Literature

अज्ञेय – एक सम्मोहक शख्सियत

के. विक्रम राव

हम श्रमजीवी पत्रकारों की नजर में संपादक अज्ञेय (आज 109वीं जयंती है) एक रूमानी व्यक्ति रहे| कथित प्रगतिशील और जनवादीमार्का लोगों का उनसे वैमनस्य घनघोर रहा| कुछ साहित्यकार उनसे स्वाभाविक डाह भी करते थे| अज्ञेय की प्रशस्त काया — अजब और कद्दावर — अपना असर गहरा डालती थी| गोरे गोरे चेहरे पर घवल केश (दाढ़ी-मूंछ) ऐसी धाक सर्जाती थी कि उन्हें भूले न भुलाये| “टाइम्स” संस्थान में मेरे साथी रघुवीर सहाय जी ने अपने संपादक (दिनमान) से मेरा परिचय कराया था| इसके पूर्व मेरे लोहियावादी साथी रामकमल राय जी से अज्ञेय जी के बारे में जान चुका था| रामकमल भाई ने अज्ञेय जी की जीवनी लिखी थी|

अपने अर्धसदी के पत्रकारी जीवन में मुझे दो घटनाएँ याद हैं जो हमारे पेशे से ताल्लुक रखती हैं| पहला तो उनका लम्बा नाम (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय) जो बहुलतावादी लगता था| अजूबा भी था| एक बार नवभारत टाइम्स कार्यालय से उत्तर प्रदेश जनसंपर्क निदेशालय को संदेशा आया कि अतिथि गृह में कमरे चाहिए| किसी गोष्ठी के लिए संपादक जी पधार रहे थे| आगमन पर पता चला उनके लिए चार कमरे बुक किये गये थे|

दूसरी घटना मेरे कार्यालय से जुड़ी थी| तब लखनऊ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के राज्य संवाददाता के नाते मैं अशोक मार्ग दफ्तर में कार्यरत था| नवभारत टाइम्स भी पड़ोस वाले कमरे में बसा था| टेलीप्रिंटर एक ही था| रोमन लिपि वाला| लखनऊ में टाइम्स व नवभारत टाइम्स (1978-83) संस्करण नहीं छपता था| दिक्कत की बात यह थी कि संध्या के सात बजे के बाद भेजी गई खबर दिल्ली में छप नहीं पाती थी, जब तक वह भूचाली या गगनभेदी न हो| नवभारत टाइम्स की हिंदी की खबर रोमन लिपि में टाइप करने में ढाई गुना समय लगता था| समाचार की दृष्टि से यह बड़ा व्यवधान बन गया था | दिल्ली मुख्यालय में जाकर मैंने अज्ञेय जी से शिकायत की| भारत सरकार के उपक्रम हिंदुस्तान टेलीप्रिंटर ने तभी नागरीलिपि में नई मशीन का उत्पादन शुरू किया था| मेरा सुझाव था कि ये किराये पर लग सकती है | सुभीता हो जायेगा| मेरा अनुरोध अज्ञेय जी ने माना| पर प्रश्न यह था कि यदि बजाय साहित्यकार के, कोई पत्रकार संपादक होता तो इतनी देर न लगती| हड्डी के डॉक्टर से चर्म रोग का उपचार कराने जैसा हो गया था| साहित्यकार को पत्रकार का काम दे दिया गया था| अज्ञेय जी से एक और मेरा निवेदन था कि हैदराबाद और अहमदाबाद हिंदी पाठकों का प्रदेश हो गया है| मैं दोनों शहरों में काम कर चुका था| मैंने अज्ञेय जी से आग्रह किया कि वहाँ नवभारत टाइम्स का संवादाता नियुक्त हों| मगर ऐसा हुआ नहीं | अंग्रेजी की कॉपी का ही अनुवाद होता रहा| भला हो राजेन्द्र माथुर जी का जिन्होंने हिंदी-भाषी संवाददाता को नियुक्त किया|

अज्ञेय जी का वामपंथियों को सबक सिखाना मुझे बहुत अच्छा लगा| “सोवियत भूमि पुरस्कार” के लिए सदैव लालायित रहने तथा रूसी वजीफे पर पलने वाले इन जनवादियों को अदम्य हिम्मती अज्ञेय जी ने बौद्धिक अस्त्र द्वारा वैचारिक द्वंद्व में परास्त किया | हालाँकि उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा|

आज उनकी जयंती पर इसलिए भी उनका स्मरण करें क्योंकि पत्रकारी हिंदी को प्रांजल बनाने में, समाचार को सौष्ठव और सम्यक बनाने में उनका असीम योगदान रहा |

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