की और उसे पुडुचेरी में सरकार बनाने का मौका मिला।

पंजाब में कांग्रेस बिखरी, राजस्थान में इंतजार

बीजेपी की एक रणनीतिक सफलता यह भी है कि उसने तीन राज्यों में अपने मुख्यमंत्री बड़ी आसानी से बदल दिए। कहीं कोई शोरशराबा या अनुशासनहीनता नहीं हुई। कांग्रेस को पंजाब में ही अपना मुख्यमंत्री बदलने में पसीने आ गए। पार्टी टूट गई। बड़े नेताओं में मतभेद न सिर्फ बढ़े, बल्कि जनता के बीच आ गए। कांग्रेस के यही हालात राजस्थान में भी होने वाले हैं। क्योंकि सचिन पायलट चुप बैठने वाले नेता नहीं है। आज नहीं तो कल जब यहां भी सीएम बदलेगा तो हालात पंजाब जैसे या उससे भी बदतर हो सकते हैं।

मास्टर स्ट्रोक से पंजाब में बीजेपी के दोनों हाथों में लड्डू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा पर पंजाब के पूर्व CM कैप्टन अमरिंदर सिंह ने खुशी जताई है। उन्होंने कहा कि वे भाजपा से सीट शेयरिंग करके विधानसभा चुनाव में उतरेंगे। कैप्टन ने पहले ही कहा था कि जैसे ही कृषि कानून रद्द होंगे और किसान आंदोलन खत्म होगा, तो वे भाजपा के साथ मिलकर चुनावी ताल ठोकेंगे। जहां तक बीजेपी का सवाल है तो उसके दोनों हाथों में लड्डू हैं। तीनों कृषि कानूनों के विरोध में शिरोमणि अकाली दल ने सितंबर 2020 में नाता तोड़ लिया था। अब तीन कृषि कानून वापस ले लिए गए हैं। ऐसे में अकाली दल फिर से बीजेपी से हाथ मिलाना चाहेगा। अब गेंद बीजेपी के पाले में आ गई है कि वह विधानसभा चुनाव में शिअद के जुड़ती है या कैप्टन अमरिंदर से। प्रधानमंत्री के एक मास्टर स्ट्रोक से बीजेपी को दोनों ही सूरतों में फायदा होने वाला है।

केंद्र ने चुनाव से पहले करतारपुर साहिब खोलकर भी लुभाया

अब केंद्र सरकार ने चुनाव से पहले करतारपुर साहिब खोलकर और फिर तीनों कृषि कानूनों को वापस लेकर पंजाब बीजेपी को बड़ा बूस्ट दे दिया है। अब वह एक एजेंडे के साथ मतदाताओं के बीच में जाएगी और चुनाव में सीट शेयरिंग के लिए भी अपनी शर्तों पर बाद कर सकेगी। पिछले चुनाव की तुलना में पंजाब में बीजेपी का कैडर वोट भी बढ़ा है। इसे देखते हुए पंजाब चुनाव अब काफी दिलचस्प होने की उम्मीद है।

यूपी में मोदी-योगी की जुगलबंदी, विपक्ष के पास मुद्दे ही नहीं

राजनीतिक रूप से सबसे बड़े संवेदनशील राज्य उत्तर प्रदेश में भी अगले साल चुनाव होने वाले हैं। भाजपा 2014 के लोक सभा चुनावों से ही प्रदेश में एक तरफा जीत हासिल कर रही है। कृषि कानूनों के कथित विरोध से विपक्षी दलों को लगा था कि उन्हें कुछ ऑक्सीजन मिल जाएगी. इन 8 वर्षों में पहली बार वे इसी मुद्दे पर भाजपा को पहली बार बैकफुट पर लाने के सपने देख रहे थे, लेकिन पीएम मोदी ने उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया. खास तौर से उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीनों कृषि कानूनों के विरोध का प्रभाव था, वह भी अब खत्म हो गया। दरअसल, मोदी-योगी ने मिलकर राम मंदिर के अलावा उत्तर प्रदेश में विकास की इतनी गंगा बहा दी है कि विपक्षी दलों को ढूढ़ने से भी कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है।

मोदी ने साबित किया कि सियासी मैदान के सबसे बड़े ‘लड़ैया’ वही हैं

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेकर फिर साबित कर दिया कि सियासी मैदान के सबस बड़ा ‘लड़ैया’ वही हैं। सियासी अखाड़े में अपने अचानक चले दांव से विरोधी को हक्का-बक्का कर देना उनकी पुरानी आदत है। यही वजह है कि 65 साल से देश की सत्ता में जमे कांग्रेस को उखाड़ फेंका। जब वो राष्ट्र के नाम संबोधन के लिए आए तो किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करेंगे। लेकिन प्रधानमंदी मोदी अपने अचानक चले दांव से एक झटके में ही कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों को चित कर दिया। साथ ही देश विरोधी ताकतों को भी बड़ा संदेश दिया।

पीएम मोदी ने भेदा विपक्ष का सियासी चक्रव्यूह

करीब डेढ़ साल से किसान आंदोलन की आड़ में विपक्षी दल मोदी सरकार को घेरने के लिए सियासी बिसात बिछा रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के साथ ही बीजेपी की राज्य सरकारों को किसानों के चक्रव्यूह में फंसाने के लिए तमाम कोशिशें हो रही थीं, लेकिन सियासी चौसर के दिग्गज खिलाड़ी प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा पासा फेंका कि विपक्षी दल चारों-खाने चित हो गए। प्रधानमंत्री मोदी ने तीनों कृषि कानून को वापस लेने का फैसला कर पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से पहले विपक्ष के हाथों से सबसे बड़े मुद्दे को छीन लिया, जिसके दम पर वो 2022 और 2024 के चुनावों में बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने का सपना संजोय हुए थे।

यूपी में आरएलडी और टिकैत का खेल बिगाड़ा

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल के जयंत चौधरी और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने राकेश टिकैत को सामने रखकर सियासी बिसात बिछायी थी। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाट और मुस्लिमों में जो दूरियां आ गई थीं, उसे खत्म कर बीजेपी को मात देने की रणनीति बनाई गई थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के फैसले ने जाटों की नाराजगी को दूर कर दिया है। जिस मुद्दे को लेकर राकेश टिकैत घुम-घुमकर किसान महापंचायत में जाटों को भड़का रहे थे, उस मुद्दे को खत्म करने के साथ ही उनकी नेतागीरी की भी हवा निकाल दी है। अब उत्तर प्रदेश के चुनाव से चार महीने पहले योगी और मोदी सरकार को घेरने की योजनाओं में विपक्षी पार्टियों को अपनी रणनीति में बदलाव लाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

विपक्ष के ‘विक्टिम कार्ड’ को बेकार किया

हालांकि किसान कांग्रेस, आम आदमी पार्टी सहित तमाम विपक्षी दल के समर्थन और फंडिंग से सड़कों पर बैठे थे, लेकिन ये दल ठंडी, गर्मी और बरसात में सड़कों पर बैठे किसानों की दुर्दशा को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर हमला कर रहे थे। साथ ही मोदी सरकार को असंवेदनशील बताकर जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने गुरु पर्व पर क्षमा मांगते हुए कृषि कानून वापस लेने की घोषणा कर विपक्ष के ‘विक्टिम कार्ड’ को बेकार कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में बताया कि वो किसानों के लोकर काफी संवेदनशील है और उनके हित में काफी काम किया है और आगे भी करते रहेंगे। इससे किसानों और आम लोगों में प्रधानमंत्री मोदी की खराब छवि बनाने की विपक्ष की कोशिश को तगड़ा झटका लगा है।

आंदोलन की आड़ ले रहीं देश विरोधी ताकतों को जोरदार झटका

कृषि कानून विरोधी आंदोलन की आड़ में देश विरोधी ताकतों को भी अपने एजेंडे को जारी रखने के लिए खाद-पानी मिल रहा था। आंदोलन में जहां अनुच्छेद-370 को लेकर पोस्टर देखे गए, वहीं सिख फ़ॉर जस्टिस ग्रुप अलग खालिस्तान की मांग को लेकर अपनी साजिशों को अंजाम देता नजर आया। किसान आंदोलन को अनुच्छेद-370 हटाने और सीएए विरोधियों का भी समर्थन मिल रहा था। आदोलन में उनकी मौजूदगी के सबूत मिल चुके हैं। वहीं 26 जनवरी, 2021 को दिल्ली में लालकीले पर जो उपद्रव हुआ, उसमें सिख फ़ॉर जस्टिस का प्रमुख हाथ था। आंदोलन को लेकर प्रतिबंधित संगठन सिख फ़ॉर जस्टिस के प्रमुख गुरूपंत सिंह पन्नू लगातार वीडियो जारी कर जहर उगल रहा था। यहां तक कि आंदोलन को जारी रखने के लिए विदेशों से फंडिंग की जा रही थी। यह संगठन विदेशों में प्रधानमंत्री मोदी और भारत की छवि खराब करने की कोशिश भी कर रहा था। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के फैसले से देश विरोधी ताकतों को भी जबरदस्त झटका लगा है।

Source -performindia

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